ग्राउंड रिपोर्ट: बढ़ते तापमान से साल 2030 तक 3.4 करोड़ लोगों को गंवाना पड़ सकता है अपना रोज़गार; ग्रामीण भारत होगा सबसे अधिक प्रभावित

देश में इस साल की शुरुआत में ही बढ़ी गर्मी ने न केवल दिहाड़ी मजदूरों और खेतिहर मजदूरों की सेहत पर असर डाला है, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित किया है। और इसका असर देश की जीडीपी पर पड़ता है क्योंकि बढ़ते तापमान से काम के घंटे तो कम हुए ही हैं, और उत्पादकता पर भी असर पड़ रहा है।

Shivani GuptaShivani Gupta   22 Jun 2022 8:00 AM GMT

बाराबंकी/लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। जून की तपती दोपहर में अपने खेत में निराई कर रही राजरानी बीमार महसूस करने लगीं, उन्हें नहीं पता था कि तापमान 43 डिग्री के आसपास आ गया है, वो लगातार काम करती रहीं, लेकिन जैसे ही खड़ी हुईं, उन्हें चक्कर आया और बेहोश हो गईं। 35 साल की रातरानी वहीं पड़ी रहीं जब तक कि उनके पति वहां नहीं पहुंच गए और उन्हें अस्पताल ले गए।

"मुझे हर समय चक्कर आ रहा है। गर्मी में काम करना मुश्किल है, लेकि अगर हम नहीं करेंगे तो घर कैसे चलेगा, "उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के हेमी गाँव की रहने वाली राजरानी ने गांव कनेक्शन को बताया।

राजरानी के गाँव से करीब तीन किलोमीटर दूर दरियापुर गाँव की 50 वर्षीय रामकली भी गर्मी से जूझ रही थी। एक दिहाड़ी मजदूर, राजरानी को सुबह आठ बजे से दोपहर के बीच गाँव में बन रहे तालाब की खुदाई करनी पड़ती है।

रामकली ने गाँव कनेक्शन को बताया कि जहां काम करती हैं वहां कोई छाया भी नहीं है। "मुझे बुखार, चक्कर आता है और गर्मी में मेरी आँखों में दर्द होता है, लेकिन मेरे जैसे मजदूर उसके कारण काम नहीं रोक सकते। अगर हम काम नहीं करेंगे, तो हमारी मजदूरी रुक जाएगी, "रामकली ने कहा कि अगर वह काम करती हैं तो 213 रुपये हर दिन मजदूरी मिलती है।

बढ़ती गर्मी और लंबे समय तक गर्म हवाएं ग्रामीण भारतीयों के काम पर असर डाल रहीं हैं। इस साल, हीट वेव मार्च की शुरुआत में आईं और सामान्य से अधिक गर्म दिनों की संख्या में भी वृद्धि हुई है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने बढ़ती गर्मी के असर को लेकर आगाह किया है। ILO की 2019 की रिपोर्ट जिसका शीर्षक वर्किंग ऑन ए वार्मर प्लैनेट - द इम्पैक्ट ऑफ हीट स्ट्रेस ऑन लेबर प्रोडक्टिविटी एंड डिसेंट वर्क है, ने चेतावनी दी है कि भारत में गर्मी के तनाव के कारण 2030 में काम के घंटे 5.8 प्रतिशत खोने की उम्मीद है।


"भारत केवल हीट वेव के कारण 2030 तक 3.4 करोड़ नौकरियों को खोने जा रहा है। कृषि उत्पादकता भी घटेगी। खाद्य सुरक्षा, आपूर्ति कोल्ड चेन और आर्थिक क्षेत्र पर इसका कुछ असर होगा, "नई दिल्ली स्थित रिसर्च थिंक-टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के साथ प्रोग्राम लीड अविनाश मोहंती ने गाँव कनेक्शन से कहा।

