कमाई का जरिया और पूजनीय गाय सिरदर्द कैसे बन गई ?

'किसानों के साथ रात' सीरीज की ये दूसरी कड़ी है। जिसमें ये समझने की कोशिश की है आखिर गाय समस्या कैसे बन गई?

अरविंद शुक्ला/ दिति बाजपेई

लखनऊ/पंजाब। पिछले कुछ वर्षों से गाय राष्ट्रीय मुद्दा है। गाय अख़बारों की हेडलाइन बनी हैं, तो टीवी चैनलों पर घंटों की बहस हुई है। सोशल मीडिया में कई दिनों तक हैशटैग ट्रेंड किए हैं।

लेकिन जिस मुद्दे पर गाय को लेकर चर्चा होनी चाहिए थी वो नहीं हुआ, नतीजा ये हुआ कि जो किसान गाय को पूजता था, जिससे उसकी रोजी-रोटी चलती थी वो उसी के पीछे लाठी लेकर दौड़ने लगा। किसानों की माने तो गोवंश उनका सबसे बड़ा सिरदर्द है। उत्तर प्रदेश के लाखों किसान छुट्टा जानवरों से अपनी फसलें बचाने के लिए रातों को पहरेदारी कर रहे हैं। इन पशुओं में सबसे ज्यादा संख्या सांड और बछड़ों की है।

उत्तर प्रदेश में पहले आवारा पशुओं (अन्ना जानवर) की समस्या सिर्फ बुंदेलखंड में थी। लेकिन पिछले 3-4 वर्षों में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध और गोरक्षकों के हमलों की ख़बरें एक के बाद एक सुर्खियां बनने के बाद छुट्टा जानवरों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हो गई है। ये पशु सड़कों पर हादसों की वजह बन रहे हैं तो ग्रामीण इलाकों में किसानों को सोने नहीं दे रहे।



उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 80 किलोमीटर दूर सीतापुर जिले में रामपुर मथुरा ब्लॉक के बहादुरगंज बाजार के दो नुक्कड़ों पर सैकड़ों गोवंश (गाय, बछड़े और सांड़) डेरा जमाए मिल जाएंगे। इनसे बचने के लिए इलाके के किसानों तमाम किसानों ने खेतों में तार लगवाएं हैं। कुछ ने खेतों में मचान बनाए हैं, बावजूद इसके तमाम किसान दिनरात फसलों की रखवाली करते हैं।

बहादुरगंज के पड़ोस में दुर्जनपुर के रहने वाले रामतीरथ पुत्र संतू के पिछले दिनों सांड 5 बीघा गेहूं चर गए। रामतीरथ बताते हैं, रोज जाते थे लेकिन एक दिन खेत नहीं जा पाए और फसल चौपट हो गई।' रामतीरथ के मुताबिक इनमें से कुछ गाय आसपास के गांव वालों की है तो कुछ दूसरे गावों के लोग ट्रैक्टर –ट्राली में भरकर रात में यहां छोड़ जाते हैं।"

गोवंश की बढ़ती समस्या और किसानों के दर्द को समझने के लिए गांव कनेक्शन की टीम ने एक जनवरी की पूरी रात किसानों के साथ बिताई। जिसमें एक तरफ सर्दी में ठिठुरते किसान खेतों में रखवाली करते मिले, दूसरी तरफ भूख से ब्याकुल पशु चारे के लिए कंटीले तारों को तोड़ती दौड़ती भागती नजर आईं। खुद कई किसानों ने माना कि वो गाय बहुत बड़ी समस्या हैं लेकिन वो नहीं चाहते ये ऐसे घायल हों।

सीतापुर में गोड़ादेवरिया गांव के शिक्षक रामबहादुर सिंह कहते हैं, गाय के प्रति अब लोगों में वैसी आस्था नहीं रही क्योंकि वो उनकी आजीविका के लिए खतरा बन गई है। गाय और गोवंश (बछड़े-सांड) समस्या इसलिए बन गए हैं क्योंकि वो किसानों के लिए उपयोगी नहीं रहे।'

