ग्राउंड रिपोर्ट: 175 रुपए कम करके फसल बीमा का क्लेम 8700 रुपए घटाया, 22 लाख किसानों को नुकसान

कमलनाथ की सरकार ने खरीफ सीजन 2019 और रबी सीजन 2019-20 के लिए सभी बीमित फसलों का स्केल ऑफ फाइनेंस 75 प्रतिशत कर दिया है। प्रदेश सरकार बीमा कंपनी के लिए फसलों का स्केल ऑफ फाइनेंस तय करती है।

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   9 Oct 2019 12:00 PM GMT

इस साल जब मध्य प्रदेश के सोयाबीन किसानों से प्रधानमंत्री फसल बीमा (PMFBY) का प्रीमियम 175 रुपए कम लिया गया तो वे बहुत खुश हुए। लेकिन अब जब भारी बारिश से उनकी फसल चौपट हो गई है और वे उम्मीद लगाए बैठे थे कि बीमा के बदले मिलने वाले भुगतान से उनका नुकसान कुछ कम हो सकेगा तब उन्हें तगड़ा झटका लगा है। 175 रुपए का राहत देकर प्रदेश सरकार ने फसल बीमा का क्लेम 8700 प्रति एकड़ कम कर दिया है।

कमलनाथ की सरकार ने खरीफ सीजन 2019 और रबी सीजन 2019-20 के लिए सभी बीमित फसलों का स्केल ऑफ फाइनेंस 75 प्रतिशत कर दिया है। प्रदेश सरकार बीमा कंपनी के लिए फसलों का स्केल ऑफ फाइनेंस तय करती है।

स्केल ऑफ फाइनेंस का मतलब होता है उत्पादन की लागत, उसे ही बीमा के तहत कवर किया जाता है। प्रति हेक्टेयर जितनी फसल लागत होती है उसे बीमा के तहत कवर किया जाता है। वर्ष 2018 में स्केल ऑफ फाइनेंस 100 फीसदी था। वर्ष 2019 में इसमें 25 फीसदी की कटौती कर दी गई है।

मध्य प्रदेश में भारी बारिश के कारण खरीफ की लगभग 60 लाख हेक्टेयर की फसल बर्बाद हो चुकी है जिससे 22 लाख किसान प्रभावित हैं।

किसानों को कैसे नुकसान हो रहा उसे ऐसे समझिए

हम हरदा जिले का उदाहरण देखते हैं। बीमा कंपनी इफको टोकियो ने यहां सोयाबीन की बीमा के लिए वर्ष 2018 में किसानों से 700 रुपए बतौर प्रीमियम लिए जिसके बदले 35000 रुपए प्रति हेक्टयेर का क्लेम तय हुआ।

वहीं वर्ष 2019 में किसानों से 700 रुपए की जगह 525 रुपए ही लिए गये मतलब 175 रुपए कम। किसान इससे खुश भी हुए लेकिन इस छूट के बदले क्लेम की राशि को 35000 से घटाकर 26250 रुपए कर दिया गया। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि 175 रुपए छूट के बदले बीमा कंपनी ने 8750 रुपए कम कर दिये।

उड़द की फसल के लिए तय क्लेम की राशि और कम किया प्रीमियम। (2018, 2019)

बीमा कंपनियों ने ऐसा क्यों किया, इसके बारे में बीमा कंपनी एचडीएफसी एर्गो मध्य प्रदेश के प्रबंधकर सचीन पाटीदार बताते हैं, "अभी तो पिछले साल का क्लेम तैयार कर रहे हैं। सरकार स्केल ऑफ फाइनेंस तय करती हैं हम उसी हिसाब से भुगतान करते हैं। प्रदेश सरकार जो तय करती है हम भुगतान उसी हिसाब से करते हैं।"

मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की जिम्मेदारी एग्रीकल्चर इश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि., बजाज एलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि., इफको टोकियो जनरल इश्योरेंस कंपनी लि., ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया को दी गई है।

कुछ और उदाहरण देखिए जिससे आप इस पूरे खेल को समझ पाएंगे। बीमा क्लेम की राशि प्रदेश के हर जिले की अलग-अलग होती है। हरदा की ही तरह आगर और मालवा में सोयाबीन की फसल पर मिलने वाली क्लेम की राशि प्रति हेक्टेयर 12000, अलीराजपुर में 8750, अनूपपुर में 4200, बड़वानी में 10000, बेतूल में 8150 और बुरहानपुर में 10000 रुपए की कटौती की गई है।

यह भी पढ़ें- Ground Report: एमपी के किसान ने कहा- फांसी लगाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं

