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थोड़े से इलाज के लिए पहाड़ लांघना पड़ता है

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल, प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर न सुविधाएं, न ही डॉक्टर

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   31 Dec 2019 5:30 AM GMT

थोड़े से इलाज के लिए पहाड़ लांघना पड़ता हैप्रतीकात्मक तस्वीर

उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं लचर होने से छोटी-मोटी बीमारी पर भी लोगों को सैकड़ों किलोमीटर का चक्कर काटना पड़ता है। बागेश्वर जिले के कॉकपोट में रहने वाले विवेक पंत (40 वर्ष) का बेटा जब सीढ़ियों से गिरा तो उसे घर से करीब 175 किमी दूर इलाज मिल सका।

"मेरे बेटे का दायां हाथ टूट गया था। हम लोग उसे लेकर बागेश्वर जिला अस्पताल पहुंचे, लेकिन वहां इलाज नहीं मिला। फिर हल्द्ववानी के एक निजी अस्पताल में इलाज हो सका," विवेक ने फोन पर बताया, "जब बेटे को लेकर बागेश्वर जिला अस्पताल पहुंचे तो एक कर्मचारी ने बताया अस्पताल में न तो एक्स-रे मशीन है और न ही ऑपरेशन के लिए सामान। यहां तक कि हाथ पर प्लास्टर भी नहीं किया जा सकता।"

'स्वस्थ्य राज्य प्रगतिशील भारत' शीर्षक से जारी नीति आयोग की रिपोर्ट में राज्यों की इन्क्रीमेंटल रैंकिंग यानी पिछली बार के मुकाबले सुधार के स्तर के मामले में 21 बड़े राज्यों की सूची में उत्तराखंड का 19वीं स्थान है। सबसे नीचे 21वें नंबर पर बिहार और 20वें नंबर पर उत्तर प्रदेश है। रिपोर्ट के अनुसार 2015-16 की तुलना में 2017-18 में स्वास्थ्य क्षेत्र में उत्तराखंड के अंकों में 5.02 की गिरावट आयी है।

बागेश्वर जिले में डॉक्टरों की कमी पर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर बीएस रावत ने फोन पर कहा, "उत्तराखंड में नर्सिंग स्टाफ और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। मैदानी जनपदों का हाल तो फिर भी बेहतर है, लेकिन दुरूह पर्वतीय क्षेत्रों में स्थिति और खराब है। संविदा पर डॉक्टरों की तैनाती की जा रही है।"

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छोटी-मोटी बीमारी होने पर भी पहाड़ी लोगों को मैदानी इलाके के अस्पतालों के लगाने पड़ते हैं चक्कर।

सरकारी अस्पतालों के चक्कर काट-काट कर आजिज आ चुके देहरादून के कुलदीप व्यास (38वर्ष) बताते हैं, "सरकारी अस्पताल में डॉक्टर समय से आते नहीं, इलाज के नाम पर दो-चार गोलियां थमा दी जाती हैं। कर्मचारियों का व्यवहार भी ठीक नहीं होता, इसलिए लोग सरकारी अस्पतालों से दूरी बना रहे हैं।"

अस्पतालों में डाक्टरों की मौजूदगी पर उठने वाले सवालों पर उत्तराखंड डॉक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर डीपी जोशी ने फोन पर कहा, "डॉक्टरों की कमी से हम लोग ग्रामीणों को बेहतर इलाज नहीं कर पा रहे हैं। मैदानी क्षेत्र के डॉक्टर पहाड़ पर आना नहीं चाहते हैं। अब किसी गंभीर बीमारी पर लोग या तो देहरादून जाते हैं या बरेली।"

देश भर में डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवाओं पर नजर रखने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया में वर्ष 2017 तक कुल 10.41 लाख डॉक्टर पंजीकृत थे। इनमें से मात्र 1.2 लाख डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में तैनात हैं। वर्ष 2017 में सरकार ने संसद में जानकारी दी थी कि देश में सरकारी डॉक्टरों और मरीजों का अनुपात 1:10,189 है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के हिसाब से सरकारी डॉक्टर और मरीजों का अनुपात 1:1000 होना चाहिए।

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चमोली जिले के लंगासु गाँव की लक्ष्मी असवाल ने बताया, "सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर तो कभी रहते ही नहीं, चमोली की तो बहुत बुरी दशा है। पहाड़ों पर कोई सुविधा नहीं है। जब कोई सरकारी अस्पताल जाता है, तो उस समय कोई डॉक्टर ही नहीं मिलता, कितने लोगों की तो जान चली जाती है।"

उत्तराखंड में स्वास्थ्य से जुड़े मुददे पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था पर्वतीय जन कल्याण संस्थान के निदेश मदन जोशी ने गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया, "हमारे प्रदेश में सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की बहुत कमी है। पर्वतीय क्षेत्रों में न्यूरो सर्जन, गेस्ट्रो सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ, सांस रोग विशेषज्ञ, फिजिशियन भी देहरादून या हल्द्वानी में ही मिलते हैं। पर्वतीय जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टर तक उपलब्ध नहीं है। अगर किसी को जरूरत पड़ती है तो उसे सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर देहरादून या हल्द्वानी जाना होता है।

पौढ़ी गढ़वाल जिले के नैनीडांडा ब्लॉक की रहने वाले वाली कमला देवी बताती हैं, "नाम के लिए तो ये तीस बेड का अस्पताल है, लेकिन न यहां पर एक्स-रे मशीनें अच्छी हैं, न ही कोई और सुविधा। एक प्रसव के लिए भी हमें 100 किमी दूर तक जाना पड़ता है। लाखों की लागत से एक्स-रे मशीन तो लगा दी गई मगर टेक्नीशियन ना होने के कारण एक्स-रे मशीन धूल फांक रही हैं, बंद पड़े एक्स-रे रूम के ताले पर भी जंग लगने लगी है।" कमला देवी आगे कहती हैं, "गायनोलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) ना होने के कारण प्रसव के लिए महिलाओं को सौ-सौ किलोमीटर दूर कोटद्वार रामनगर के मैदानी क्षेत्रों की क्षेत्रों की तरफ ले जाना पड़ता है।"

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