प्रधानमंत्री जी कोर्ट में नहीं होते इतने केस पेंडिंग, अगर काम कर रही होती न्याय प‍ंचायत

प्रधानमंत्री जी कोर्ट में नहीं होते इतने केस पेंडिंग, अगर काम कर रही होती न्याय प‍ंचायतबिहार की धर्मपुर ग्राम पंचायत की ‘ग्राम कचहरी’ में बैठी पंचायत में सुनवाई करते हुए ग्रामीण।

अगर उत्तर प्रदेश सरकार 'न्याय पंचायत' के गठन पर ध्यान दे, तो यह पंचायत के विकास के लिए एक नया अध्याय शुरू होगा। 'न्याय पंचायत' के गठन से ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को थाने, कोर्ट, कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

बिहार में ग्रामीणों को सुलभ और सस्ता न्याय प्रदान करने के लिए पंचायत स्तर पर आजादी के समय से 'ग्राम कचहरी' सुचारू रूप से चल रही है। जबकि उत्तर प्रदेश में 1972 में अंतिम बार न्याय पंचायत का गठन हुआ था, इसके बाद यह प्रक्रिया रुक गई। बिहार में ग्राम कचहरी अभी भी सक्रिय रूप से चलने की वजह से यहाँ के लोग आपसी मामले थाने लेकर नहीं जाते हैं।

इस ग्राम कचहरी का मुख्य उद्देश्य है कि ग्रामीण बिना किसी उलझन और परेशानी के, बिना किसी अनावश्यक खर्च के आपसी विवाद पंचायत स्तर पर खुद सुलझा सकें। अगर यूपी की सरकार भी इस ग्राम कचहरी को शुरू करा पाए तो यहां भी ग्रामीणों को थाने और कोर्ट कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट ने पिछले वर्ष 150 वें स्थापना दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री सहित, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, सीएम योगी आदित्यनाथ सभी मौजूद थे। इस मौके पर न्याय व्यवस्था पर पीड़ा व्यक्त करते हुए चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा था कि जजों की कमी के चलते भारत की न्याय व्यवस्था विकलांग हो गई है। चीफ जस्टिस की यह पीड़ा थोड़ी कम होती यदि देश के हर राज्य में ग्राम कचहरी की शुरुआत की गई होती।

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इस समय देश में तीन करोड़ से अधिक मुकदमे कोर्ट में लम्बित हैं जिसमे 66 प्रतिशत मुकदमे जमीन व सम्पत्ति से सम्बन्धित हैं। वहीं 10 प्रतिशत मसले पारिवारिक विवाद से जुड़े हुए हैं, इन 76 प्रतिशत विवादों का एक बड़ा हिस्सा गाँव से जुड़ा है। यानी कोर्ट भी यह मानती है कि ज्यादातर लंबित मामले जमीन-जायदाद से जुड़े होते हैं। इस लिहाज से ग्राम कचहरियां न्याय व्यवस्था में कुछ हद तक सुधार कर सकती हैं।

बिहार राज्य के समस्तीपुर जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में मनिका गाँव हैं, जो धर्मपुर ग्राम पंचायत में आता है। मनिका गाँव में तीसरी बार लगातार बने सरपंच मनीष कुमार झा (30 वर्ष) ग्राम कचहरी का अनुभव साझा करते हुए गाँव कनेक्शन सम्वाददाता को फ़ोन पर बताते हैं, "गाँव में छोटा-बड़ा कोई भी झगड़ा हो सब ग्राम कचहरी में ही लेकर आते हैं, सात हजार आबादी वाली धर्मपुर पंचायत में पिछले 10 वर्षों से कोई भी मामला थाने तक नहीं गया है, सभी झगड़े इस ग्राम कचहरी में ही निपटाए गए हैं।"

वो आगे बताते हैं, "ज्यादातर मामलों में दोनों पक्षों में समझौता करा दिया जाता है, ये कचहरी सप्ताह में दो दिन सोमवार और शनिवार को सुबह 10 से चार बजे तक लगती है, जहां सरपंच न्याय देते हैं। ग्राम कचहरियों में 40 तरह की धाराओं के मुकदमे सुलझा दिए जाते हैं।"

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बिहार राज्य में जब ग्राम कचहरी का गठन हुआ था उस समय पूरे राज्य में 8442 ग्राम कचहरी बनाई गयी थी जिसमें 8392 ग्राम कचहरी सक्रिय रूप से काम कर रही हैं ।

इस समय देश में तीन करोड़ से अधिक मुकदमे कोर्ट में लम्बित हैं जिसमे 66 प्रतिशत मुकदमे जमीन व सम्पत्ति से सम्बन्धित हैं। वहीं 10 प्रतिशत मसले पारिवारिक विवाद से जुड़े हुए हैं, इन 76 प्रतिशत विवादों का एक बड़ा हिस्सा गाँव से जुड़ा है। यानी कोर्ट भी यह मानती है कि ज्यादातर लंबित मामले जमीन-जायदाद से जुड़े होते हैं। इस लिहाज से ग्राम कचहरियां न्याय व्यवस्था में कुछ हद तक सुधार कर सकती।

