उस पत्रकार को भी जानिए, जिनकी हत्या का आरोप राम रहीम पर है, खोली थी बाबा के करतूतों की पोल

उस पत्रकार को भी जानिए, जिनकी हत्या का आरोप राम रहीम पर है, खोली थी बाबा के करतूतों की पोलपत्रकार रामचंद्र छत्रपति

लखनऊ। पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति वो पत्रकार थे जिनकी पत्रकारिता की वजह से आज डेरा प्रमुख बाबा राम रहीम जेल में पहुंचा। वक्त का पहिया घूमा, पत्रकार का हत्यारा दूसरे मामले में ही सही, सलाखों के पीछे पहुंचा। रामचंद्र का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ और उन्होनें वकालत की पढ़ाई पूरी की। पर खुद को इस पेशे के गुणा भाग में फिट ना कर सके।

इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता के पेशे से जुड़ कर बतौर पत्रकार काम करना शुरू किया और कई अखबारों के लिए काम किया। पर शायद उनकी फितरत को किसी तरह का समझौता मंजूर नही था, या फिर कहें कि सिस्टम में फिट नहीं हो पाते थे। उन्होंने हरियाणा में ही रह कर एक स्थानीय अखबार चलाना शुरू किया। अखबार का नाम था, पूरा सच और इस पूरा सच के सहारे उन्होंने सिस्टम को बदलने की कोशिश शुरू की। उन दिनों डेरा आज की तरह नहीं था पर उस वक्त भी काफी प्रभावशाली था। रामचंद्र छत्रपति ने अपने अखबार के जरिए डेरा के खिलाफ लगातार रिपोर्ट प्रकाशित की।

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रामचंद्र छत्रपति ही वो पहले पत्रकार थे जिन्होंने अपने अखबार के जरिये राम रहीम के खिलाफ 15 वर्ष पहले साध्वी के साथ यौन शोषण का मामला उजागर किया था। अपने सांध्य दैनिक अखबार 'पूरा सच' में वो अक्सर राम रहीम से जुड़ी करतूतें प्रकाशित किया करते थे। उनके अखबार में गुरमीत सिंह के आने के बाद डेरे की संपत्तियों में गुणात्मक इजाफा होने और उसकी तड़क-भड़क देखकर अनुयायियों की संख्या बढ़ने की बात छपी।

कोई सार्वजनिक चढ़ावा स्वीकार नहीं करने के बावजूद संपत्ति में ऐसी वृद्धि पर छत्रपति ने खबरें जमा करनी शुरू की। उन्होंने पाया कि आसपास के गांवों के लोग या तो अपनी जमीन डेरे को बेच रहे हैं या दान दे रहे हैं। हर वक्त हजारों लोग चौदह-पंद्रह घंटे बिना मजदूरी लिए काम कर रहे हैं। लोग ऊपरी तौर पर इसे आस्था का मामला समझ रहे थे लेकिन मामला सिर्फ आस्था का नहीं था। उन्होंने अपनी खोजबीन पर आधारित कई तथ्यपूर्ण खबरें अपने अखबार में प्रकाशित की।

फिर चाहे वह डेरे के लोगों द्वारा आस-पड़ोस के लोगों को धमकाकर या तंग करके जमीन बेचने की खबर हो, अनुयायियों की जीप से कुचलकर एक बच्ची के कुचले जाने के बाद अनुयायियों द्वारा पीड़ित परिवार को धमकाने का मामला हो, तारों में हुक लगाकर सालाना सत्संग के समय शहर को चमकाने की खबर हो या फिर किसी साध्वी के यौन-शोषण की सनसनीखेज खबर, सभी को उन्होंने अपने अखबार में प्रमुखता से जगह दी।

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उनकी खबरों की प्रमाणिकता इतनी ठोस होती थी कि इसके बारे में डेरा अनुयायियों के पास कोई भी कोई तर्क या खंडन नहीं होता था। इसी क्रम में उन्होंने अपने अखबार में वही चिट्ठी छाप दी थी जो साध्वी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, चीफ जस्टिस पंजाब और हरियाणा हाइकोर्ट सहित कई लोगों को भेजी थी।

