कितनी असरदार होगी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना : ग्राउंड रिपोर्ट

इस योजना के तहत 10 करोड़ परिवारों (कुल करीब 50 करोड़ लाभार्थियों) के लिये बीमा दिया जाना है। इन परिवारों को सालाना 5 लाख तक का हेल्थ कवरेज़ देने की बात है। लेकिन योजना को पूरे देश में लागू करना इतना आसान नहीं है

कितनी असरदार होगी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना : ग्राउंड रिपोर्ट

हृदयेश जोशी, वरिष्ठ सलाहकार संपादक

रांची। रांची के राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान में हमारी मुलाकात जतरू मांझी से हुई। वह दुर्घटना में घायल अपने भाई गोपाल को 50 किलोमीटर दूर अपने गांव से यहां इलाज के लिये लाये हैं। जतरू और गोपाल दोनों मज़दूरी करते हैं और उनका कहना है कि इलाज में अब तक खर्च हुये 6000 रुपये भी उन पर भारी पड़े हैं। इसके लिये उन्होंने कर्ज़ लिया है। अगर हफ्ते भर अस्पताल में और रहे तो ज़िंदगी साल भर पीछे खिसक जायेगी क्योंकि कमाई बन्द है और कर्ज़ चढ़ता रहेगा।

गोपाल की टांग एक दुर्घटना में टूट गई और उन्हें इलाज के लिये रांची आना पड़ा

सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में मरीज़ों की कोई कमी नहीं है

मांझी के बगल वाले बिस्तर पर 18 साल का अब्दुल दिल की बीमारी से लड़ रहा है। अब्दुल को उसके पिता मुस्लिम अंसारी पलामू से यहां लाये हैं। अंसारी कहते हैं कि बेटी की शादी की वजह से उन पर 30 हज़ार का कर्ज़ है। अस्पताल में उनका अब तक 300 रूपया ही खर्च हुआ है लेकिन जेब अब खाली है।

लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन आरोग्य अभियान के ऐलान के कुछ देर बाद ही गांव कनेक्शन की टीम ने मांझी और अंसारी परिवारों के अलावा कई मरीज़ों से बात की जिनकी माली हालत खस्ता है। प्रधानमंत्री ने लालकिले की प्राचीर से कहा, "25 सितंबर से पूरे देश में ये प्रधानमंत्री जन आरोग्य अभियान लॉन्च कर दिया जायेगा। इसका परिणाम ये होने वाला है कि देश के गरीब व्यक्ति को अब बीमारी के संकट से जूझना नहीं पड़ेगा। उसको साहूकार से पैसा ब्याज़ पर नहीं लेना पड़ेगा। उसका परिवार तबाह नहीं होगा।"

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सरकार इस योजना के तहत 10 करोड़ परिवारों (कुल करीब 50 करोड़ लाभार्थियों) के लिये बीमा दिया जाना है। इन परिवारों को सालाना 5 लाख तक का हेल्थ कवरेज़ देने की बात है। लेकिन सरकार जिस योजना को पूरे देश में लागू करने की बात कर रही है वह इतना आसान नहीं है।

पहली वजह इस योजना के लिये केंद्र सरकार, राज्यों के साथ खर्च का बंटवारा चाहती है। लेकिन अब तक सब राज्यों के साथ यह करार नहीं हो पाया है। अलग अलग राज्यों के पास अपनी बीमा योजनायें हैं और बंगाल जैसे राज्य (राजनीतिक वजहों से भी) इसमें कतई केंद्र के साथ नहीं आना चाहते।

दूसरी बड़ी वजह जो पहली वजह से जुड़ी है वह है बीमे का प्रीमियम। सरकार ने जब 2008 में राष्ट्रीय स्वास्थ बीमा योजना शुरू की तो 30 हज़ार रुपये की कवरेज के लिये 700 रुपये प्रीमियम था। इस बीमा योजना में भी सभी गरीबों को अब तक लाभ नहीं मिल पाया है। 2016 में मोदी सरकार ने 1 लाख रुपये के कवरेज की बात की जो कभी लागू नहीं की गई और अब सरकार 5 लाख रुपये के बीमे की बात कर रही है।

सवाल ये है कि अगर सरकार 30 हज़ार कवरेज की योजना सभी गरीबों तक नहीं पहुंचा पाई और 1 लाख रुपये कवरेज की योजना कभी शुरू ही नहीं हुई तो 5 लाख का बीमा कैसे गरीबों को मिलेगा। इस योजना में हर परिवार को स्वास्थ्य बीमे का प्रीमियम व्यवहारिक रूप से कितना होगा इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

अच्छे सरकारी अस्पताल गरीबों के लिये बड़ी राहत हो सकते हैं लेकिन वह दूरदराज़ के इलाकों में खस्ताहाल हैं और शहरी इलाकों में इन पर भारी दबाव है