इनमें 90 प्रतिशत विवाद ऐसे लोगों के हैं जिनकी वार्षिक आय तीन लाख से कम है । ये लोग ज्यादातर दलित और पिछड़ी जाति के लोग हैं । वर्तमान न्याय व्यवस्था बहुत ही खर्चीली हो गई है और न्याय भी काफी देर से मिलता है। अगर कोई केस 10 साल तक चलता है तो उसमें तीन लाख रुपए खर्च हो जाते हैं । ग्रामीणों की पहुंच थाने और कोर्ट कचहरी में बहुत कम होने की वजह से उन्हें असुविधा का सामना करना पड़ता है, अगर न्याय पंचायत की शुरुआत उत्तर प्रदेश में हो जाएगी तो ग्रामीणों को असुविधाओं का सामना नहीं करना पड़ेगा।

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बिहार के मणिका गांव में ग्राम कचहरी में लगी पंचायत में फरियादी।

ग्राम पंचायतों के अधिकारों के लिए देश भर में तीसरी सरकार अभियान चला रहे डॉ. चंद्रशेखर प्राण बिहार की ग्राम कचहरी का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, "दो साल पहले जब हम बिहार दौरे पर गए थे, वहां एक ग्राम कचहरी को संचालित होते हुए देखा था, इसी सन्दर्भ में मैंने पूर्व मुख्यमंत्री जी को एक पत्र लिखा था और ये मांग की थी कि उत्तर प्रदेश में भी इस तरह की ग्राम कचहरी का गठन किया जाए, इस कचहरी के गठन से गाँव के झगड़े थाने तक नहीं पहुंचेंगे।"

वो आगे बताते हैं, 'अगर योगी सरकार उत्तर प्रदेश में न्याय पंचायत के गठन पर ध्यान देती है तो गाँव के विकास के लिए एक नया अध्याय शुरू होगा, लोगों को थाने कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, पंचायत स्तर पर ही मामले निपटा लिए जाएंगे।" इस ग्राम कचहरी का उद्देश्य ये भी है कि समाज के अंतिम पायदान पर बैठे लोगों को ये एहसास दिलाना कि सरकार में उनकी भागीदारी की अहम भूमिका है।

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दो साल पहले जब हम बिहार दौरे पर गए थे, एक ग्राम कचहरी को संचालित होते हुए देखा था, इसी सन्दर्भ में मैंने पूर्व मुख्यमंत्री जी को पत्र लिखा था और ये मांग की थी कि उत्तर प्रदेश में भी इस तरह की न्याय पंचायत का गठन किया जाए, इस पंचायत के गठन से गाँव के झगड़े थाने तक नहीं पहुंचेंगे।
डॉ. चंद्रशेखर प्राण, संचालक, तीसरी सरकार अभियान

यूपी में अंतिम बार 1972 में हुआ था न्याय पंचायत का गठन

आजादी से पहले उत्तर प्रदेश और बिहार एक ही राज्य थे तब इसे संयुक्त प्रान्त कहा जाता था। वर्ष 1920 में बने सयुंक्त प्रान्त पंचायती राज अधिनियम में अदालत पंचायत के नाम से स्थानीय स्तर पर न्याय की व्यवस्था का प्रावधान किया गया ।

आजादी के बाद जब दोनों प्रदेश अलग हुए तो उत्तर प्रदेश में इसे "न्याय पंचायत" और बिहार में इसे "ग्राम कचहरी" के नाम से संचालित किया जाता रहा है। उत्तर प्रदेश में 1972 में अंतिम बार न्याय पंचायत का गठन हुआ था, इसके बाद यह प्रक्रिया रुक गई लेकिन बिहार में ग्राम कचहरी अभी भी सक्रिय रूप से कार्यरत है।

नब्बे प्रतिशत मसलों का समझौतों से हुआ समाधान

इस कचहरी में सरपंच, उपसरपंच, सात और पंच होते हैं । सरपंच के सहयोग के लिए एक विधी स्नातक को न्याय मित्र ‍व एक हाईस्कूल तक शिक्षित व्यकित को सचिव के रूप में राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है । बिहार में बनी ग्राम कचहरियों में अब तक जितने भी विवाद दाखिल हुए हैं और जिन पर भी कार्रवाई की गई है, उनके सम्बन्ध में अब तक हुए अध्ययन से कुछ तथ्य सामने आए हैं ।

इसमें जमीन सम्बन्धी विवाद 58 प्रतिशत, घरेलू विवाद 20 प्रतिशत है। इसमें से 85 प्रतिशत विवाद दलित एवं पिछड़े वर्ग से जुड़े हुए हैं । इन कचहरियों में आए हुए विवादों में 90 प्रतिशत मसले समझौते के द्वारा हल हुए हैं। 10 प्रतिशत में 100 से एक हजार तक का जुर्माना लगाया गया। ज्यादातर मामलों में दोषियों ने जुर्माना आसानी से भर दिया लगभग तीन प्रतिशत मामले ही ऊपर की अदालतों में पहुंचे ।

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