आधा देश सूखे की चपेट में, आखिर क्यों?

देश में सूखे के नए आंकड़े आ गए हैं। आधा देश इस समय सूखे की चपेट में है। हैरत की बात ये है कि अभी कुछ महीने पहले ही देश में कई जगह बाढ़ की खबरों से मीडिया भरा हुआ था।

आधा देश सूखे की चपेट में, आखिर क्यों?

देश में सूखे के नए आंकड़े आ गए हैं। आधा देश इस समय सूखे की चपेट में है। हैरत की बात ये है कि अभी कुछ महीने पहले ही देश में कई जगह बाढ़ की खबरों से मीडिया भरा हुआ था।

खासतौर पर केरल में बाढ़ से तबाही हमारे सामने थी। उस समय 'गाँव कनेक्शन के इसी स्तम्भ में एक आलेख लिखा गया था कि 'यही बाढ़ बनेगी सूखे का सबब।' पिछले साल जुलाई के महीने तक देश के कई हिस्से बाढ़ की चपेट में थे। देश का मौसम विभाग सामान्य वर्षा का अनुमान लगा रहा था। सरकारी विभाग का हिसाब देश में औसत बारिश से लगता है। यानी कहीं भारी सूखा और कहीं बाढ़ को मिलाकर औसत वर्षा को सामान्य बताना कोई नई बात नहीं है।

याद करें तो पिछले मानसून ने तय समय से दो हफ्ते पहले पूरा देश कवर कर लिया था। सामान्य वर्षा के आंकड़ों के बीच उस समय बारिश का पानी नदियों को उफनाता और तबाही मचाता हुआ समुद्र में चला जा रहा था। तब इसी स्तंभ में लिखा गया था कि बाढ़ से बचने का सबसे बड़ा उपाय जल संभरण की अपनी क्षमता को बढ़ाना है।

बारिश के पानी को आबादी वाले इलाकों में तबाही मचाने से रोकने के लिए पानी का संभरण न सिर्फ बाढ़ से बचाता है बल्कि निकट भविष्य में पड़ने वाली पानी की ज़रूरत के लिए भी काम आता है। आज की स्थिति को देखें तो पिछले साल के सामान्य मानसून के दावों के बाद भी आज देश के कई इलाके सूखे की चपेट में हैं। इसीलिए जल संरक्षण और सूखा प्रबंधन पर विश्लेषण की दरकार एक बार फिर है।

यह भी पढ़‍ें: जल प्रबंधन में कुशल केरल क्यों डूबा बाढ़ में, यह त्रासदी सबक है पूरे देश के लिए

फोटो: गाँव कनेक्शन

क्या हैं सूखे के नए आंकड़े

हमारा देश आकार में इतना बड़ा है कि कोई भी सर्वेक्षण या आकलन पूरी तरह सही तस्वीर बताने का दावा नहीं कर सकता। लेकिन शोध पद्धति और सैंपलिंग के नए तरीके विकसित होने से काफी कुछ सही आकलन होने लगे हैं। अपने देश में सूखे और उससे जुड़ी दूसरी समस्याओं पर सर्वेक्षण और विश्लेषण का काम इस समय आईआईटी गाँधीनगर के जिम्मे है।

आईआईटी गांधीनगर की वाटर एंड क्लाइमेट लैब ने इस साल भारत में सूखे की स्थिति के आंकड़े जारी कर दिए हैं। उसके मुताबिक इस समय देश का 47 फीसदी हिस्सा यानी करीब आधा देश सूखे की चपेट में है। सूखे की चपेट में देश के इस सैतालीस फीसदी भूभाग में 16 फीसदी इलाके ऐसे हैं, जिन्हें एक्सट्रीम ड्रॉट यानी अत्यधिक या भयंकर सूखे की श्रेणी में रखा गया है।

