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मेंस्ट्रुअल कप को बनाया जाए आम चर्चा का विषय, पर्यावरण के लिए यह होगा अहम कदम

एक मेंस्ट्रुअल कप का इस्तेमाल 10 साल तक किया जा सकता है। जब यह डिस्पोज (नष्ट, निस्तारण) किया जाएगा तब भी पर्यावरण के लिए नुकसानदायक नहीं है जबकि एक सेनेटरी पैड में 90 फीसदी से ज्यादा प्लास्टिक होता है जिसे नष्ट होने में 500 से 800 साल तक लग जाते हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   5 Jun 2020 12:45 PM GMT

मेंस्ट्रुअल कप को बनाया जाए आम चर्चा का विषय, पर्यावरण के लिए यह होगा अहम कदम

एक सेनेटरी पैड में 90 फीसदी से ज्यादा प्लास्टिक उपयोग होती है जो चार प्लास्टिक बैग के बराबर है। जिसे डिस्पोज होने में 500-800 साल लगते हैं।

भारत सरकार ने बीते कुछ वर्षों में यह प्रयास जरुर किया है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियों और महिलाओं तक सेनेटरी पैड पहुंच सके लेकिन इसके निस्तारण का कोई सुरक्षित इंतजाम नहीं किया गया। सेनेटरी पैड का उपयोग करने के बाद इसका सुरक्षित निस्तारण कहां किया जाए? इसकी जानकारी ज्यादातर महिलाओं और किशोरियों में है ही नहीं।

झारखंड के रांची जिले के सिल्ली प्रखंड की रहने वाली लक्ष्मी देवी (24 वर्ष) बताती हैं, "पहले मैं कागज में या प्लास्टिक में लपेटकर सेनेटरी पैड जंगल में जाकर फेक देती थी कई बार कुत्ते उसे टांगकर गाँव के अन्दर आ जाते थे अच्छा नहीं लगता था। अब फेकते नहीं हैं गड्ढे में खोदकर ऊपर से मिट्टी डाल देते हैं।"

लक्ष्मी का पैड निस्तारण का यह तरीका पर्यावरण के लिए हानिकारक है लेकिन इसमें लक्ष्मी की कोई गलती भी नहीं है। क्योंकि बीते कुछ सालों से सेनेटरी पैड के उपयोग को लेकर टीबी पर खूब विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं लेकिन इसके निस्तारण का कोई भी तरीका नहीं बताया गया। जिसकी वजह से लक्ष्मी की तरह लाखों महिलाएं पैड निस्तारण का यही तरीका अपना रही हैं जो कि एक गम्भीर चिंता का विषय बना हुआ है।

लक्ष्मी की तरह देश में 57 फीसदी महिलाएं और किशोरियां सेनेटरी पैड का उपयोग तो कर रही हैं पर इनके पास इसके निस्तारण का कोई सुरक्षित इंतजाम नहीं है। जिसका नतीजा यह है कि आपको राह चलते कूड़े के ढेर में, तालाबों में, खेतों में, स्कूल के पीछे, सड़कों पर उपयोग किये हुए सेनेटरी पैड दिख जाएंगे जो पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए नुकसानदायक हैं।

माहवारी के समय महिलाएं और किशोरियां अगर मेंस्ट्रुअल कप का इस्तेमाल करती हैं तो यह पर्यावरण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा, क्योंकि इसका उपयोग दस साल तक के लिए किया जा सकता है। जब यह डिस्पोज (नष्ट, निस्तारण) किया जाएगा तब भी पर्यावरण के लिए नुकसानदायक नहीं है।