20 अक्टूबर, 2002 को सिरसा में 'पूरा सच' के बैनर तले विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था। जिसमें योगेंद्र यादव इसमें मुख्य वक्ता थे। आभार व्यक्त करने के लिए जब छत्रपति मंच पर आये तब उन्होंने कहा था कि 'न जाने क्यों मेरे अन्य पत्रकार साथी बेबाकी के साथ नहीं लिख पा रहे हैं। उनके पास सामर्थ्य है शक्ति है, और वो वक्त जल्दी ही आयेगा जब मेरे साथी पत्रकारों कि कलम भी बेबाकी के साथ चलेगी।'

24 अक्टूबर, 2002 को जब वो अपने कार्यालय का कार्य निपटा कर अपने घर आ चुके थे, तब डेरा के विरोध में खुल कर आने के कारण राम रहीम के लोगों ने उनपर गोलियां चलवा दी। गोली लगने के बाद वो 28 दिनों तक अस्पताल में मौत से लड़ते रहे। इस दौरान पुलिस को दिये गये अपने स्टेटमेंट में उन्होंने राम रहीम का नाम भी लिया लेकिन पुलिस ने राम रहीम का नाम केस में नहीं डाला। गोली लगने से पहले उन्होंने डेरे की आमदनी के स्रोतों का भंडाफोड़ करने की बात कही थी। छत्रपति ने उस समय बीमा लेने से इंकार कर दिया था। उनकी मौत से तकरीबन तीन माह पहले ही सरकार ने सभी पत्रकारों का बीमा कराने का आदेश जारी किया था।

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उस गोष्ठी के बारे में स्वराज इंडिया के अध्यक्ष/संस्थापक योगेंद्र यादव अपने फेसबुक पर लिखते हैं

"जब भी मैं डेरा सच्चा सौदा के बारे में सुनता हूँ, मुझे 20 अक्टूबर 2002 की याद आ जाती है। उस दिन मैं हरियाणा के शहर सिरसा में था, जो डेरे के मुख्यालय के नज़दीक है। मुझे वहां के अखबार "पूरा सच" के संपादक रामचंद्र छत्रपति जी ने "वैकल्पिक राजनीती और मीडिया की भूमिका" विषय पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया था। एक ईमानदार और साहसी पत्रकार के रूप में छत्रपति जी की ख्याति और सिरसा शहर की पंजाबी और हिंदी की साहित्यिक मण्डली ने मुझे अभिभूत किया था। भाषण के बाद छत्रपति जी मुझे दूध-जलेबी खिलाने ले गए। वहीँ सड़क के किनारे बैठकर मैं उनसे डेरा सच्चा सौदा के बारे में सुनने लगा। उन्होंने मुझे पहली बार एक साध्वी द्वारा बाबा के खिलाफ यौन शोषण के आरोप के बारे में बताया। डेरे के अंदर की बहुत ऐसी बातें बतायीं जो मैं यहाँ लिख नहीं सकता। यह सुनकर मैंने कहा "अगर ये धर्म है तो अधर्म क्या है?"

छत्रपति जी मुस्कुराये, बोले ये बोलने की किसी में हिम्मत नहीं है। कोई वोट के लालच में चुप है, कोई पैसे के लालच में चुप है। लेकिन "पूरा सच" में हमने साध्वी की चिठ्ठी छाप दी है। उससे बाबा बौखलाए हुए हैं। चिठ्ठी छपने के महीने के अंदर उसे लीक करने के शक में भाई रंजीत सिंह की हत्या कर दी गयी। सुनकर मैं सिहर गया। पूछा "रामचंद्र जी, आपको खतरा नहीं है"? बोले "हाँ कई बार धमकियाँ मिल चुकी हैं, क्या होगा कोई पता नहीं। लेकिन कभी न कभी तो हम सबको जाना है।"

चार दिन बाद खबर आयी कि रामचंद्र छत्रपति के घर पर हमलावरों ने उन्हें पांच गोलियां मारी। कुछ दिन के बाद छत्रपति जी चल बसे। हरियाणा सरकार (उन दिनों चौटाला जी की लोक दल की सरकार थी) ने हत्या की ढंग से जांच तक नहीं करवाई, प्रदेश भर के पत्रकार खड़े हुए, फिर भी सरकार CBI जांच के लिए न मानी।

