क्या पूरा होगा किसानों की आमदनी दोगुनी करने का सपना ?

Ramandeep Singh MannRamandeep Singh Mann   7 Dec 2017 3:28 PM GMT

क्या पूरा होगा किसानों की आमदनी दोगुनी करने का सपना ?े दोगुनी होगी किसानों की

कोई भी किसान 28 फरवरी 2016 का दिन नहीं भूल सकता। इस दिन बरेली में आयोजित एक किसान रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था। चूंकि प्रधानमंत्री पहले ही स्वामिनाथन रिपोर्ट को लागू करने के अपने चुनावी वादे से पीछे हट चुके हैं, ऐसे में किसानों के लिए उनका यह ऐलान काफी मायने रखता है। सरकार ने अशोक दलवई की अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन किया है जिसका स्पष्ट लक्ष्य है ग्रामीण परिवारों की 96,703रुपये (2015-16 में) की सालाना आय को 2022-23 तक 193,406 करना (2015-16 की कीमतों के आधार पर)।

इस ज्वलंत मुद्दे को समझने के लिए हमें अतीत में जाना होगा। नीति आयोग के मुताबिक, 1980 के दशक के शुरू में, एक किसान की आय गैरकृषि कामगर की आय का महज 34 फीसदी थी। 1993-94 में किसान की आय में और कमी आई और यह गैरकृषि कामगर की आय का 25 पर्सेंट ही रह गई। 2004-05 से 2011-12 के बीच इसमें मामूली बढ़ोतरी देखी गई लेकिन यह 80 के दशक के शुरूआती बरसों के स्तर से ऊपर नहीं निकल पाई।

फिलहाल, पिछले चार बरसों (2012-13 से 2015-2016) में किसानों की तुलनात्मक आय में और गिरावट देखी गई है। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक, 20% ग्रामीण परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे थे जिनका प्रमुख व्यवसाय खेती है। कुछ राज्यों जैसे, झारखंड में 45.3 पर्सेंट कृषक परिवार गरीबी रेखा के नीचे थे। इनकी संख्या ओडिशा में 32.1 पर्सेंट और बिहार में 28.4 पर्सेंट थी। सर्वे के मुताबिक, 2012-13 में कृषक परिवार की कृषि और गैर कृषि स्रोतों से आय 6426रुपये प्रतिमाह थी। साथ ही, 17 राज्यों में किसान की शुद्ध उत्पादन लागत पर होने वाली औसत सालाना आय 1667 रुपये प्रति माह से भी कम थी।

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इसलिए जब समूचे कृषि क्षेत्र में निराशा का माहौल हो, किसानों की आय दोगुनी करने का वादा निश्चय ही स्वागतयोग्य पहल है। लेकिन असली पेंच तब आता है जब हम इसकी बारीकियों में जाते हैं। शुरू में यह साफ नहीं किया गया था कि यह बढ़ोतरी किसान की वास्तविक आय में होगी या नाममात्र की आय में।

वास्तविक आय वह आय होती है जिसे क्रय शक्ति पर महंगाई के असर को ध्यान में रखते हुए तय किया जाता है, वहीं नाममात्र की आय में इसे समायोजित नहीं किया जाता।हालांकि अशोक दलवई की कमिटी ने इस भ्रम को दूर किया और बताया कि सरकार का लक्ष्य किसानों की वास्तविक आय को दोगुना करने का है। नीति आयोग ने किसान की आय में बढ़ोतरी के स्रोतों की भी पहचान की है। इनमें शामिल हैं: फसलों की पैदावार को बढ़ाना, फसलों की सघनता में वृद्धि करना, उत्पादन की लागत में कमी करना, अच्छी कीमत देने वाली फसलों, जैसे फलों, सब्जियों, मसालों की खेती करना, व्यापार के नियमों में सुधार और किसानों को बेहतर कीमतें दिलाना।

नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद के ताजा अनुमानों के मुताबिक, किसानों की कुल कृषि आय 1,77,954 करोड़ रुपये (1993-94) से बढ़कर 2015-16 में 163,4625 करोड़ हो गई है। इसका अर्थ है कि 22 वर्षों में किसानों की आय में 9.18 गुना की वृद्धि हुई। यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि 1993-94 से 2015-16 के बीच कृषि श्रम के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 4.62 गुना बढ़ोतरी हुई। कृषि श्रम के लिए उपभोक्ता सूचकांक ग्रामीण भारत में मूल्य वृद्धि को नापता है। इसलिए अगर हम इस दौरान बढ़ी महंगाई या मुद्रास्फीति के कारक को ध्यान में रखें तो पता चलता है कि किसानों की वास्तविक आय दोगुनी होने में 22 साल लग गए।