एक नज़र असमान वर्षा पर

इसी साल यानी 2018-2019 में सामान्य वर्षा पर सरकारी संतोष जताया गया था। और इसी साल सूखे का संकट खड़ा है। आंकड़ों के जरिए ही पता करें तो इसका कारण यह निकलता है कि बारिश के दिनों देश में असमान वर्षा हुई थी। चार जोन में बंटे देश में अलग-अलग जोन के आंकड़ों में बड़ा फर्क था। लेकिन सबको मिलाकर और औसत निकालकर स्थिति सुखद बता दी गई।

पिछले साल अरुणांचल प्रदेश, झारखंड, दक्षिणी आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु के उत्तरी इलाकों में बहुत कम पानी गिरा था। अब इसमें कौन सी हैरत की बात है कि यही इलाके इस समय सबसे ज्यादा सूखे की चपेट में हैं। सूखे का सर्वेक्षण जारी करने वाली वाटर एंड क्लाइमेट लैब में मौसम और बारिश के आंकड़े भारतीय मौसम विभाग से इकट्ठे किए जाते हैं। जिनका इस्तेमाल मिट्टी की नमी और भूजल जैसे कारकों का हिसाब लगाने में होता है। और इसी बिनाह पर सूखे का आंकलन होता है। क्या अंदेशे खड़े हो गए हैं?

यह भी पढ़‍ें: रिकॉर्ड कृषि उत्पादन का हासिल क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति आने वाली गर्मियों में बड़ी मुश्किलें खड़ी कर देगी। अगर मानसून से पहले गर्मी ज्यादा पड़ गई तो सूखे का असर भयावह हो जाएगा। उसके बाद इस साल कैसी वर्षा होगी इसका भी कोई सटीक अनुमान नहीं लग सकता। लेकिन इतना तय है कि अगर कम बारिश होती है तो हालत और ज्यादा भयावह हो जाएंगे।

कम बारिश का सीधा असर अभी से गंभीर स्थिति में पहुँच चुके भूजल स्तर पर पड़ेगा। आज की हालात में भी सूखे वाले इलाकों में सबसे ज्यादा बुरा असर भूजल के स्तर पर ही पड़ा है। पिछले दिनों कई अंतरराष्ट्रीय रपटें भारत में आने वाले भूजल संकट को लेकर चेता भी चुकी हैं। उन रपटों के मुताबिक आने वाले वर्षों में भारत में कई इलाके ऐसे पाए जाएंगे जहाँ भूजल समाप्त हो चुका होगा।

ऐसे में अगर सूखे की तीव्रता बढ़ती है तो भूजल घटने की रफ़्तार और बढ़ेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस समस्या का हल अगर जल्द नहीं ढूँढा गया तो इसका असर पर्यावरण के साथ-साथ अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, खासतौर पर कृषि क्षेत्र पर।


क्या उपाय सुझाए विशेषज्ञों ने?

सूखे की स्थिति पर रिपोर्ट के साथ विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने हमेशा की तरह कुछ उपाय भी सुझाए हैं। उनका कहना है कि शहरों में पानी बचाने की मुहिम ज्यादा कारगर नहीं है। क्योंकि घरेलू काम में पानी की खपत थोड़ी सी ही है। इसीलिए आईआईटी के जल विज्ञानियों को यही समझ पड़ रहा है कि खेती में पानी के इस्तेमाल में बदलाव लाकर हालात में थोड़ा बहुत सुधार लाया जा सकता है।

उनका हिसाब यह है कि इस समय भारत में कृषि क्षेत्र करीब 80 फीसदी ताज़ा पानी इस्तेमाल कर रहा है। लिहाजा उनका सुझाव यह है कि कुछ फसलें जैसे चावल जिन्हें उगाने में ज्यादा पानी लगता है, उन्हें पानी की कमी वाले इलाकों में ना उगाया जाए। यह सुझाव जल विज्ञानियों का ही है जबकि कृषि विशेषज्ञ पहले से ही वह तरीका ढ़ूंढने में लगे हैं कि देश में क्रॉप पैटर्न में बदलाव के लिए किया क्या जाए।