इको फेम्मे (EcoFemme: unlearning menstruation: sanitary waste in india) के अनुसार एक सेनेटरी पैड में 90 फीसदी से ज्यादा प्लास्टिक उपयोग होती है जो चार प्लास्टिक बैग के बराबर होती है। इसके सूक्ष्म कण बनने में 500-800 साल लगते हैं। यही प्लास्टिक के सूक्ष्म कण भोजन और पानी के माध्यम से हमारे अन्दर जाते हैं। यूके ने अभी हाल ही में एक शोध किया है जिसके अनुसार हमारे एक बार के भोजन में 1,000 प्लास्टिक के सूक्ष्म कण हमारे अन्दर जाते हैं। पांच महाद्वीप में एकत्र किये गये नमूनों में 80 फीसदी से अधिक प्लास्टिक फाइबर के कण मिले हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (2015-16) की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाक़ों में 48.5 प्रतिशत महिलाएं सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं जबकि शहरों में 77.5 प्रतिशत महिलाएं उपयोग करती हैं। अभी 57.6 प्रतिशत महिलाएं सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं। इन आंकड़ों के हिसाब से उपयोग किये हुए सेनेटरी पैड के ढेर का अंदाजा लगाया जा सकता है।


एक खबर के अनुसार हर साल देश में करीब 12 अरब सेनेटरी पैड कचरे के रूप में जमीन के अन्दर जा रहा है। एक महिला द्वारा पूरे माहवारी चक्र के दौरान इस्तेमाल किए गए सेनेटरी पैड से करीब 125 किलो कचरा बनता है। जो हर महीने जमीनों के अंदर जा रहा है जिससे पर्यावरण को बहुत ज़्यादा नुकसान पहुंच रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में सेनेटरी पैड का जिस तरह से अभी निस्तारण किया जा रहा है वह पर्यावरण के लिए गम्भीर खतरा बना हुआ है। ऐसे में अगर मेंस्ट्रुअल कप को आम चर्चा का विषय बनाया जाए तो यह पर्यावरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

फिरोजाबाद जिले के वीरपुरा गाँव की एएनएम प्रीती सिंह जनवरी महीने से मेंस्ट्रुअल कप का उपयोग कर रही है वो अपना अनुभव बताती हैं, "जब पैड यूज करते थे तो दिनभर बदलने की झंझट रहती थी। कई बार पीरियड के समय काम पर नहीं जा पाते थे, दिन में पैड बार-बार कहाँ बदलेंगे और कहाँ फेकेंगे? इस बात की हमेशा चिंता रहती थी। मेंस्ट्रुअल कप में ये सब झंझट नहीं हैं, सुबह लगा लेते हैं दिनभर बदलना नहीं पड़ता। इसे बार-बार फेकने के लिए जगह नहीं खोजना। चार-पांच महीने से लगा रहे हैं कोई दिक्कत नहीं हो रही है।"

फिरोजाबाद की मुख्य विकास अधिकारी नेहा जैन द्वारा शुरू मेंस्ट्रुअल कप उपयोग करने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया.


प्रीती मेंस्ट्रुअल कप का उपयोग करने वाली फिरोजाबाद की पहली महिला नहीं हैं बल्कि इनकी तरह इसे 50 महिलाएं उपयोग कर रही हैं जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं। फिरोजाबाद की मुख्य विकास अधिकारी नेहा जैन द्वारा इसे जिले में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर जनवरी में 50 महिलाओं के साथ शुरू किया गया है जिसमें आशा, आशा संगनी, एएनएम शामिल हैं। नेहा जैन ने मेंस्ट्रुअल कप को गिफ्ट देने की भी एक पहल शुरू की है।

"चुनाव के समय जब मेरी ड्यूटी लगी तो दिन में कई बार पैड बदलने के मानसिक तनाव से परेशान थी पहली बार जब हमने मेंस्ट्रुअल कप का उपयोग किया तो काफी आरामदायक रहा। वहीं से यह आईडिया आया क्यों न इसे बढ़ावा दिया जाये। वात्सल्य संस्था की मदद से हमने 50 आशा, एएनएम के साथ एक मीटिंग की और सभी को एक मेंस्ट्रुअल कप दिया। ये लोग पहले इसका उपयोग कर लें जब ये संतुष्ट हो जाएंगी तब यही लोग इसका ग्रामीण स्तर पर प्रचार-प्रसार करेंगी, " नेहा जैन ने बताया।