उन्होंने कहा, "गर्मी की वजह से आजीविका खत्म होने जा रही है और जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होने वाली है।"

मोहंती ने बताया कि शहरी क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बेहतर अनुकूलन क्षमता है: "गाँवों के लोगों के पास एयर कंडीशनर, वाटर कूलर या पंखे तक पहुंच नहीं है, " उन्होंने कहा। उन्होंने चेतावनी दी कि यह न केवल एक आर्थिक प्रभाव है जिसका लोगों को सामना करना पड़ेगा, बल्कि रोजगार, विकास और स्थिरता के मुद्दों के अलावा स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ेगा।

गाँवों में बढ़ती गर्मी और बिजली कटौती

गाँवों में लोगों का काम गर्मी की वजह से प्रभावित हो रहा है। गर्मी के कारण बीमार पड़ने के कारण राजरानी के पति पूरे एक हफ्ते तक काम पर नहीं जा सके और इसका मतलब था कि गरीब परिवार को लगभग 2,000 रुपये का नुकसान हुआ।

रात में बढ़ी गर्मी के कारण गाँवों में लोग अच्छे से सो नहीं पाते हैं, साथ ही लंबे समय तक होने वाली बिजली कटौती से और परेशानी बढ़ जाती है।

हेमी गाँव में अपने घर के बाहर चारपाई पर बैठी 50 वर्षीय जंगरानी बेना (हाथ का पंखा) से हवा कर रहीं थीं। "हम पूरी रात ऐसे ही बिताते हैं। हमें ठीक से नींद नहीं आ रही है, "जगरानी ने कहा। जबकि सुबह के समय जब मौसम ठंडा रहता है तो लोगों को काम के सिलसिले में बाहर जल्दी निकलना पड़ता है।

रात में बढ़ी गर्मी के कारण गाँवों में लोग अच्छे से सो नहीं पाते हैं, साथ ही लंबे समय तक होने वाली बिजली कटौती से और परेशानी बढ़ जाती है। फोटो: शिवानी गुप्ता

वन अर्थ द्वारा 2022 में 68 देशों में किए गए अध्ययन जिसका शीर्षक Rising temperatures erode human sleep है, के अनुसार विश्व स्तर पर लोगों की नींद प्रभावित हुई, जिससे पता चला है कि गर्म तापमान की वजह से लोग कम नींद ले पाते हैं। बुजुर्ग, महिलाएं और कम आय वाले देशों के लोग इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। 2099 तक, बढ़ता तापमान एक साल में प्रति व्यक्ति की 50-58 घंटे की नींद कम कर सकता है।

"मैं धीरे-धीरे काम करती हूं और बीच-बीच में आराम करता रहती हूं। मैं बेदम महसूस करती हूं और अक्सर चक्कर आ जाता है, "जंगरानी ने गाँव कनेक्शन को बताया।

जगरानी के घर में बिजली बिजली का कनेक्शन तक नहीं है। छोटी महिला किसान होने के नाते, वह हर तीसरे दिन केवल 200-300 रुपये कमा पाती हैं, जब वह अपनी एक बीघा (0.619 एकड़, या 0.25 हेक्टेयर) जमीन पर सब्जियों की खेती करती हैं, जिन्हें वो बाजार में बेचती हैं। विधवा ने कहा कि बढ़ती गर्मी से उनके काम पर असर पड़ा है, जिससे कमाई भी कम हुई है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन 15 घंटे बिजली देने का आश्वासन दिया था। जब गाँव कनेक्शन ने लखनऊ और बाराबंकी जिलों के कई गाँवों का दौरा किया, तो ग्रामीणों ने शिकायत की कि दिन के 24 घंटे में मुश्किल से सात घंटे बिजली मिलती है।