उत्तर प्रदेश की देसी नस्ल की गाय उत्पादन के मामले में काफी फिसड्डी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ये गाय औसतन 2.6 लीटर दूध देती हैं। ऐसे में किसानों ने इनसे मुंह मोड़ लिया है।

छुट्टा गोवंश यानि वो पशु जिनके मालिक दूध निकालने के बाद चरने के लिए खुला छोड़ देते हैं, लेकिन बाहर चारे का इंतजाम न होने पर वो किसानों के खेतों में उत्पात मचाते हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या गायों की है, उसके बाद सांड और बछड़े हैं। 12वीं पशुगणना के मुताबिक में उत्तर प्रदेश में ही छुट्टा गोवंश की संख्या 11 लाख से भी ज्यादा है।

सीरीज की पहली ख़बर-छुट्टा गोवंशों से संकट में खेती, अब यह किसानों की सबसे बड़ी समस्या

''सड़कों और किसानों के लिए मुसीबत बन चुका छुट्टा गोवंश का जिम्मेदार समाज और सरकार दोनों ही है अगर सरकारें विदेशी गायों की जगह देसी गायों के नस्ल सुधार पर ध्यान देती तो आज यह समस्या नहीं बनती है। जो विदेशी गाय आई भारत में वो रह नहीं पाई क्योंकि वह गाय भारत की जलवायु के अनुकूल नहीं थी। देसी गाय जो आधा-एक लीटर दूध देती है अगर सरकार उनकी उत्पादकता बढ़ाने पर काम करती तो यह समस्या पैदा नहीं होती। '' गोवंश विकास एवं अनुसंधान केन्द्र के संचालक डॉ राम प्रकाश शर्मा ने बताया।

जहां छुट्टा जानवर किसानों के लिए समस्या बनी हुई है वहीं मध्य प्रदेश के सतना जिले से 87 किमी. दक्षिण दिशा में गोवंश विकास एवं अनुसंधान केन्द्र चित्रकूट में देश की विलुप्त हो रहीं देसी गाय की नस्लों के संरक्षण और नस्ल सुधार का काम किया जा रहा है। इस केंद्र में 14 नस्लों के संरक्षण के साथ इनके गोबर और गोमूत्र से 13 तरीके के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।

छुट्टा गोवंशों की वजह से कई जगह तो किसानों ने खेती करना ही बंद कर दिया है

डॉ शर्मा ने फोन पर बताया, ''अपने ही देश की देसी नस्ल की गाय गिर ब्राजील जैसे देश में एक दिन में 136 लीटर दूध दे रही है अपने यहां 36 लीटर का आधा भी नहीं दे रही है। अब सरकार इनके नस्ल सुधार और उत्पादकता पर काम कर रही है।

''बैल बहुत बड़ी समस्या हैं क्योंकि उनका उपयोग नहीं बचा है पहले बैलों से जुताई होती थी लोग खरीदते थे बचते थे अब पांच मिनट में ट्रैक्टरों से जुताई हो जाती है। वहीं गाय एक-दो लीटर दूध देती है जब तक दूध देती है तब तक किसान रखता है उसके दूर गाँव में छोड़ आता है। दूसरी समस्या जो चारागाह थे वो भी खत्म हो गए।'' सीतापुर जिले के गोंडा देवरिया गाँव में रहने वाले सुरेंद्र बहादुर सिंह ने गाँव कनेक्शन को बताया।

राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013-2014 में उत्तर प्रदेश में चारागाह की कुल जमीन 65 हजार 389 थी जो वर्ष 2014-2015 में घटकर 65 हजार 198 हेक्टेयर हो गई। यह संख्या लगातार घट ही रही है। विभाग के अनुसार 70-80 फीसद चारागाहों पर अवैध कब्जे हैं। इन कब्ज़ों को हटाने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने एंटी भूमाफिया अभियान शुरू किया था।