नेहा जैन इसके फायदे गिनाती हैं, "मेंस्ट्रुअल कप में सिलिकॉन यूज होता है जो बॉडी के लिए सेफ है। इसे 12 घंटे तक उपयोग कर सकते हैं। एक बार इसे खरीद लीजिये 10 साल तक की छुट्टी। इसकी कीमत 500-700 रूपये है जो सिर्फ एक बार लगती है। दस साल बाद जब आप इसे डिस्पोज करेंगी तो सिलिकॉन किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाएगा।"

"हम किसी को भी 400-500 रूपये का गिफ्ट देते ही हैं तो क्यों न मेंस्ट्रुअल कप दें जो हर लड़की और महिला के लिए जरूरी है, हमने अपने घर में काम करने वाली मैड को मेंस्ट्रुअल कप गिफ्ट किया। वो इसका उपयोग कर रही हैं और काफी खुश भी हैं, लॉकडाउन की वजह से यह कम थोड़ा रुक गया है, " मुख्य विकास अधिकारी नेहा जैन ने अपना अनुभव साझा किया कि कैसे मेंस्ट्रुअल कप के उपयोग को बढ़ा सकते हैं।

मेंस्ट्रुअल कप का उपयोग करने वालों की संख्या अभी गिनी चुनी है। इसके उपयोग को लेकर कई तरह गलत धारणाएं भी बनी हुई हैं। एक मेंस्ट्रुअल कप 400-700 रूपये तक मिलता है जो 10 साल तक चलेगा। इस हिसाब से यह सेनेटरी पैड से ज्यादा सस्ता है। इसे पहली बार उपयोग करने के लिए ट्रेनिंग जरूरी है बाद में इसका उपयोग सेनेटरी पैड की तरह आसान लगने लगेगा।

स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ नीलम सिंह बताती हैं, "सेनेटरी पैड का उपयोग पर्यावरण के अलावा महिलाओं के लिए भी हानिकारक है। सेनेटरी पैड में डायोक्सिन और फ्यूरान नाम के जो तत्व शामिल हैं वो कैंसर जैसी बीमारी को बढ़ावा दे सकते हैं। इसका डिस्पोजल हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। अब कोशिश यह की जाए कि मेंस्ट्रुअल कप को आम चर्चा का विषय बनाया जाए, इसे पुब्लिक डोमेन में शामिल किया जाए जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इसका उपयोग कर सकते हैं।

डॉ नीलम सिंह के अनुसार 28 फीसदी लोग सेनेटरी नैपकीन को उपयोग करके तालाबों में फेक देते हैं। सेनेटरी पैड का टनों मलबा इकट्ठा हो जाता है। शहरों में तो उपयोग करके लोग कूड़ेदान में डाल देते हैं। कूड़े में ले जाने वाले सफाईकर्मियों के स्वास्थ्य के लिए यह हानिकारक है। गाँव में कूड़ेदान रखना लोगों की आदत में नहीं है जिसे जहाँ मन आता है लोग आड़ की जगह में फेक देते हैं जो हर तरीके से घातक है।

"मेंस्ट्रुअल कप के उपयोग से टनों मलबा (कूड़ा) इकट्ठा नहीं होगा। रेसेज नहीं आएंगे। सस्ता और लम्बे समय तक चलने वाला यह प्रोडक्ट है। अभी जो लोग भी इसका उपयोग कर रहे हैं वो लोग इसके तमाम फायदे बताते हैं। इसके उपयोग को लेकर समाज में एक भ्रांति भी है कि इसे योनि में डालकर उपयोग किया जाता है जिससे बच्चेदानी को नुकसान हो सकता, यह एक गलत धारणा हैं," डॉ नीलम ने बताया, "बड़े पैमाने पर इसके प्रचार-प्रसार की जरूरत है। सरकार इसपर एक शोध करे और ऐसे साक्ष्य जुटाए जिससे लोगों में यह भरोसा हो सके कि इसका उपयोग किसी भी तरह से नुकसानदायक नहीं है।"


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