इस साल बजट में जब वित्तमंत्री अरुण जेटली ने आयुष्मान भारत नाम से इस बीमा आधारित योजना (जिस मीडिया में मोदी केयर के नाम से प्रचारित किया गया) का ऐलान किया तो स्वास्थ्य के जानकारों का कहना था कि इसका प्रीमियम ही भारत के पूरे हेल्थ बजट से अधिक होगा।

अब कहा जा रहा है कि इसका प्रीमियम पूरी तरह से सरकार चुकायेगी लेकिन क्या यह व्यवहारिक होगा। असल में जिस बीमा योजना को पूरे देश में लागू करने की बात की जा रही है उसे तमाम दिक्कतों की वजह से अभी देश के सिर्फ कुछ ज़िलों में ही लॉन्च किया जायेगा और यह विशुद्ध रूप से एक पायलट प्रोजेक्ट है।

इस स्कीम के सीईओ इंदु भूषण कह चुके हैं, "पहले चरण में अधिकतम 100 ज़िलों को ही कवर किया जा रहा है और योजना सरकारी अस्पतालों से शुरू होगी।"

लेकिन थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क की मालनी आइसोला कहती हैं, "हम शुरू से कहते रहे हैं कि बेहतर स्वास्थ सेवा के लिये सरकारी अस्पतालों और सरकारी ढांचे को मज़बूत करने की ज़रूरत है लेकिन जब सरकार बीमा आधारित योजना को सरकारी अस्पतालों से शुरु करने की बात कहती है तो ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी अस्पतालों में बीमे की कितनी और क्यों ज़रूरत है क्योंकि वह तो मुफ्त इलाज मुहैया कराते हैं। क्या ऐसा तो नहीं कि सरकार प्राइवेट अस्पतालों और बीमा कंपनियों को साथ लेने में नाकाम रही?"

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सवाल इससे कहीं आगे जाता है। क्या बेहद विपन्नता में जी रही भारत की आबादी के लिये बीमा आधारित हेल्थ कवरेज उपयोगी होगी। इसके लिये हमने गोपाल मांझी और अब्दुल दोनों के परिवारों से बात की। मांझी परिवार में गोपाल और जतरू दोनों मिलकर 400 रुपया रोज़ कमाते हैं लेकिन महीने में 10 से 12 दिन ही काम मिल पाता है। यानी अधिकतम कमाई 4800 रुपये। दोनों भाइयों की पत्नियां कुल 1200 रुपये तक कमा पाती हैं। यानी जिस महीने किस्मत अच्छी है ये परिवार कुछ 6000 कमाता है। इस रकम पर कुल 10 लोग निर्भर हैं।

जतरू और गोपाल ने गांव कनेक्शन को बताया कि उनके गांव में स्वास्थ्य सुविधायें शून्य हैं लिहाजा उन्हें यहां आना पड़ा लेकिन यहां रहने और आने जाने का खर्च ही उनके लिये पहाड़ जैसा है।

अब्दुल को दिल की बीमारी है और उसका परिवार उसे इलाज के लिये पलामू से रांची लाया। पिता पर पहले से 30 हज़ार का कर्ज़ है

उधर पलामू से आये अंसारी परिवार का भी यही हाल है। उनकी बातों से भी साफ है कि जब तक अच्छे अस्पताल, डॉक्टर, नर्स और दवाइयां देश के दूरदराज के इलाकों तक नहीं पहुंचेंगी तो बीमा कामयाब नहीं होने वाला।

"हमारे लिये 500 रुपये भी बड़ी रकम है। मेरी कमाई अनियमित है और हफ्ते में 1000 से 1200 रुपये बड़ी मुश्किल से जुटा पाता हूं। पूरी ज़िंदगी उधार पर टिकी है। पलामू में स्वास्थ्य सुविधायें चौपट हैं। हमें यहां तक आने के लिये भी कर्ज़ लेना पड़ा। अगर बीमा करा भी लें तो रांची, पटना या दिल्ली आने जाने और रहने का खर्च कौन देगा।" मुस्लिम अंसारी ने हमें बताया।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे अर्थशास्त्री इंद्रनील मुख्रर्जी कहते हैं, "देश में 50 प्रतिशत अच्छे बड़े सरकारी और प्राइवेट अस्पताल कुछ मेट्रो शहरों में ही हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों को बेहतर किये बिना सिर्फ बीमा योजना के आधार पर हालात नहीं सुधारे जा सकते। देश की करीब 75 प्रतिशत बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें कुछ शहरों तक सीमित हैं जहां देश की 40 प्रतिशत से भी कम आबादी है। यानी जहां अपेक्षाकृत गरीब या बहुत गरीब हैं उनके लिये अच्छे अस्पताल और डॉक्टर मयस्सर नहीं है। इलाज में 70 प्रतिशत से अधिक खर्च आम आदमी की जेब से हो रहा है। ये हालात सरकारी अस्पतालों की बेहतरी की मांग करते हैं।"


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