सुरेंद्र पिछले कई वर्षों से श्री राधा गौशाला चला रहे हैं। इस समस्या का सुझाव देते हुए सुरेंद्र बताते हैं, ''सरकार को चाहिए कि वो नस्ल सुधार पर काम करें ताकि उसकी उत्पादन क्षमता बढ़े और गाय ज्यादा दूध दे। इसके साथ ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को गोमूत्र और गोबर से बनने वाले उत्पादों के बारे में जागरूक करें।''

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देश की गायों की नस्ल सुधार करने की बात पिछले कई दशकों से चल रही है। केंद्र में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज के तहत नस्ल सुधार पर बड़े-बड़े दावे किए थे, कृतिम गर्भाधान केंद्रों का निर्माण होना था, लेकिन वो योजनाएं जमीन पर साकार नहीं हो पाईं। गांव कनेक्शन ने वर्ष 2016 में बुंदेलखंड पर विशेष सीरीज बुंदेलखंड में एक हजार घंटे के दौरान इन गायों पर कई रिपोर्ट की थीं। जिसका सार था कि बुंदेलखंड की त्रासदी की बड़ी वजह ये गोवंश भी हैं क्योंकि पानी इंतजाम हो जाने के बावजूद कई किसानों ने अन्ना पशुओं के डर से फसलें नहीं लगाई थीं। पिछले कई दशकों में देसी नस्ल की गायों के प्रति सरकारों के उदासीन रवैये ने किसानों के लिए एक बड़ी समस्या को जन्म दिया।

उत्तर प्रदेश में प्रति गाय दुग्ध उत्पादन ढाई लीटर और प्रति भैंस दुग्ध उत्पादन साढ़े चार लीटर है। पशुओं को भरपूर चारा न मिलना भी उत्पादकता न बढ़ने की एक बड़ी समस्या बनी।


बरेली स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के न्यूट्रीशियन विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ पुतान सिंह प्रति गाय-भैंस की दूध उत्पादकता में कमी होने का कारण संतुलित आहार मानते हैं। डॉ पुतान ने बताया, ''प्रति गाय-भैंस की दूध उत्पादकता में कमी का सबसे बड़ा कारण है पशुओं का संतुलित आहार।

जो छोटे किसान हैं उनके पास जो भी उपलब्ध होता है खिला देते है जो किसान व्यावसयिक रूप से गाय-भैंसों को पाल रहे हैं, कुछ हद तक वह पशुओं को संतुलित आहार देते हैं। एक वयस्क पशु के रोज 50 प्रतिशत हरा चारा और 50 प्रतिशत सूखा चारा तो देना ही चाहिए।''

चारागाह की समस्या बताते हुए पुतान कहते हैं, ''पशु जब चरते थे तो उनकी दूध उत्पादकता भी ठीक रहती थी पर अब चारागाह न होने पर भी दूध उत्पादकता पर असर पड़ा है। चारागाह तो विकसित नहीं हो सकते। अगर किसान 10 बीघा खेत में अपनी फसल को लगाता है उसमें अगर तीन-चारा लाइनों में पशुओं के लिए हरा चारा बो दे तो उसके लिए काफी असर पडेगा।

हालांकि कुछ किसान ऐसा करते हैं। चारा उत्पादन करने के लिए अगर पशुपालक (सहजन, पखर, शीशम) आदि के पौधे लगा ले तो उन्हें अपने पशुओं के लिए आसानी से हरा चारा उपलब्ध हो जिसका अभाव है इससे पशुओं की दूध उत्पादकता भी बढ़ेगी। खेतों के खर पतवार को भी हरे चारे के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।''

