भूगर्भ जल पर निर्भर रहने वाले किसानों की जल्द बढ़ेंगी मुश्किलें

भूगर्भ जल पर निर्भर रहने वाले किसानों की जल्द बढ़ेंगी मुश्किलेंफोटो: विनय गुप्ता

22 मार्च को पूरी दुनिया में विश्व जल दिवस मनाया जाएगा। पानी बचाने की बातें होंगी, नए आंकड़े आएंगे। गांव कनेक्शन की खास पेशकश पानीकनेक्शन में पढ़िए जल सप्ताह पर कुछ खास..

यूपी, पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र और हरिणाया समेत देश के कई राज्यों में खूब खेती होती है। साल में कई फसलें ली जाती हैं, ये अच्छी बात है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है, इन राज्यों में सिंचाई के लिए ज्यादातर जो पानी इस्तेमाल किया जाता है, वो जमीन से निकाला जाता है, यानि जो पानी हम पीते हैं, वहीं सिंचाई करते है।

देश में भूमिगत जल स्त्रोतों से 70 प्रतिशत पानी सिंचाई के लिए किसान उपयोग में लाते हैं। ऐसे में जाने-अनजाने हम तेजी से भूगर्भ जल स्त्रोतों का दोहन कर रहे हैं। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो वो समय अब ज्यादा दूर नहीं है, जब देश के ज्यादातर हिस्सों में भूगर्भ जल पर निर्भर रहने वाले किसानों की मुश्किलें बढ़ चुकी होंगी।

देश में सबसे ज्यादा धान और गेहूं की पैदावार करने वाला राज्य पंजाब की बात करें तो इस राज्य के दो तिहाई कृषि क्षेत्र में भूगर्भ जल स्तर कम होने की समस्या हर साल बढ़ रही है। जबकि एक तिहाई क्षेत्र ऐसा है, जहां पर जल स्तर तो ठीक है, मगर सिंचाई के लिए पानी उपयुक्त नहीं है।

इस बारे में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के सॉयल और वॉटर इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफेसर एके जैन गाँव कनेक्शन’ से फोन पर बातचीत में बताते हैं, “पंजाब जैसे राज्य में हर साल लगभग 50 सेंटीमीटर जल स्तर नीचे जा रहा है। किसान टूयूबवेल से पानी निकाल तो रहे हैं, मगर जमीन के अंदर बहुत कम मात्रा में ही पानी पहुंच रहा है। पंजाब के कुछ क्षेत्रों में तो 40 मीटर यानि लगभग 150 फीट तक पानी नीचे चला गया है।“

प्रो. जैन आगे बताते हैं, “किसानों को सिंचाई के लिए बिजली मुफ्त दिए जाने जैसी योजनाओं से भी किसान अंधाधुंध पानी का दोहन कर रहे हैं। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो अगले दो दशकों में पानी का जमीनी स्तर इतना नीचे हो जाएगा कि हमें पानी के लिए हमें बहुत ज्यादा हॉर्स पावर की मशीन की जरुरत पड़ेगी।”

ये हालात पंजाब की है, जबकि राजस्थान के बीकानेर इलाके में वाटर लेबल 1000 से 1500 फीट है, यानि किसान पाताल से पानी निकालते हैं। यहां पर एक ट्यूबवेल लगवाने का खर्च 10 से 20 लाख रुपए तक है, जैसे जैसे जमीन का पानी नीचे उतरता जाएगा, किसानों का खर्च, और खेती करना मुश्किल होता जाएगा।

किसानों पर सीधे पड़ रहा असर

भूगर्भ जल स्त्रोतों के अत्यधिक दोहन का असर भी किसानों पर सीधे देखने को मिल रहा है। देश में धान और गेहूं में 81 प्रतिशत का योगदान देने वाले राज्य पंजाब में पिछले कुछ समय में पैदावार घट रही है। कारण, धान जैसी फसल के लिए पानी की अत्यधिक जरूरत। ऐसे में किसान कम पानी लगने वाली फसलें करने को मजबूर हो रहे हैं।

