ग्राउंड रिपोर्ट: कबाड़ के भाव बिक रहीं हैंडलूम मशीनें, चौपट हो रहा हाथों का ताना-बाना

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   7 Sep 2019 5:38 AM GMT

बिजनौर (उत्तर प्रदेश)। अपनी मेहनत की कमाई से खरीदे गए चार हैंडलूम, एक ताना और बाइंडर मशीन पिछले साल कबाड़ में बेचकर बिजनौर के मोहम्मद उफरान ने अपने गांव में किराने की दुकान खोल ली है। खर्च चलाने के लिए वो इसी दुकान में सिलाई की मशीन भी रखे हैं।

मोहम्मद उफरान (55वर्ष) दिल्ली से करीब 175 किलोमीटर दूर यूपी के बिजनौर जिले के सेढ़ा गांव में रहते हैं। यूपी का ये जिला हैंडलूम का गढ़ कहा जाता रहा है है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यहां सैकड़ों कारखाने बंद हो गए हैं, लोग अपना परंपरागत काम समेट कर दूसरे काम करने लगे हैं।

गांव कनेक्शन जब सेढ़ा गांव पहुंचा तो उफरान अपनी परचून की दुकान पर बैठे थे। हैंडलूम का काम बंद करने की वजह पूछने पर कहते हैं, "2013 में मैंने ये काम शुरू किया। शुरू में काम अच्छा चला। लेकिन फिर नोटबंदी हो गई। हमें बहुत नुकसान हुआ। उससे उबरे तो जीएसटी लग गया। इससे माल महंगा हो गया। मजदूर बाहर चले गए। मजबूरी में मैंने पिछले साल सभी मशीनें कबाड़ में बेच दी। जिन मशीनों की कीमत ढाई लाख रुपए थी उसे 25-25 हजार में बेचा।"

उत्तर प्रदेश का बिजनौर जिला अपने हथकरघा, दस्तकारी के कारोबार के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता रहा है। जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर नहटौर क्षेत्र में कभी हर घर में हैंडलूम का काम होता था। लेकिन अब करोबार 50 फीसदी से भी कम बचा है। कारोबारियों के मुताबिक कभी 2.5 लाख मशीनें यहां लगी थीं, अब मुश्किल से 45 हजार बची हैं।

कारखानों में अब थोड़ा बहुत काम ही बचा है

बिजनौर के अलावा यूपी में मऊ, आजमगढ़, बनारस, भदोही, मिर्जापुर, गाजीपुर समेत कई जिलों में हैंडलूम (हथकरघा) का काम होता है। साल 2009-10 में हुई हथकरघा जनगणना के अनुसार देश में 43 लाख लोग इस कारोबार से जुड़े हैं। लेकिन पिछले एक दशक से भारत में हैंडलूम का काम तेजी से घटा है।

एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक (EXIM) की एक रिपोर्ट कहती है कि 2013-14 में भारतीय हैंडलूम प्रोडक्ट का कुल निर्यात 370.2 मिलियन डॉलर (26,65,16,23,500 रुपए) था। 2014-15 में यह घटकर 367.4 मिलियन डॉलर (26,45,00,44,500 रुपए ) पर आ गया।


2015-16 में 360 (25,91,73,00,000 रुपए ), 2016-17 में 355.6 (25,60,05,33,000 रुपए) और 2017-18 में कुल निर्यात का आंकड़ा 353.9 मिलियन डॉलर (25,47,81,45,750 करोड़ रुपए) तक पहुंच गया। एक समय ऐसा भी था जब भारत हैंडलूम प्रोडक्ट का सबसे बड़ा निर्यातक था। दुनिया के बाजारों में भारत की हिस्सेदारी 95 फीसदी थी।

वहीं इन्हीं वर्षों में आयात की स्थिति देखेंगे तो पूरी स्थिति समझ आ जाती है। 2013-14 में देश हैंडलूम प्रोडक्ट का आयात 18.8 मिलियन डॉलर (1,35,34,59,000 रुपए) का हुआ। 2014-15 में इसमें थोड़ी गिरावट आयी और कुल आयात 10.2 मिलियन डॉलर (73,42,47,000 रुपए) का हुआ। 2015-16 में आयात फिर बढ़ा और यह 10.4 मिलियन डॉलर (74,86,44,000 रुपए) हो गया।

लेकिन इसके ठीक अगले साल (2016-17) आयात घटकर आधा 5.4 मिलियन डॉलर (38,87,19,000 रुपए) हुआ। जबकि 2017-18 में आयात में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ोतरी हुई और आंकड़ा 10.8 मिलियन डॉलर (77,74,38,000 करोड़ रुपए) तक पहुंच गया जो भारतीय हैंडलूम की मौजूदा स्थिति को बताता है।