परेशान माँएं अपने बच्चों को गर्मी से बचाने और शरीर को ठंडा रखने के लिए उनके शरीर पर गीली मिट्टी का लेप लगाती हैं। "हम भी क्या करें? बाराबंकी जिले के दीनपनाह गाँव की रहने वाली 30 वर्षीय हिना ने कहा कि हमारे बच्चों की शरीर पर गर्मी से घमौरियां हो गईं हैं और बीमार हो गए हैं।


"रात दो बजे बिजली कट गई और अब तक (शाम 4 बजे) नहीं आई है। हमारे यहां शाम को मुश्किल से दो घंटे के लिए बिजली आती है। फिर आधी रात से सुबह पांच बजे तक बिजली रहती है, जिसके बाद एक बार फिर बिजली कट जाती है, "दीनपनाह की 60 वर्षीय गिमला देवी ने गाँव कनेक्शन को बताया।

प्रारंभिक और लंबे समय तक हीट वेव

भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, 1981 और 1990 के बीच की अवधि में भारत में हीटवेव दिनों की संख्या 413 से बढ़कर 2011 से 2020 तक 600 हो गई है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के कारण हीटवेव दिनों की संख्या में वृद्धि हुई है। .

इस साल लू के जल्दी आने से गेहूं, आम, लीची, टमाटर जैसी कई फसलों को भी काफी नुकसान हुआ है। "इस साल हमारे गेहूं के उत्पादन में कमी आई है। एक बीघा जमीन में, जिससे हमें नौ कट्टा गेहूं मिलता है, लेकिन इस साल हमें केवल चार कट्टा ही मिल पाया है, "राजरानी ने कहा। [1 कट्टा = 50 किलो]


नई दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था सीड्स इंडिया में संसाधन और जुटाव विंग के निदेशक पराग पराग तलनकर बताते हैं, "यह सिर्फ सेहत के मुद्दे नहीं हैं, बल्कि हीटवेव मजदूर, रिक्शा चालक, सब्जी विक्रेता और दिहाड़ी मजूदरों के काम पर असर डाला है। उन्हें अक्सर काम छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है और दवाओं पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है।

जीडीपी पर प्रभाव

ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (ODI) के थिंक टैंक द्वारा प्रकाशित 'The costs of climate change in India' शीर्षक से 2021 की एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि यदि औसत वैश्विक तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो कृषि उत्पादकता में गिरावट, समुद्र के स्तर में वृद्धि, और नकारात्मक स्वास्थ्य परिणामों से भारत को उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग तीन प्रतिशत खर्च करने का अनुमान है। इसने यह भी नोट किया कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद वर्तमान में लगभग 25 प्रतिशत अधिक होगा यदि यह ग्लोबल वार्मिंग की वर्तमान लागतों के लिए नहीं है।

दिन में काम के घंटों में औसत नुकसान 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 प्रतिशत से 4.5 प्रतिशत सालाना जोखिम में डाल सकता है। यह लगभग 150-250 अरब डॉलर के बराबर होगा। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर स्थिति बिगड़ती रही तो भारत में जीडीपी का प्रतिदिन 52,420 मिलियन रुपये का नुकसान होगा, जबकि 2030 तक प्रति घंटा नुकसान 2.2 मिलियन रुपये होगा।

2017 तक, गर्मी से सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 50 प्रतिशत उत्पादन करता है, सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि का लगभग 30 प्रतिशत चलाता है और लगभग 75 प्रतिशत श्रम शक्ति को रोजगार देता है, जोकि भारत में लगभग 380 मिलियन लोग हैं, 2020 मैकिन्से रिपोर्ट में जिक्र किया गया है।


2019 की ILO रिपोर्ट के अनुसार, 2030 में गर्मी के तनाव के कारण, क्रमशः कृषि और निर्माण क्षेत्रों में 9.04 प्रतिशत काम के घंटे बर्बाद होने की आशंका है।

ग्रामीण भारत में बढ़ती गर्मी से संबंधित बीमारियां

बीस वर्षीय अंजली सात महीने की गर्भवती हैं। उन्हें तीन दिनों से दस्त थे, और उनकी स्थिति में सुधार लाने के लिए उन्हें ड्रिप लगानी पड़ी।

