तीन तलाक पर जारी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पर मुस्लिम महिलाएं बोलीं- जगी है न्याय की उम्मीद

Swati ShuklaSwati Shukla   11 May 2017 6:51 PM GMT

तीन तलाक पर जारी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पर मुस्लिम महिलाएं बोलीं- जगी है न्याय की उम्मीदप्रतीकात्मक तस्वीर

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की बेंच तीन तलाक और निकाह हलाला पर सुनवाई कर रही है। मुद्दे पर दाखिल की गई इस याचिका का नाम 'समानता की खोज बनाम जमात उलेमा-ए-हिंद' दिया गया है। कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए रोज सुनवाई करने का फैसला किया है। कोर्ट ने कहा है कि वह तीन तलाक और निकाह हलाला पर सुनवाई करेगा, लेकिन बहु विवाह पर नहीं। ट्रिपल तलाक के साथ-साथ छह अन्य याचिकाओं पर भी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी जिसमें शायरा बानो, आफरीन रहमान, गुलशन परवीन, इशरत जहां और आतिया सबरी मामले शामिल हैं। वर्षों से तीन तलाक की जलालत झेल रही महिलाओं को सुप्रीम कोर्ट से बहुत उम्मीदें हैं।

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इस बारे में बात करते हुए ऑल इण्डिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अम्बर कहती हैं, सुप्रीम कोर्ट सभी धर्मों को मानने वाला मज़बूत खंभा है। हमें भरोसा है कि हमें वहां से इंसाफ मिलेगा। देश का सबसे क्रान्तिकारी और इंक़लाबी कदम सुप्रीम कोर्ट के ज़रिए उठाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट और संविधान मेरे साथ है, हम महिलाओं को न्याय मिलेगा। वो आगे कहती हैं, मैंने लगातार ये मुद्दा उठाया कई जगह तो मदरसों और मस्जिदों में ऐलान होने लगा कि योगी और मोदी के साथ मिली हुई हूं और शरीयत में दखलअंदाजी कर रही हूं । सुप्रीम कोर्ट हमको न्याय देकर रहेगा।

'ट्रिपल तलाक पर सुनवाई हो रही है तो लग रहा है हमें न्याय मिल रहा है'

सिर्फ शाइस्ता अंबर ही नहीं मुस्लिम समाज की सैकड़ों महिलाएं अब खुद इस बारे में बात करती हैं। मुनीर जहां (55 वर्ष) बताती हैं, मुझे बुढ़ापे में तलाक दिया गया। अब मुझे बच्चों के सहारे अपनी जिन्दगी काटनी पड़ रही है, जो मेरे साथ हुआ वो किसी और के साथ न हो। सुप्रीम कोर्ट हमारे हित और न्याय के लिए फैसला लेगा। ऐसा लग रहा है हमें न्याय मिल रहा है।

आज का दिन मेरे जैसी तमाम महिलाओं के लिए बहुत ख़ास है

मुरादाबाद की रहने वाली शोहरा बताती हैं, दो बेटियां और एक बेटा होने के बाद रात में तलाक दे दिया। मेरे साथ तीन और जिन्दगी बरबाद हो गईं। बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जिनके साथ बहुत बुरा हुआ। अगर फैसला हमारे पक्ष में रहा तो बहुत सी जिन्दगियां बदल जाएंगी। आज का दिन बहुत खास है, क्योंकि पहली बार तलाक पर इस तरह से सुनवाई हो रही है।

काश शाहबानो केस में फैसले का मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने नहीं किया होता विरोध

पिछले कई वर्षों से महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ रही शाइस्ता अंबर आगे बताती हैं, ये मुद्दा आज का नहीं है, कई सालों से चल रहा है। 2005 में मैंने इसकी मांग की और इससे भी पहले शाह बानो ने, जो इंदौर में रहती वाली हैं जिन्होने ने अपने पति से घर चलाने के लिए पैसे की मांग की थी। भारत की सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में 62 वर्षीय शाह बानो के हक में फैसला दिया था। उस समय ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसका विरोध किया था।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस समेत पांच जजों की पीठ सुनवाई कर रही है। जिसमें चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर के साथ अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर शामिल हैं। इनमें पांच याचिकायें मुस्लिम महिलाओं ने दायर की हैं जिनमें मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन तलाक की प्रथा को चुनौती देते हुये इसे असंवैधानिक बताया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह ट्रिपल तलाक, निकाह हलाला जैसे मुद्दे पर सुनवाई करेगा, यानी कॉमन सिविल कोड का मामला सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के सामने नहीं है।

मार्च 2016 में उतराखंड की शायरा बानो नामक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी। बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी है। कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकती रहती है। वहीं पति के पास निर्विवाद रूप से अधिकार होते हैं। यह भेदभाव और असमानता एकतरफा तीन बार तलाक के तौर पर सामने आती है। जयपुर की आफरीन रहमान ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। मैरिज पोर्टल से शादी करने वाली रहमान को उसके पति ने स्पीड पोस्ट से तलाक का पत्र भेजा था। उन्होंने भी 'तीन तलाक' को खत्म करने की मांग की है।

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