शाहजहांपुर की गजब होली, नवाब को पिलाई जाती है शराब, फिर पड़ते हैं जूते

शाहजहांपुर की गजब होली, नवाब को पिलाई जाती है शराब, फिर पड़ते हैं जूतेशाहजहांपुर की होली।

शाहजहांपुर। आपने होली मनाने के कई अजीबों-गरीब तरीके सुने और देखे होंगे। लेकिन यूपी के शाहजहांपुर में जैसी होली मनाई जाती है वो लोगों के लिए बेहद हैरान करने वाली है।

शाहजहांपुर जिले में कई सालों से होली पर लाटसाहब यानि होली के नवाब का एक अजीबो-गरीब जुलूस निकालने की परंपरा चली आ रही है। ये होते नवाब हैं लेकिन इनका हर घर के बाहर स्वागत झाड़ू और चप्पलों से होता है। इस जुलूस में होली के दिन रंग और मस्ती के बीच जूतों की माला पहने बैलगाड़ी पर सवार एक शख्स को पूरे शहर में घुमाया जाता है।

शाहजहांपुर ज़िले में रहने वाले प्रदीप बाजपेई (66 साल) बताते हैं, "हर साल इस जुलुस को निकाला जाता है। इस जुलूस को चौक कोतवाली से निकाला जाता है और पूरे शहर में घुमाते है फिर वापस चौक आते हैं। इस जुलुस का कई लोगों ने विरोध किया लेकिन परंपरा है हमारे यहां की। इस जुलूस के खत्म होते ही यहां रंग खेलना बंद कर दिया जाता है।"

हर साल होली से एक दिन पहले स्थानीय लोग मिलकर एक 'लाट साहब' या फिर 'नवाब' चुनते हैं। एक दिन पहले से ही लाटसाहब को नशा कराया जाता है। जुलूस सबसे पहले शहर कोतवाली पहुंचता है जहां से सलामी के बाद जुलूस शहर के जेल रोड से थाना सदर बाजार और टाउन हॉल मन्दिर जाता है। इस बीच लाटसाब के सिर पर झाड़ू और चप्पलें मारी जाती हैं।

इस काम के लिए लाट साहब को अच्छे पैसे दिए जाते हैं। इस जुलूस की शुरुआत के बारे में रामलोटन शुक्ला (70 साल) बताते हैं, "ये बहुत पुरानी परंपरा है जो अंग्रेजों के समय से चलती आ रही है। जब यहां की जनता पर अंग्रेजों ने राज किया फिर जब आजाद हुए तो ख़ुशी ज़ाहिर करने के लिए लाटसाहब निकाला गया।"

शाहजहांपुर के वॉर्ड सदस्य दिलशाद खा कहते हैं, "अगला लाट साहब किसे चुना जाएगा और वो किस धर्म को मानने वाला होगा, इसे रहस्य रखा जाता है। ऐसा इसीलिए किया जाता है ताकि किसी समुदाय की भावनाएं आहत ना हों। अक्सर गरीब ही लाट साहब बनने के लिए तैयार होते हैं। वो पैसा कमाने के लिए इसे एक नौकरी के तौर पर करते हैं। हजारों लोग महिला पुरुष और बच्चे इस जश्न में शामिल होते हैं, लेकिन लेकिन अलग-अलग समुदायों के कई लोग इस परंपरा का विरोध भी करते आए हैं।

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लाटसाब का जुलूस में पुलिस और प्रशासन भी काफी सतर्क रहता है क्योंकि जुलुस में काफी भीड़ होती है। पुलिस प्रशासन को एक महीना पहले से ही जुलूस को शान्तिपूर्ण ढंग से ख़त्म करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। जुलूस के आगे पीछे बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स और पीएसी तैनात रहती है। जिसको नवाब बनाना होता है उसकी तलाश कई दिन पहले से शुरू कर दी जाती है और वो शख्स खासतौर पर मुस्लिम होता है उसे बेहद गोपनीय ढंग से छुपा कर रखा जाता है और उसकी खूब खातिरदारी की जाती है।

यहां तक की उसे शराब के नशे में धुत रखते हैं फिर रंग वाले दिन एक भैंसा गाड़ी पर एक तख्त बांध कर उसके ऊपर कुर्सी बांधते हैं उस पर नवाब को बैठाकर उसके सर पर लोहे का तवा बांधकर एक-एक आदमी उसके दाएं-बाएं जूता और झाड़ू लेकर खड़ा होता है फिर एक आदमी जूता मारता और एक झाड़ू मारता जाता है और जोर से बोलता है (बोल नवाब साहब आए) जलूस खत्म होने के बाद उस ब्यक्ति को नये कपड़े और रुपये देकर छोंड़ देते हैं। इसलिए यहां की होली हिन्दुस्तान में बिल्कुल अलग ढंग की सबसे ज्यादा संवेदनशील होली मानी जाती है। और ये सारा काम वो लोग करते हैं जिनपर नवाब निकालने की ज़िम्मेदारी होती है। (मूल रुप से प्रकाशित 2016)

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