ग्राउंड जीरो रिपोर्ट: देवरिया के लक्ष्मीबाई, मंदाकिनी और नीलगिरी कक्ष का काला सच

शेल्टर होम का एक दरवाजा बगल की गली में खुलता है, गिरिजा त्रिपाठी और दूसरे लोग उसी दरवाजे से ही आते-जाते। दरवाजे के सामने गली में एक होटल है, जहां शाम होते ही शहर भर के लोगों का आना-जाना शुरू हो जाता है

ग्राउंड जीरो रिपोर्ट: देवरिया के लक्ष्मीबाई, मंदाकिनी और नीलगिरी कक्ष का काला सच

देवरिया। कई बरस पुराने इस मकान के अंदर क्या चलता था, आस-पास के लोगों को भी भनक नहीं लग पाई। और जब सच्चाई सामने आई तो लोग अब भी विश्वास नहीं कर पा रहे हैं।

देवरिया रेलवे स्टेशन से लगभग 200 मीटर दूर विंध्यवासिनी बालिका गृह 2009 से संचालित है, आसपास के लोगों की माने तो उन लोगों ने आज तक किसी लड़की की झलक तक नहीं देखी थी। आश्रय गृह के ठीक सामने पान की दुकान चलाने वाले आलम बताते हैं, "मैं कई साल से यहां पर दुकान चला रहा हूं, छत पर ही लड़कियों के कमरे हैं, लेकिन हमेशा बंद रहते थे, कभी कोई लड़की नहीं दिखाई दी। कभी दरवाजे-खिड़कियां तक नहीं खुलते थे। एक महिला पुलिस कभी-कभी आती थी जो लड़कियों को पेशी के लिए ले जाती थी।"

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पहली मंजिल पर लड़कियों के रहने के कमरे बने हैं, जिनके दरवाजों पर लक्ष्मीबाई कक्ष, मंदाकिनी कक्ष, नीलगिरी कक्ष और अरावली कक्ष लिखे गए हैं। नीले पेंट से रंगे ये दरवाजों व खिड़कियों को देखने पर लगता है कि इन्हें बहुत दिनों से नहीं खोला गया है। छत पर ही बाल गृह (वाटिका) लिखा बोर्ड लगा है, जिसका पेंट भी पूरी तरह से उधड़ चुका है।


शेल्टर होम का एक दरवाजा बगल की गली में खुलता है, गिरिजा त्रिपाठी और दूसरे लोग उसी दरवाजे से ही आते-जाते। शाम होने के बाद उस गली से कोई गुजरना नहीं चाहता, इस बारे में गली में प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले वीएन पाण्डेय ने बताया, "इसी शेल्टर होम के दरवाजे के सामने गली में एक होटल है, जहां पर शाम होते ही शहर भर के लोगों का आना-जाना शुरू हो जाता है। गली के ठीक सामने ही सड़क पर शराब की दुकान है, लोग इसी गली में खड़े होकर शराब पीते हैं, कई बार हम लोगों इसकी शिकायत भी लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। होटल में बाहर से लड़कियां आती हैं, जिसके बारे में सबको पता है, लेकिन बोलना नहीं चाहता है।"


"शाम होने के बाद इस गली से कोई आता जाता नहीं, इसी का फायदा इन लोगों ने उठाया, कई बार गली में गाड़ियां खड़ी रहती थीं, लेकिन हमने इस बारे में कभी ध्यान ही नहीं, गिरिजा त्रिपाठी शहर का एक सम्मानित नाम है, बड़े बड़े लोगों के साथ उनका उठना बैठना था, उनके बारे में कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था कि वो ऐसा कर सकती है, "वीएन पांडेय ने आगे बताया।

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गिरिजा त्रिपाठी देवरिया जिले के ही रुपई गाँव की रहने वाली हैं, उनके पति मोहन त्रिपाठी भटनी चीनी मिल में काम करते थे। एक बार भटनी चीनी मिल में नौकरी करते वक्त पति मोहन को निलंबित कर दिया गया तो, गिरिजा ने पति को बहाल करने के आत्मदाह करने की धमकी तक दे डाली थी। वीएन पांडेय बताते हैं, "उसी समय से गिरिजा पांडेय की पहचान बन गई, उसी के बाद उन्होंने संस्था की शुरूआत की।"

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बाहर से भी आती थीं लड़कियां

जब भी कोई लड़की कहीं से आती है तो पुलिस उन्हें यहां रात को छोड़ जाते थे और सुबह लेकर जाते थे, क्योंकि थाने पर लड़कियों को नहीं रख सकते। आश्रय गृह से कुछ ही दूर दुकान चलाने वाला एक शख्स ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया "अब पुलिस वाले थाने में लड़कियों को नहीं रख सकते इसलिए वो उन्हें यहीं छोड़ जाते थे।"


किराए के मकान में चलता था आश्रय गृह

जिस मकान में शेल्टर होम संचालित था वो शहर के विख्यात रामेश्वर राय विश्वम्भर राय लाला का मकान है जिसे उन्होंने कई साल पहले आर्य समाज को दान में दिया था। लेकिन उनकी चौथी-पांचवीं पीढ़ी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी जिसके बाद फैसला उनके पक्ष में गया। फिर उन्होंने 2009 में इसे आश्रय गृह चलाने के लिए किराए पर दे दिया। उसके बाद से वहां कोई झांकने तक नहीं गया।

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घर वाले ही चलाते थे सारे आश्रय गृह

गिरिजा त्रिपाठी कई जगह पर बालगृह बालिका, बाल शिशु गृह, वृद्धाश्रम संचालित करती थीं, जिसका कार्यभार उनके परिवार के ही लोगों ने ही संभाल रखा था। बाहर वालों को उसमें जाने की इजाजत नहीं थी, ऐसे में कोई जान ही पाया था कि अंदर क्या हो रहा है।

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