टेक्सटाइल मंत्रालय भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार हैंडलूम क्षेत्र में रोजगार तो घटा ही है साथ में उत्पादन भी बहुत कम हुआ है।

2014-15 में हथकरघा कपड़े का सालाना उत्पादन 64,333 मिलियन स्क्वायर मीटर हुआ था जो 2016-17 में घटकर 63,480 मिलियन स्क्वायर मीटर पर आ गया।

मिलियन डॉलर कारोबार और बड़े-बड़े आंकड़ों की इन रिपोर्ट में उतार-चढ़ाव का असर कैसे लोगों पर जिंदगी पर पड़ा है, बिजनौर उसका जीता-जागता उदाहरण है। बिजनौर के नटहौर, फुलसंदा, सेढ़ी, सेढ़ा, मिलक, करौंदा, रवाना शिकारपुर, बास्टा, पीपली, स्योहारा, ताजपुर, नूरपुर, चांदपुर, नगीना आदि क्षेत्र वस्त्रों की बुनाई के लिए जाने जाते थे।

कभी हैंडलूम का काम करने वाले मोहम्मद उफरान अब किराना की दुकान चला रहे हैं

पश्चिमी यूपी के इस जिले में देशभर के कारीगर काम करने आते थे। यहां का बना स्कार्फ, स्टॉल, साफा, चादरें और मफलर पूरे देश के साथ कई देशों में निर्यात भी होता था। नटहौर क्षेत्र में 100 गांवों में हैंडलूम-पावरलूम का काम होता था, उन्हीं में एक गांव सेढ़ा भी है। लेकिन अब यहां सन्नाटा पसार रहता है।

हम जब सेढा गांव के सबसे बड़े कारोबारी जुल्फिकार अली (53) के घर पहुंचे तो वे बेना चला रहा था (लकड़ी से बना हाथ का पंखा)। पड़ोस के घर में शादी थी जिस कारण गांव के और लोग उनके घर में जुटे थे।

हैंडलूम की स्थिति पर सवाल पूछने पर जुल्फिकार कहते हैं, " हालात का क्या है, आपके सामने है। अभी दोपहर के दो बजे हैं। रात 10 से बिजली गई है। इतनी गर्मी में बिना बिजली के तो हमारा काम हो नहीं सकता। अब काम ही नहीं है। लोकल मार्केट के लिए थोड़ा-बहुत काम होता है तो जब बिजली आती है तब कारीगर काम शुरू कर देते हैं। मेरे पास 10 पॉवरलूम मशीनें भी थीं, आठ बेच दी हैं, दो पर थोड़ा बहुत काम हो रहा है।" वस्त्र उद्योग में जो मशीनें हाथ से चलती हैं उन्हें हथकरघा (हैंडलूम) और जो बिजली से चलती हैं उन्हें पावरलूम कहते हैं।

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कारोबार कैसे प्रभावित हुआ? इस बारे में जुल्फिकार बताते हैं, " ऐसा नहीं है कि हमारा काम अचानक से बंद हो गया। नोटबंदी से हमारे पास कैश की कमी हो गई। मजदूर बाहर चले गए। जिसके चलते जो आर्डर मिले थे वो पूरे नहीं हुए। फिर नए आर्डर ही नहीं मिले। पॉवरलूम हो या हैंडलूम, सब बंद हो गया है। पॉवरलूम का काम भी तो बिना हाथों के नहीं होता।"

हैंडलूम कारोबारी जुल्फिकार के घर बैठे लोग। इस कारोबार के लिए बिजली अभी भी बड़ी समस्या है

जुल्फिकार जीएसटी का गणित समझाते हैं, "हमें कच्चे माल पर 12 फीसदी टैक्स देना होता है, लेकिन जब यही माल तैयार (तैयार कपड़ा) हो जाता है तो उस पर 5 फीसदी टैक्स लगता है, यानि 7 फीसदी नुकसान हुआ। सरकार कहती है कि कच्चे माल से बने कपड़े को ज्यादा दामों में बेचा जाता है इसलिए हमारा पैसा रिटर्न भी नहीं होता।" जूल्फिकार के दो बेटे उनका काम देखते थे, अब दोनों कमाने के लिए दूसरे प्रदेश चले गए हैं। जूल्फिकार करते हैं, पहले मेरे यहां हर वक्त 10-12 लोगों को काम मिलता था, अब मेरे बेटे ही बाहर कमाने गए हैं।"

भदोही के कालीन की तरह यहां के हाथों की कारीगरी अमेरिका और यूरोपियन देशों में खूब पसंद की जाती थी। धीरे-धीरे ये काम पॉवरलूम से होने लगे लेकिन स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ।