अन्य जिलों में भी बीमा क्लेम की राशि घटाई गई है जो कि औसतन 8000 रुपए प्रति हेक्टेयर के आसपास है।

मध्य प्रदेश में वर्ष 2018 में खरीफ के लिए करीब 35 लाख किसानों ने बीमा कराया था। लेकिन इस साल 30 लाख किसानों का ही पंजियन हो पाया है। 5 लाख किसान तो सीधे ही फसल बीमा योजना से बाहर हो गये। हालांकि प्रदेश सरकार इसके लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदारी मानती हैं।

इस मामले पर आम किसान यूनियन के किसान नेता राम इनानिया कहते हैं, "सोयाबीन की खेती में लागत 20 फीसदी तक बढ़ी है फिर स्केल ऑफ फाइनेंस 25 फीसदी कम कैसे हो गया ? ये हमें कौन समझायेगा। ये तो केंद्र सरकार के नियमों के खिलाफ है। बारिश ने किसानों को वैसे ही बर्बाद कर रखा है, और अब बीमा से भी नुकसान होगा। इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा ?"

"अकेले हरदा जिले में ही किसानों को लगभग 150 करोड़ रुपए का नुकसान होगा। वहीं अगर प्रदेश की बात करें तो ये नुकसान 10 हजार करोड़ रुपए के आसपास होगा।" राम आगे बताते हैं।

मध्य प्रदेश में खरीफ फसल का रकबा 150 लाख हेक्टेयर है। इसमें लगभग तीन लाख करोड़ रुपए का उत्पादन होता है। खरीफ में सोयाबीन, उड़द और मूंग जैसी फसलें आती हैं। 22 लाख से ज्यादा किसानों को नुकसान हुआ है हालांकि सही आंकड़ा क्रॉस कटिंग सर्वे के बाद सामने आयेगा।

सोयाबीन का प्रीमियम और कंपनी द्वारा तय की गई क्लेम की राशि। (2018, 2019)

हमें महंगाई का गणित समझाते हैं हुए राम इनानिया कहते हैं, "अब देखिए पिछले साल डीजल की कीमत 63-65 रुपए प्रति लीटर थी जो आज 70 के ऊपर है। डीएपी की कीमत 1250 से बढ़कर 1400 रुपए प्रति बोरी हो गई है। कीटनाशकों के दाम भी 100 से 200 रुपए बढ़े हैं। बीज की कीमतें भी बढ़ी हैं। सोयाबीन 5600 रुपए प्रति कुंतल था जो अब 5800 रुपए है। इस तरह पानी, बिजली की कीमत आदि को मिलाकर देखेंगे तो 8 से 10000 रुपए प्रति हेक्टेयर की लागत बढ़ी है। ऐसे में तो स्केल ऑफ फाइनेंस 20 से 25 फीसदी बढ़ना चाहिए था। लेकिन यहां तो सरकार ने उल्टा कर दिया है।"

हालांकि किसान कांग्रेस के मध्य प्रदेश कार्यवाहक अध्यक्ष केदार सिरोही का मानना है कि स्केल ऑफ फाइनेंस में कटौती से किसानों को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होगा। वो कहते हैं, "किसानों को वैसे भी इस योजना का ज्यादा लाभ नहीं मिलता। हरदा के नांदरा का ही मामला देख लीजिए। केंद्र सरकार की योजना में इतने पेंच हैं कि किसानों को क्लेम का बहुत कम हिस्सा ही मिल पाता है। हमने तो किसानों से पैसे भी कम लिए।"

"हम तो कोशिश कर रहे हैं कि किसानों को प्रदेश स्तर का बीमा मुहैया करायें। जिसमें हम भले ही स्केल ऑफ फाइनेंस कम रखेंगे लेकिन जो रखेंगे वो किसानों को मिलेगा।" केदार सिरोही आगे कहते हैं।

फसल बीमा को लेकर मध्य प्रदेश सरकार की विज्ञप्ति।

मंत्रालय से कोई जवाब नहीं मिला

इस पूरे मसले हमने मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री और उनके विभाग के अधिकारियों से बात करने की कई कोशिश की। कृषि मंत्री सचिन यादव के नंबर पर कई बार फोन किया गया लेकिन उनके सहयोगियों ने हर बार यही जवाब दिया कि अभी वो फिल्ड में हैं, दो घंटे बाद फोन करिये, कल फोन करिये।

इसके अलावा कृषि सचिव मुकेश कुमार शुक्ला ने बस इतना कहा कि अभी तो क्लेम दिया ही नहीं जा रहा तो आप यह कैसे कह रहे हैं कि स्केल ऑफ फाइनेंस कम कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने फोन काट दिया और फिर उठाया ही नहीं। मुख्य सचिव अजीत केसरी ने फोन पर कहा कि मैं अभी मीटिंग में हूं आप अपने सवाल वाट्सएप कर दीजिए। वाट्सएप पर कई मैसेज भेजने के बाद भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और फिर फोन नहीं उठाया।

फसल बीमा से किसानों को कितना फायदा ?