बाराबंकी के गंगेपुर गाँव की निवासी ने गाँव कनेक्शन को बताया कि वह अपने दिन का एक बड़ा हिस्सा रसोई में बिताती हैं, जहां वो लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती हैं। "यह मुश्किल होता है, और गर्मी बर्दाश्त नहीं होती है, "अंजली ने कहा।

सात महीने की गर्भवती अंजली को गर्मी की वजह से दस्त आ रहे हैं। कमजोरी से बचाने के लिए उन्हें ड्रिप चढ़ाया जा रहा है। फोटो: मोहम्मद सलमान

बाराबंकी के घुंघटर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत फार्मासिस्ट आशीष कुमार सिंह ने गाँव कनेक्शन को बताया कि गर्मी में डिहाइड्रेशन के कई मामले सामने आते हैं। "कमजोरी, नींद की कमी, उच्च पल्स रेट और मांसपेशियों में दर्द आम हैं, "उन्होंने कहा।

घुघटर के एक अन्य चिकित्सा अधिकारी प्रवीण के अनुसार, अप्रैल के मध्य से जुलाई तक डिहाईड्रेशन के मामले बढ़ जाते हैं। "हमें हर दिन गर्मी से संबंधित बीमारी के कम से कम दो से तीन मामले मिलते हैं। गर्मियों में डर्मेटाइटिस, फंगल इंफेक्शन, चेचक, खसरा और वायरल इंफेक्शन के मामले भी बढ़ जाते हैं।

यूपी में हीटस्ट्रोक से सबसे ज्यादा मौतें

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 1967 के बाद से पिछले 50 वर्षों में हीट वेव की वजह से 39,815 लोगों की जान गई है। भू-जलवायु और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 6,745 लोग मारे गए हैं।


एनसीआरबी के नवीनतम आंकड़ों में 2020 में देश भर में प्रकृति की ताकतों के कारण 7,405 आकस्मिक मौतें दर्ज की गईं। इसमें से 7.2 प्रतिशत मौतें हीटस्ट्रोक (530 मौतें) के कारण हुईं।


"हमारी सरकार रोकथाम पर ध्यान केंद्रित कर रही है। आशा और एएनएम द्वारा प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से हम ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ा रहे हैं। हम पर्यावरण से संबंधित बीमारियों की जांच के लिए जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय कार्यक्रम भी चला रहे हैं, "अशोक कुमार पांडे, अतिरिक्त सचिव, स्वास्थ्य विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार, ने गाँव कनेक्शन को बताया।

भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, 2019 में गर्मी से संबंधित बीमारी के कारण 254 मामले और दो मौतें दर्ज की गईं। सबसे अधिक मामले - 89 - गौतम बुद्ध नगर जिले में दर्ज किए गए। इसके बाद चंदौली (55), महोबा (26), औरैया (20), मथुरा (13) का स्थान रहा।

महामारी के बाद के दो वर्षों में, 2020 में तीन मामले दर्ज किए गए और 2021 में गर्मी से संबंधित बीमारी का कोई भी मामला दर्ज नहीं किया गया, यह गाँव कनेक्शन द्वारा एक्सेस किए गए राज्य-स्तरीय आंकड़ों को दर्शाता है।

उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के राज्य सलाहकार सतीश त्रिपाठी ने गाँव कनेक्शन को बताया कि 2022 में हीट स्ट्रोक के मामलों की रिपोर्ट इस साल अगस्त में ही आएगी। त्रिपाठी ने कहा, "ये मामले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों द्वारा दर्ज किए गए हैं।"