"जिले के हैंडलूम करोबार का सालाना टर्नओवर 250 करोड़ रुपए से ज्यादा हुआ करता था। लेकिन अब यह 50 करोड़ रुपए तक सिमट गया है।" 51 वर्षीय जलालुद्दीन कहते हैं। जलालुद्दीन क्षेत्र के जाने माने निर्यातक रहे हैं, खुद की भी 8 मशीनें थीं। वे कहते हैं, " यहां के हथकरघा करोबार से लगभग 15, 000 लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ था जबकि 80 हजार से ज्यादा लोग इससे अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े थे। पूरा ताना-बाना ही खत्म हो गया है।"

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जलालुद्दीन भी उन लोगों में शामिल हैं, जिनके यहां ये काम पीढ़ियों से होता आया है। लेकिन कारोबार की स्थिति उन्हें मायूस करती है। लाचारी वाले भाव में वो कहते हैं, "पहले हमारे हाथों की कलाकारी लोगों को खूब पसंद आती थी। लेकिन चीन के आने के बाद हमारा कारोबार मंदा होने लगा। 2016 के बाद स्थिति ज्यादा खराब हुई। पहले नोटबंदी फिर जीएसटी। इन दो झटकों से हम उबर ही नही सके। इसके बाद रही सही कसर प्रदेश सरकार पूरी कर दे रही है।"

बिजनौर के कारोबारियों के लिए बिजली की आवाजाही बड़ी समस्या है। जलालुद्दीन कहते हैं, "सरकार का दावा है कि यहां 17 से 18 घंटे बिजली दी जा रही है। सच्चाई आपके सामने हैं। बिजली की दरें भी बढ़ा दी गईं। खर्चे बढ़ने से हमारे सामने काम बंद करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प बचा ही नहीं। पहले दिनभर काम होता था। हैंडलूम मशीनों का शोर था। लेकिन हमें दुख भी है कि हम अपने पुश्तैनी काम को जिंदा नहीं रख पा रहे हैं।"

जहां कभी कारीगरों की भरामार हुआ करती थी, मशीनों का शोरगुल था, वहां अब सन्नाटा पसरा है

देश की टेक्स्टाइल्स इंडस्ट्री भी इस समय मंदी की चपेट में है। नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार देश का कपड़ा व्यवसाय पिछले 9 साल के सबसे बुरे दौर में है। पिछली बार 2010-10 में इस इंडस्ट्री में 2010-11 ऐसी मंदी आई थी।

अप्रैल-जून 2019 की तिमाही में कपास से बने उत्पादों का निर्यात 34 फीसदी से ज्यादा गिरा है। पिछले साल इसी समय में 1,063 मिलियन डॉलर (76,52,00,55,000 रुपए) का कारोबार हुआ था जो अब 696 मिलियन डॉलर (50,12,48,76,000 रुपए) तक पहुंच गया है।

नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन ने पिछले दिनों अखबार में विज्ञापन देकर सरकार से मदद की गुहार लगाई

देश में कपड़े के करोबार से लगभग 10 करोड़ लोग जुड़े हैं और देश की जीडीपी में इस क्षेत्र योगदान 2 फीसदी है। कारोबार घटने से लाखों लोगों का रोजगार भी छिन चुका है।

नटहौर के अफसार अहमद (41) बुनाई-तनाई काम करते हैं और करवाते भी हैं। वे हमें बढ़ती लागत का गणित समझाते हैं, "दो मीटर लंबा और 28 इंच चौड़ा स्टॉल (शॉल) बनाने में दो से तीन घंटे लगते हैं। मैं यहां बस बुनाई की बात कर रहा हूं। इसके पीछे कुल लागत 80 रुपए पड़ती है, जबकि बाजार में हमें इसकी कीमत 78 से 80 रुपए मिलती है। 80 रुपए में मिला तो ठीक वरना नुकसान ही उठा रहे हैं। पहले जब लागत कम थी तब फायदा 15 से 18 रुपए का फायदा होता था।"


अफसार के मुताबिक वो जीएसटी वाला काम नहीं करते, न उसकी जानकारी है लेकिन ग्रामीण इलाकों की बिजली महंगी हुई है। सूत (यार्न) महंगा हुआ है। बस हमारा मुनाफा नहीं बढ़ा।

देश में पश्चिम बंगाल के बाद आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा हैंडलूम का कारोबार होता है। आंध्र प्रदेश की एनजीओ राष्ट्र चेतना जन सामाख्या जो देशभर में फैले हैंडलूम करोबार पर काम करती है, उसके अध्यक्ष मोहन राव गांव कनेक्शन से फोन पर कहते हैं, " सच तो यह है कि सरकार खुद स्थिति के लिए जिम्मेदार है। अब अगर बजट पर ही नजर डालेंगे सरकार की मंशा साफ हो जाती है। हैंडलूम सेक्टर के लिए सरकार ने 2014-15 के बजट में 621.51 करोड़ रुपए दिया था। 2015-16 में इसे घटाकर 486.60 करोड़ रुपए कर दिया गया। 2016-17 के बजट में अच्छी खासी बढ़ोतरी की गई और रुपए बढ़ाकर 710 करोड़ कर दिये गये।"