उत्तर प्रदेश ही नहीं देश के कई राज्यों में आवारा और जंगली जानवरों किसानों की फसल बर्बाद कर देते हैं। पंजाब राज्य के मोगा जिले में रहने वाले बलवंदिर सिंह आवारा जानवरों की समस्या के बारे में बताते हैं, ''हमारे में तो सैकड़ों गायों का झुंड एक साथ आता है न जाने कितने हज़ार एकड़ फसल बर्बाद कर चुके हैं। प्रशासन को भी पत्र दिए लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती है। दिन हो या रात खेतों पर ही बिताना होता है।''

हाल ही में आवारा जानवरों से परेशान किसानों ने मथुरा, अलीगढ़ और आगरा में पशुओं को स्कूलों में बंद भी कर दिया था साथ गोशाला बनवाने की मांग को लेकर पांच हजार किसानों ने आगरा के कलेक्ट्रेट में धरना प्रदर्शन भी किया।

लखनऊ से करीब 70 किलोमीटर दूर बेलहरा-छेदामार्ग पर गंधीपुर गाँव के मनीष कुमार अपनी फसल को बचाने के लिए रात भर अपनी फसल की सुरक्षा करते हैं।

इस समस्या का जिम्मेदार कौन हैं? इस पर मनीष कहते हैं, ''जिम्मेदार वहीं है जिसकी गाय-बछड़ा है उनके अपने जानवर की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। सालों जिस गाय का दूध पीते हैं उसका तो कर्ज निभाए। लेकिन अब समस्या विकराल हो गई है। सरकार को भी साथ देकर इसका इंतजाम कराना चाहिए।"


सरकारों का दावा है अवारा पशुओं पर रोक लगाने के लिए नस्ल सुधार पर भी काम किया जा रहा है। हाल ही में यूपी सरकार ने अमेरिका की एक कंपनी से ऐसा सीमन आयात करने जा रही है जिससे सिर्फ बछिया ही पैदा होंगी। शुरू में इस कंपनी से सीमन मंगवाकर उत्तर प्रदेश के तीन जिलों (इटावा, लखीमपुरखीरी, बाराबंकी) में पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में गायों में इस सीमन का प्रयोग किया गया है।

इस सीमन अब तक 714 संतित जन्म ले चुकी है, जिसमें से 648 मादा और बाकी नर ने जन्म लिया। यह सीमन जल्द से जल्द किसानों तक पहुंच सके इसके लिए सरकार ने करोड़ों का बजट भी पास कर दिया है।

समस्या कैसे विकराल बनी और इसका निदान क्या है। इस सवाल के जवाब में सीतापुर जिले में गढ़चपा ग्राम पंचायत के प्रधान मुकुंद तिवारी कहते हैं, "देखिए यह गाय-बैल न मोदी के है और न ही योगी के और न ही किसी राजनेता के। यह छुट्टा पशु गाँव के ही है पहले जो लोग पालते थे अब छुट्टा छोड़ दिए हैं। सरकार को कुछ ऐसा इंतजाम करना चाहिए कि ऐसे लोगों पर रोक लगे।"

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वो कहते हैं, "सरकार गांवों में ग्राम पंचायत की जमीन, तालाब की जमीन की गौशाला बनवाएं, मनरेगा मजूदरों से इसकी देखभाल कराए। इसके संचालन में गांवों के लोगों की अधिकारियों के दिशानिर्देश में समिति बनाए। किसानों की फसलें बचेंगी तो लोग गोशाला में दान देंगे। मैं खुद अपने गांव में ऐसी किसी गोशाला के लिए साल में 20-25 हजार रुपए सरकार को देने को तैयार हूं।"

समस्या के समाधान के दीर्घकालिक हल पर राम बहादुर सिंह कहते हैं, सरकार यूरिया पर कितने रुपए की सब्सिडी देती है, ये सब्सिडी केचुआ खाद पर दें। गोबर और गोमूत्र के प्रोडक्ट के निर्माण और इस्तेमाल के लिए किसान और दूसरे लोगों को प्रेरित करे, वर्ना ये गाय की समस्या का हल नहीं होने वाला।"

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