मध्य प्रदेश के जिला हरदा में एक ग्राम पंचायत है नांदरा। शहर से लगभग 35 किलो मीटर दूर इस गांव के 936 किसानों का दो करोड़ रुपए बीमा कंपनी पर बकाया है। मामले को लगभग दो साल होने को आये हैं लेकिन किसानों के पैसे का भुगतान अभी तक नहीं हो पाया है।

किसानों की भलाई के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की जमीनी हकीकत यही है। नियमानुसार दो महीने के अंदर मिलने वाला क्लेम मिलने में सालों लग जा रहा है। क्लेम कैसे मिलेगा, उसका हिसाब किताब क्या है, किसानों को कुछ भी नहीं पता।

नांदरा के किसानों ज्ञापन जो वो अब तक प्रदेश के हर कृषि कार्यालयों में दे चुके हैं।

नांदरा के किसान बृजेश जाट बताते हैं, " मेरे गांव के 936 किसानों का 2 करोड़ रुपए बकाया है। पटवारी की छोटी सी गलती से सोयाबीन की जगह उड़द का मुआवजा आ गया। उड़द का रेट काम था। हमने कलेक्टर से इसकी शिकायत की। कलेक्टर ने इस गलती को सुधारा भी लेकिन फिर बीमा कंपनी ने कहा कि समय ज्यादा बीत गया है। इसलिए अब यह मुआवजा नहीं मिलेगा।"

" हम अब बीमा कंपनी के खिलाफ मुकदमा करने जा रहे हैं। शिकायत करके-करके थक गये हैं। कंपनी कह रही है कि अब इतने दिनों बाद क्लेम नहीं देते। दो महीने के अंदर ही मुआवजे की राशि भेज दी जाती है। लेकिन सच तो यह है कि मेरे जिले में शायद ही कोई ऐसा किसान हो जिसे साल या डेढ़ साल से पहले बीमा क क्लेम मिला हो।" बृजेश आगे बताते हैं।

मध्य प्रदेश में भारी बारिश और बाढ़ के कारण सोयाबीन की फसल लगभग पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी है।

वर्ष 2016 में लांच हुई इस योजना को लेकर भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने 2018 में एक रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में बताया गया कि फसल बीमा योजना से किसानों से ज्यादा कंपनियों को फायदा हो रहा है। खरीफ सीजन 2017-18 में इन बीमा कंपनियों का मुनाफा (प्रशासनिक और री-इंश्योरेंस के खर्चों को छोड़कर) 85 फीसदी रहा।

बीमा कंपनियों को 2017-18 में बतौर प्रीमियम 22 हजार 180 करोड़ रुपए मिले। जबकि किसानों को बीमा कंपनियों से महज 12 हजार 949 करोड़ की राशि ही क्षतिपूर्ति के तौर पर मिल पाई। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस योजना से किसानों को कम बल्कि कंपनियों को ज्यादा फायदा हुआ।

हरदा के ग्राम आलनपुर के किसान ज्ञानेश खेरवार बताते हैं, " मेरे पास सवा ग्यारह एकड़ खेत है और दो केसीसी कार्ड हैं। दोनों से मिलाकर 3500 रुपए कटे थे 2017 में। उस साल भी फसल बर्बाद हो गई थी। क्लेम की राशि मुझे प्रति एकड़ 1520 रुपए के हिसाब से 16000 रुपए ही मिले। जबकि अगर मेरी फसल सही होती तो उसके बदले मुझे 2 से 3 लाख रुपए मिलते। प्रति एकड़ में 20 से 22 हजार रुपए का फायदा होता।"

" एक तो पैसे कम मिले और मिले भी तो 13 महीने बाद। जब उन पैसों की जरूरत सबसे ज्यादा थी तब मिली ही नहीं। दूसरे से उधारी लेकर काम चलाना पड़ा।"

ज्ञानेश इस गांव में अकेले ऐसे नहीं है जिनके साथ ऐसा हुआ है। गांव में कई मामले और मिले जिन्हें वर्षों बाद क्लेम का पैसा मिला।

