एक कवि जिसे हिंदी साहित्य का ‘विलियम वर्ड्सवर्थ’ कहा जाता था

एक कवि जिसे हिंदी साहित्य का ‘विलियम वर्ड्सवर्थ’ कहा जाता थासुमित्रानंदन पंत

हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत को ‘विलियम वड्रर्सवर्थ’ कहा जाता था। सुमित्रानंदन पंत ऐसे साहित्यकारों में गिने जाते हैं, जिनका प्रकृति चित्रण समकालीन कवियों में सबसे बेहतरीन था। सुमित्रानंदन पंत के बारे में साहित्यकार राजेन्द्र यादव कहते हैं कि 'पंत अंग्रेज़ी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहकर प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे।'

पंत का जन्म 20 मई सन 1900 को उत्तराखंड के कौसानी में हुआ था। जन्म के महज छह घंटे के भीतर उन्होंने अपनी माँ को खो दिया। पंत लोगों से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते थे। पंत ने महात्मा गाँधी और कार्ल मार्क्‍स से प्रभावित होकर उन पर रचनाएं लिख डालीं।

ये भी पढ़ें - मोहम्मद रफ़ी का एक पुराना इंटरव्यू

सुमित्रानंदन पंत कविता पढ़ते हुए

सुमित्रानंदन पंत के बचपन का नाम 'गुसाईं दत्त' था। क्योंकि जन्म के छ: घण्टे बाद ही इनकी माँ का निधन हो गया था, इसीलिए प्रकृति की यही रमणीयता इनकी माँ बन गयी। प्रकृति के इसी ममतामयी छांव में बालक गुसाईं दत्त धीरे- धीरे यहां के सौन्दर्य को शब्दों के माध्यम से काग़ज़ में उकेरने लगा। पिता 'गंगादत्त' उस समय कौसानी चाय बग़ीचे के मैनेजर थे। सुमित्रानंदन पंत के भाई संस्कृत व अंग्रेज़ी के अच्छे जानकार थे, जो हिन्दी व कुमाँऊनी में कविताएं भी लिखा करते थे। कभी-कभी जब उनके भाई अपनी पत्नी को कविताएं सुनाया करते तो बालक गुसाईं दत्त किवाड़ की ओट में चुपचाप सुनता रहता और उसी तरह के शब्दों की तुकबन्दी कर कविता लिखने का प्रयास करता।

ये भी पढ़ें - जब कोर्ट में दिलीप कुमार ने कहा था - इस औरत से मुझे इश्क़ है और मरते दम तक रहेगा...

ग्यारह साल की उम्र में पंत पढा़ई के लिये अल्मोडा़ के 'गवर्नमेंट हाईस्कूल' में भेज दिया गया। अल्मोडा़ की ख़ास संस्कृति व वहां के समाज ने गुसाईं दत्त को अन्दर तक प्रभावित कर दिया। पंत को अपना नाम पसंद नहीं था जिस वजह से उन्होंने लक्ष्मण के चरित्र को आदर्श मानकर अपना नाम गुसाईं दत्त से बदल कर 'सुमित्रानंदन' कर लिया। कुछ समय बाद नेपोलियन के युवावस्था के चित्र से प्रभावित होकर उन्होंने लम्बे व घुंघराले बाल रख लिये।

ये भी पढ़ें - फौज़िया की कहानी : “एक औरत के लिए रूढ़ियों को तोड़ना मुश्किल भरा कदम था”

हरिवंशराय बच्चन, सुमित्रानंदन पंत और रामधारी सिंह ‘दिनकर’।

अल्मोड़ा में तब कई साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियां होती रहती थीं जिसमें पंत अक्सर भाग लेते रहते थे। स्वामी सत्यदेव जी के प्रयासों से नगर में ‘शुद्ध साहित्य समिति‘ नाम से एक पुस्तकालय चलता था। इस पुस्तकालय से पंत जी को उच्च कोटि के विद्वानों का साहित्य पढ़ने को मिलता था। कौसानी में साहित्य के प्रति पंत जी में जो अनुराग पैदा हुआ वह यहां के साहित्यिक वातावरण में अब अंकुरित होने लगा। कविता का प्रयोग वे सगे सम्बन्धियों को पत्र लिखने में करने लगे। शुरुआती दौर में उन्होंने 'बागेश्वर के मेले', 'वकीलों के धनलोलुप स्वभाव' व 'तम्बाकू का धुंआ' जैसी कुछ छुटपुट कविताएं लिखी। अल्मोड़ा से तब हस्तलिखित पत्रिका ‘सुधाकर‘ व ‘अल्मोड़ा अखबार‘ नामक पत्र निकलता था जिसमें वे कविताएं लिखते रहते थे।

ये भी पढ़ें - गोविंद नामदेव : 250 रुपए की स्कॉलरशिप के सहारे दिग्गज अभिनेता बनने की कहानी

कवि पंत का किशोर कवि जीवन कौसानी व अल्मोड़ा में ही बीता था। इन दोनों जगहों का वर्णन भी उनकी कविताओं में मिलता है। सुमित्रानंदन पंत आधुनिक हिन्दी साहित्य के एक युग प्रवर्तक कवि हैं। उन्होंने भाषा को निखार और संस्कार देने, उसकी सामर्थ्य को बढ़ाने के अतिरिक्त नवीन विचार व भावों की समृद्धि दी। पंत सदा ही अत्यंत सशक्त और ऊर्जावान कवि रहे हैं। सुमित्रानंदन पंत को मुख्यत: प्रकृति का कवि माना जाने लगा। लेकिन पंत वास्तव में मानव-सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना के भी कुशल कवि थे। 28 दिसम्बर, 1977 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में महाकवि सुमित्रानंदन पंत की मृत्यु हो गई।

ये भी पढ़ें - मिर्ज़ा ग़ालिब के दस सबसे बेहतरीन शेर

Share it
Share it
Share it
Top