आखिर पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के आदेश के बाद CBI जांच हुई (उसे भी डेरे ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, रिटायर्ड जस्टिस राजेंद्र सच्चर के खड़े होने के बाद कहीं जाकर जांच शुरू हो सकी) जांच के बाद CBI ने रामरहीम और उनके विश्वासपात्रों को छत्रपति जी की हत्या का आरोपी बनाया। वो मुकदमा अभी चल रहा है। फैसला आना बाकी है। जब भी बाबा का कोई केस कोर्ट में लगता है, उनके हज़ारों अनुयायी कोर्ट को घेर लेते हैं (वैसे अभी तक किसी जज पर हमले की खबर नहीं है) उसके बाद आयी कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकारें डेरे के सामने नतमस्तक रही हैं। डेरे के लोग हर चुनाव से पहले खुल्लमखुल्ला पार्टियों से वोट की डील करते हैं। 2014 के हरियाणा विधान सभा चुनाव में डेरे ने बीजेपी को समर्थन दिया था। चुनाव जीतने के बाद खट्टर जी तो अपनी पूरी कैबिनेट को सिरसा लेकर बाबा का धन्यवाद करने गए थे।"

रामचंद्र के बेटे अंशुल ने पिछले 15 साल से अपने पिता की हत्या के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं। एक समाचार एजेंसी को अंशुल ने बताया कि पिता को गोली लगने के बाद वो अस्पताल में 28 दिनों तक मौत से जंग लड़ते रहें। इस दौरान पुलिस को दिए अपने स्टेटमेंट में उन्होंने राम रहीम का नाम भी लिया लेकिन पुलिस ने राम रहीन का नाम केस में नहीं डाला। जिसके बाद मैंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर की और जिसके बाद 2003 में यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था।

पुलिस ने राम रहीम का आरोपी नहीं बनाया, मामला CBI को

अंशुल बताते हैं कि जिस वक्त मेरे पिता की हत्या की गई तो मेरी उम्र सिर्फ 21 वर्ष थी और मुझे पता नहीं था कि मैं इंसाफ के लिए कहां जाउं, पुलिस ने अपनी एफआईआर में डेरा चीफ का नाम नहीं दर्ज किया। जिसके बाद मैंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर की और जिसके बाद 2003 में यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था। जबसे डेरा चीफ के खिलाफ अंशुल ने अपनी लड़ाई शुरू की उन्हें लगातार जान से मारने की धमकी मिलती रही, यही नहीं बहुत ही मुश्किलों से अंशुल अपने पिता के अखबार पूरा सच को चला रहे हैं। अंशुल कहते हैं कि मेरे पिता ने 28 दिन तक मौत से लड़ाई लड़ी थी, उन्होंने स्थानीय पुलिस को अपने बयान में डेरा चीफ को आरोपी तक बताया था, बावजूद इसके पुलिस ने डेरा चीफ का नाम एफआईआर में दर्ज नहीं किया और तभी से मेरी इंसाफ के लिए लड़ाई शुरू हुई थी।

डर के मारे घर में लगवाया सीटीवी कैमरा

पिछले 15 साल से इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे अंशुल के चेहरे में संघर्ष और चिंता का भाव साफ देखा जा सकता है। बाबा राम रहीम के खिलाफ कोर्ट के फैसले से पहले अंशुल ने अपने घर पर सीसीटीवी कैमरे लगवा लिए हैं। जब उनसे पूछा गया कि आपने सीसीटीवी कैमरे क्यों लगवाएं है तो उन्होंने बताया कि कल फैसला आने वाला है, ऐसे में यह जरूरी है। डेरा चीफ के खिलाफ ना सिर्फ पूरा सच अखबार के संपादक रामचंदेर छत्रपति की हत्या बल्कि डेरा के एक पुराने सदस्य की हत्या का भी आरोप 2002 में लगा था। इस व्यक्ति पर आरोप था कि उसने डेरा के सिरसा स्थित मुख्यालय में गलत कामों को उजागर किया था, जिसमें महिलाओं के साथ यौन शोषण बड़ा मुद्दा था।

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