इंदौर के तहसील सांवर के गांव फरसपुर के रहने वाले किसान मुकेश तिवारी कहते हैं, "बीम कंपनी को फोन करके मैंने बताया कि मेरी पूरी सोयाबीन की फसल खराब हो गई है। तो उन्होंने कहा कि आप अपने पटवारी से बात करो। पटवारी से पूछा तो उन्होंने कहा कि अक्टूबर में जब क्रॉप कटिंग होगी तभी पता चलेगा कि आपको कितना भूगतान होगा। वर्ष 2017 में भी ऐसा हुआ तब एक एकड़ के लिए मात्र 4000 रुपए मिला था जबकि हमारा नुकसान प्रति एकड़ 15000 रुपए से ज्यादा था। क्लम मिला भी लगभग एक साल बाद था।"

फाइनेंस एंड इकोनॉमिक्स थिंक काउंस‍िल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं अध्यक्ष विक्रान्त सिंह इस पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल उठाते हैं। वो कहते हैं, " प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की सबसे बड़ी खराबी ही यही है कि प्रीमियम के मुकाबले एक तो भुगतान कम होता है दूसरा समय पर नहीं होता। हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी जिसमें बताया गया 2018 के खत्म हुए खरीफ फसल के दौरान देश की बीमा कंपनियों के पास कुल प्रीमियम 20,747 करोड़ रुपए का जमा तो हुआ लेकिन किसानों ने क्लेम किया 12,867 करोड़ रुपए का और उन्हें मिला मात्र 7,698 करोड़ रुपए। दावे से 5,171 करोड़ रुपए कम।"

फसल बीमा की पूरी प्रक्रिया इस चार्ट से समझिए। (सोर्स- https://pmfby.gov.in/)

विक्रान्त एक और महत्वपूर्ण बात बताते हैं। वो कहते हैं, " स्केल आफ फाइनेंस में एक महत्वपूर्ण घटक 'लागत मुल्य' होता है। स्केल आफ फाइनेंस के बढ़ने का सामान्य अर्थ जो निकाला जाता है कि आने वाले वर्ष में फसल की लागत मूल्य में वृद्धि होगी। कर्ज देते समय इस बढ़ोतरी का ध्यान रखा जाता है।"

"इसको घटाने का सीधा सा मतलब यह है कि सरकार यह मान रही है कि फसल की लागत मूल्य में आने वाले समय में गिरावट होगी और इस आधार पर फसल उत्पादन के लिए मिलने वाले कर्ज में भी कटौती कर दी जाएगी यह तर्क देते हुए स्केल आफ फाइनेंस 25 फीसदी घटा दिया गया है जिसके अनुसार अब आप की लागत भी कम हो रही है।" वो आगे कहते हैं।

कुल जमा प्रीमियम और भुगतान के बीच का अंतर 13,050 करोड़ रुपए का है।

" सरकार ने तो कहा है कि अगर दावे का भुगतान समय पर नहीं होता तो बीमा कंपनियों पर 12 फीसदी जुर्माना लगेगा लेकिन आज तक किसी भी कंपनी पर कार्रवाई की खबर नहीं आई है। जबकि तय समय भी क्लेम का भुगतान होता ही नहीं।" विक्रान्त सिंह आगे कहते हैं।

वो यह भी कहते हैं कि किसानों का इस योजना से मोह भंग हो रहा है। खुद सरकार के ही आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो 2016-17 में 5 करोड़ 80 लाख किसानों ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत पंजीयन कराया था। लेकिन इसके अगले ही वर्ष 2017-18 में यह संख्या घटकर 4 करोड़ 70 लाख हो गई। इसके बाद के आंकड़े आये नहीं हैं।

नवंबर 2018 में गुजरात के अहमदाबाद में किसान स्वराज सम्मेलन को संबोधित करते हुए देश के जाने माने पत्रकार और कृषि के जानकार पी. साईनाथ ने कहा था कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना राफेल से भी बड़ा घाटाला बताया था। उन्होंने अपने संबोधन में कहा था, " महाराष्ट्र के 2.80 लाख किसानों ने सोयाबीन की खेती की। फसल बीमा के लिए केवल एक जिले के किसानों ने 19.2 करोड़ रुपए का भुगतान किया। जबकि राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने अपने अंशदान के तहत 77-77 करोड़ रुपए का भुगतान किया। इस तरह बीमा कंपनी रिलायंस को 173 करोड़ रुपए की कुल राशि प्राप्त हुई।"

उन्होंने आगे कहा कि उस साल (2017) किसानों की पूरी फसल खराब हो गई, जिसके बाद बीमा कंपनी ने किसानों के दावों का भुगतान किया। इसके तहत रिलायंस ने एक जिले में सिर्फ 30 करोड़ रुपए का भुगतान किया, इस तरह से बिना एक रुपए निवेश किये उसे 143 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ हो गया।"

प्रधानमंत्री फसल बीमा की पूरी जानकारी यहां मिलेगी


More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top