प्रो. एके जैन बताते हैं, “पंजाब में भूगर्भ जल के अत्यधिक दोहन को देखते हुए पंजाब प्रीसरवेशन ऑफ सबसॉयल वॉटर कानून बनाया गया, इससे कानून से पहले किसान जो धान की फसल मई में बोते थे, वे अब 15 जून तक किसानों को बोने के लिए बाध्य किया गया, जिससे कुछ समय बाद उन्हें सिंचाई के लिए वर्षा का भी लाभ मिल सके।“

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भूजल संकट की ओर विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट तो और खतरनाक तस्वीर पेश कर रही है। भूजल संकट को लेकर इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अंधाधुंध जल दोहन और जलवायु परिवर्तन का अगर भारत में ऐसा ही हाल रहता है तो देश में 60 फीसदी से ज्यादा ब्लॉक अगले एक दशक में सूखे की चपेट में होंगे। रिपोर्ट में कहा गया कि किसानों को फसलों की सिंचाई के लिए तो दूर, पीने के पानी के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।

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इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जैसे-जैसे हमारे देश में कृषि क्षेत्र भूमि में बढ़ोतरी हुई है, वैसे-वैसे भगर्भ जल का दोहन उतनी ही तेजी से नीचे गिरा है। देश में जहां 2.26 करोड़ हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र का क्षेत्रफल था, वह अब 6.8 करोड़ हेक्टेयर हो चुका है। ऐसी स्थिति में जल का इस्तेमाल भी सिंचाई के लिए तेजी से बढ़ा है और भूगर्भ जल लगातार घट रहा है। यही कारण है कि एक तरफ जहां तालाब, कुएं सूख रहे हैं, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में नलकूप खराब पड़ चुके हैं।

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की बात करें तो मेरठ, आगरा, लखनऊ, अलीगढ़, इलाहाबाद, लखनऊ, अमेठी, कानपुर जैसे जिलों में भूगर्भ जल संकट की स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है। मेरठ जैसे जिले में तो किसान कृषि क्षेत्र की 85 प्रतिशत भूमि में भूगर्भ जल का उपयोग कर रहे हैं।

केंद्रीय भूगर्भ जल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, अलीगढ़, इलाहाबाद, लखनऊ, कानपुर, अमेठी जैसे जिलों में जितना जल रिचार्ज नहीं हो रहा है, उससे कहीं ज्यादा लोग भूजल का उपयोग कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अलीगढ़ में 82.13, इलाहाबाद में 56.89, लखनऊ में 68.58, कानपुर में 84.53 और अमेठी में 68.47 प्रतिशत भूजल दोहन हर साल किया जा रहा है।

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यूपी के ही रायबरेली के सरैनी ब्लॉक की 81 ग्राम पंचायतें भयंकर जल संकट से जूझ रही हैं। ऐसे में इस क्षेत्र से लोग पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र को डार्क जोन घोषित किया जा चुका है।

सरेनी के पूर्व प्रधान बच्चा सिंह (38 वर्ष) बताते हैं, “इस क्षेत्र को डार्क जोन घोषित किया जा चुका है, मगर इस जल संकट से उबारने के लिए कोई योजना नहीं बनाई गई, ऐसे में हालात और भी खराब हो रहे हैं।“

उत्तर प्रदेश के नीर फाउंडेशन के प्रमुख रमन त्यागी ‘गाँव कनेक्शन’ से फोन पर बातचीत में बताते हैं, “अगर हम ऐसे ही भूजल का गलत इस्तेमाल करते रहे तो आने वाले 10-15 सालों में हमें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।“ वह आगे बताते हैं, “जैसे-जैसे कृषि क्षेत्र बढ़ रहा है, हमारे सामने भूजल संकट भयावह रूप में सामने आ रहा है। किसान भूजल का बड़ा भाग खेत की सिंचाई में उपयोग कर रहे हैं, जरुरत है कि किसान कृषि क्षेत्र में नहरों, तालाबों, जलाशयों पर आधारित सिंचाई अपनाएं, न कि भूजल को। भूजल एक सीमित जल है और इसके खत्म होने से खतरनाक स्थिति उत्पन्न हो सकती है।“

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