यह भी पढ़‍ें: किसान आंदोलनों की बदलती राजनीतिक समझ

दिक्कत यह है कि इस उपाय में यह नहीं बताया जाता है कि वह किसान दूसरी कौन सी फसल उगाए? नई फसल उगाने के नए तरीके वह कहाँ से सीखे। उस फसल को उगाने के लिए नई खाद, नए बीज, नए कीटनाशक खरीदने का बाज़ार कहाँ से ढूंढें। नई फसल को बेचने का बाज़ार कहां तलाशें। फसल बदलवाने के सुझाव से किसान के सामने सवालों के ढेर खड़े हो जाएंगे।

एक तरफ जब किसान से अपनी पारंपरिक फसल छोड़ कर कुछ नया उगाने को कहा जायेगा तो उसका दुविधा में होना जायज़ है। और दूसरी ओर आज कल सरकारें आए दिन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही हैं क्योंकि देश के भूख और कुपोषण के आंकड़े सरकार को परेशान किए हुए हैं। ऐसे में ज्यादा पानी वाली मुख्य फसलों की जगह कुछ और उगाने का तर्क जल विज्ञान के लिहाज़ से तो ठीक हो सकता है लेकिन उसके क्रियान्वन के लिए भारी संसाधन और बहुत बड़ी व्यवस्था की ज़रूरत पड़ेगी। लिहाजा इस सुझाव में इस वक़्त दम नज़र नहीं आता।

आगे से पानी रोककर रखने की क्षमता बढ़ाने का सुझाव

सूखा यानी पानी की कमी। किसी भी देश में पानी की कमी या तो कम बारिश की वजह से होती है या लचर जल प्रबंधन की वजह से। भारत में सूखे का कारण कम बारिश कतई नहीं है। हर साल हमें 4000 अरब घन मीटर पानी प्रकृति से मिल रहा है। इसमें से इस्तेमाल करने लायक 1123 अरब घन मीटर पानी भूजल और सतही जल के रूप में उपलब्ध है। लेकिन इस उपलब्ध पानी को हम पूरा इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।

इसमें से काफी पानी हर साल बारिश के महीनों में नदियों-नालों से होता हुआ बाढ़ लाता समुद्र में चला जा रहा है। सरकारी आंकड़े के हिसाब से भी हमारी जल संचयन क्षमता सिर्फ 257 अरब घन मीटर है। यानी अभी तक हमारे पास सिर्फ इतनी सी क्षमता के छोटे-बड़े बांध उपलब्ध हैं। इनमें से भी नियमित रूप से सिर्फ मुख्य 91 जलाशयों के आंकड़े उपलब्ध कराये जाते हैं।

सेंट्रल वाटर कमीशन यानी केन्द्रीय जल आयोग हर हफ्ते वीकली रिजर्वायर स्टोरेज बुलेटिन जारी करता है। इस साल फरवरी के आखिरी हफ्ते के बुलेटिन के अनुसार इस समय मुख्य 91 जलाशयों की संभरण क्षमता 161.99 अरब घन मीटर है। लेकिन उसमें उपलब्ध पानी सिर्फ 65 अरब घन मीटर ही है। यानी कुल क्षमता का 40 फीसदी। ये आंकड़े इस बात को बताने के लिए काफी हैं कि बारिश के पानी को रोक कर रखने की हमारी क्षमता किस हद तक कम है। देश के कई जलाशय इस समय अपनी क्षमता से 18 से 20 फीसदी पानी ही संरक्षित किये हुए हैं।

यानी सूखे और बाढ़ दोनों से निपटने के लिए इस साल की बारिश आने से पहले पुराने जलाशयों की संभरण क्षमता को दुरुस्त करने में जुटना पड़ेगा। उधर दीर्घकालिक उपाय करने के लिए जल्द से जल्द और ज्यादा से ज्यादा नए जलाशय बनाने के काम पर लगना ही पड़ेगा।

(सुविज्ञा जैन प्रबंधन प्रौद्योगिकी की विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रनोर हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

यह भी पढ़‍ें: तो फिर वर्षा का पूर्वानुमान किसान के किस काम का

Share it
Top