अधिकारी ने बताया कि हीटवेव से संबंधित बीमारी से निपटने और मौतों को रोकने के लिए रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या के आधार पर एक कार्य योजना तैयार की जाती है। डेटा राज्य और जिला प्रशासन को क्षेत्रीय स्तर पर एक हीटवेव एक्शन प्लान तैयार करने में मदद करता है ताकि तैयारी की जा सके, इससे शुरूआती बुनियादी ढाँचा विकसित किया जा सके और जन जागरूकता पैदा की जा सके।

सीड्स इंडिया के पराग तलनकर ने कहा कि हीटवेव न केवल साइलेंट किलर हैं बल्कि पूर्ण आपदा भी है।

"पहले हीट वेव को आपदा नहीं माना जाता था। लेकिन अब राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के अनुसार, हीटवेव भी एक आपदा है और जब से 2016 में हीटवेव को आपदा के रूप में वर्गीकृत किया गया है, तब से अब तक 22,000 मौतों को आधिकारिक तौर पर एनडीएमए के साथ हीटवेव के कारण पंजीकृत किया गया है, "पराग तलनकर ने कहा।

"हमें यह समझने की जरूरत है कि गर्मी का तनाव लंबे समय में स्वास्थ्य प्रणाली को कैसे प्रभावित करता है। ऐसे मामले ग्रामीण घरों में स्वास्थ्य बजट को बढ़ाने वाले हैं। हीट स्ट्रेस एक बड़ी और धीमी समस्या है जिसे संबोधित करने की आवश्यकता है। लेकिन, फिलहाल हम इसे मैप करने या इसे किसी भी महत्वपूर्ण तरीके से मापने में असमर्थ हैं, "सीईईडब्ल्यू के मोहंती ने कहा।

क्या किया जा सकता है?

यूपी स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अशोक कुमार पांडेय ने गर्मी से संबंधित बीमारी से बचाव के उपाय सुझाए। उन्होंने कहा, "हम स्वास्थ्य जोखिम से बचाव करके बीमारियों को रोक सकते हैं, धूप में जाने से बच सकते हैं, अगर जाना जरूरी तो पूरी बाह के कपड़े पहनें और अपने शरीर को हाइड्रेट रखें।"

"पानी के साथ, शरीर के अंदर इलेक्ट्रोलाइट्स को बनाए रखने के लिए अन्य तरल आहारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लोगों को बार-बार भोजन करने की सलाह दी जाती है, लंबे समय तक जोर लगाने से सख्ती से बचना चाहिए, "उन्होंने कहा।

पानी को गर्म होने से बचाने के लिए गाँवों में लोग बोतल को जूट के बोरों में लपेटकर रखते हैं। फोटो: मोहम्मद सलमान

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, यदि पर्याप्त आपातकालीन रोकथाम, तैयारी, प्रतिक्रिया और उपायों को स्थायी और समय पर लागू किया जाता है, तो हीटवेव से लोगों को बचाया जा सकता है।

"हीटवेव एक्शन प्लान हैं। लेकिन अधिक प्रयासों की जरूरत है। हीटवेव एक प्राकृतिक आपदा है और सरकार को इस पर ध्यान देने की जरूर है। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि कैसे देश में लू बढ़ने वाली है। लू का असर सिर्फ दिन के समय ही नहीं रात के समय पर भी पड़ रहा है। इन दिनों रातें भी बहुत गर्म होती हैं, "गैर-लाभकारी सीड्स इंडिया के पराग ने कहा।

लंबे समय के समाधान सुझाते हुए उन्होंने कहा: "सरकार को चर्चाओं को कार्यों में बदलने में अधिक सक्रिय होना चाहिए। जिंदा रहने और वाटर हार्वेस्टिंग के लिए तालाबों और झीलों जैसे प्राकृतिक जल संसाधनों को पुनर्जीवित करना, जल संचयन को बढ़ावा देना, पेड़ लगाना और स्कूली पाठ्यक्रम में पर्यावरण जागरूकता को शामिल करना।

अंग्रेजी में पढ़ें

Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.