बंद पड़ी मशीनें

मोहन राव आगे बताते हैं, "इसके बाद से फिर कटौती शुरू हो गई। 2017-18 में बजट 604 करोड़ रुपए कर दिया गया। 2018-19 में इसमें और कटौती की गई और इस सेक्टर लिए महज 386 करोड़ रुपए सरकार ने दिये। फिर 2019-20 में बजट पिछले साल की अपेक्षा थोड़ा बढ़ाया गया और इसे 456.80 करोड़ रुपए कर दिया गया। लेकिन बजट की ये राशि तो 2014-15 से भी कम है।"


पिछले एक दशक में इस क्षेत्र की हालात और बिगड़ी है। नये रोजगार बढ़े ही नहीं हैं। 2009-10 तीसरी हथकरघा जनगणना के समय में देश में 43 लाख बुनकर थे जबकि दूसरी जनगणना के समय इस काम से 65.5 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ था। चौथे हथकरघा जनगणना की रिपोर्ट 2017 में ही आनी थी जो अभी नहीं आ सकी है।

मोहन राव आगे कहते हैं, "सरकार ने मशीनीकरण को बढ़ावा देकर भी हाथ की कारीगरी को खत्म करने का काम किया है। हमारे हाथों की कलाकारी ही हमारी पहचान थी जिस कारण लोग हमें दूसरे देशों में पूछते थे। मशीनें तो सबके पास हैं।"

मोहन राव के दावों का हकीकत आंध्र प्रदेश से करीब 2000 किलोमीटर दूर बिजनौर के मोहल्ला नोहदा (नटहौर) में एक्सपोर्टर रहे मोहम्मद शाहिद के गोदाम में दिखती है। गोदाम में 25 लाख रुपए के आसपास का माल रखा है लेकिन खरीदार नहीं मिल रहे। शाहिद के यहां बने स्कॉर्फ की यूरोपीय देशों में खासी मांग थी, लेकिन उनका काम लगभग बंद है। शाहिद बताते हैं, "ढाई साल से ये माल पड़ा है, कोई खरीदने वाला नहीं। मैंने भी क्राकरी का काम शुरू कर दिया है। पहले 50-60 लोगों का काम दिया था। गांव की बहुत सारी महिलाएं हमारे यहां काम करके अपने घर चला रही थी, बेटियों की शादियां कर रही थीं, लेकिन हमारे खुद के पास काम नहीं दूसरों को क्या देंगे।"

हैंडलूम से क्या-क्या बनता है

कपड़ों में लपेटकर रखे गए गट्ठरों की धूल झाड़ते हुए शाहिद आगे कहते हैं कि एक्सपोर्ट बंद होने पर हमने लोकल बाजार का रुख किया लेकिन वहां कीमतें बहुत कम थी, अब तो मेरे पास मुश्किल से 10 फीसदी काम बचा है। सिर्फ मेरा काम ही नहीं बंद हुआ, हैंडलूम बंद हुए तो कच्चे धागे की रंगाई करने वालों का काम कम हुआ। बिनाई और बाइंडिग करने वाले भी बेरोजगार हुए हैं।"

इस पूरे मामले पर हैंडलूम एंड टेक्सटाइल इंडस्ट्री उत्तर प्रदेश के उप आयुक्त केपी वर्मा कुछ और ही कहते हैं। उन्होंने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया, " ये बात बिल्कुल सही है कि हैंडलूम का कारोबार घट रहा है। लेकिन इसके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है। युवा पीढ़ी हाथ से काम करना ही नहीं चाहती। इसलिए पॉवरलूम का काम बढ़ा। हैंडलूम के लिए सरकार की कई सारी योजनाएं भी चल रही हैं।"

केपी वर्मा आगे बताते हैं कि इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है। लोगों के पास बाजार में विकल्प बहुत ज्यादा है। इसलिए भी हथकरघा का कारोबार बहुत तेजी से कम हो रहा है।

लेकिन बिजनौर में तो इस समय पॉवरलूम का काम भी ठप पड़ा है। इंडियान टेक्सटाइल मिनिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार देश में कपड़े का उत्पादन जितना होता है उसमें हैंडलूम क्षेत्र का 20 फीसदी, बुनाई क्षेत्र का 15 फीसदी और 60 फीसदी योगदान पॉवरलूम का है। अन्य संगठित क्षेत्रों का योगदान 5 फीसदी है।

देश में इस समय 19.42 लाख पॉवरलूम मशीनें चल रही हैं जिससे लगभग 70 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है।


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