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रमेश चंद आगे कहते हैं, अगर हम 2015-16 को आधार वर्ष मानें तो 2022-23 तक किसानों की वास्तविक आय दोगुनी करने के लिए जरूरी है कि कृषक आय में सालाना वृद्धि दर 10.4 पर्सेंट हो। लेकिन 2002-03 से 2012-13 के बीच किसान की वास्तविक आय में महज 3.5 पर्सेंट सालाना की दर से ही बढ़त हुई। एनडीए सरकार के पहले तीन वर्षों में कृषि सेक्टर की वृद्धि दर भी गिरकर 1.8 पर्सेंट प्रतिवर्ष हो गई है, जोकि किसानों की आय दोगुनी करने के मोदी जी के सपने के लिए शुभ संकेत नहीं है। पहले से ही किसान खेती से अपनी लागत तक वसूल नहीं पा रहे हैं।

इस साल भी राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात के किसान उड़द, सोयाबीन और मूंग को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर बेचने को मजबूर हुए हैं। सब्जी उगाने वाले किसान तो और अनिश्चितता से घिरे रहे। किसानों की आय बढ़ाने के लिए बनाया गया नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (एनएएम) नाकाम साबित हुआ है। इसके जरिए राज्यों के बीच और राज्य के भीतर भी किसी तरह का खास व्यापार नहीं हुआ।

दूसरी तरफ कृषि आयात काफी बढ़े हैं, ये 2013-14 में 1.23 लाख करोड़ रुपये के स्तर से बढ़कर 2016-17 में 1.85 लाख करोड़ रुपये के हो गए। नतीजे में इस दौरान व्यापार अधिशेष 1.49 लाख करोड़ से 4.92 लाख करोड़ हो गया है। ऐसा कृषि आयात बढ़ने और कृषि निर्यात में कमी आने से हुआ। इससे निपटने के जरूरी है कि निर्यात में बाधा बनने वाली नीतियों, ड्यूटी फ्री आयात और उपभोक्ताओं को लेकर नीति निर्धारकों के बीच पूर्वाग्रह पर फिर से विचार किया जाए। सरकार का एक और कदम किसानों के खिलाफ जा रहा है, सरकार ने मुद्रास्फीति को रोकने के लिए एक तंत्र की स्थापना की है। इसका मकसद उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में होने वाली बढ़ोतरी को 6 पर्सेंट तक सीमित करना है।

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चूंकि खाद्य पदार्थों का संयुक्त भार 45.8 फीसदी है इसलिए मुद्रास्फीति या महंगाई पर नियंत्रण रखने के फेर में किसान की ही आमदनी में कमी की जाएगी। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने भी इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कहा है कि वाजिब आय ना मिल पाना कृषि संकट की अहम वजहों में से एक है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2009 से 2013 के बीच न्यूनतम समर्थन मूल्य में औसत सालाना बढ़ोतरी 19.3 फीसदी थी, जबकि 2014 से 2016 के बीच यह महज 3.6 प्रतिशत ही रही।

किसानों की आय दोगुनी करने के लिए बनी दलवई समिति 6,39,900 करोड़ रुपये के अतिरिक्त निवेश की बात करती है। किसान की आय बढ़ाने के लिए जरूरी 10.41 पर्सेंट की सालाना वृद्धिदर को पाने के लिए निजी क्षेत्र को 7.86 पर्सेंट प्रतिवर्ष की दर से निवेश करना होगा। वहीं कृषि, सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, परिवहन, ग्रामीण ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सरकारी निवेश सालाना 14.17 पर्सेंट की दर से किया जाना है। लेकिन इतनी बड़ी राशि का इंतजाम कैसे किया जाएगा इस मुद्दे पर नीति निर्धारक और सरकार मौन हैं। ऐसे अहम बिंदु पर सरकार की चुप्पी बताती है कि किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने वाले लक्ष्य के प्रति उसका रवैया कितना ढुलमुल है।

नैशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के मुताबिक, 2004-05 से 2011-12 के बीच किसानों की संख्या 16.61 करोड़ से घटकर 14.62 करोड़ हो गई है। मतलब हर साल 1.8 पर्सेंट की दर से किसान कम हो रहे हैं। अब नीति आयोग का अनुमान है कि अगर इसी दर से किसानों की संख्या कम होती रही तो 2015-16 से 2022-23 के बीच यह कमी 13.4 पर्सेंट होगी, इससे व्यक्तिगत किसान आय में बढ़ोतरी दिखेगी। अब यह अनुमान सही बैठेगा की नहीं यह तो समय ही बताएगा, लेकिन एक नया सवाल उठता है कि खेती छोड़ने वाले किसानों का क्या होगा? क्या सरकार इन कृषि मजदूरों को रोजगार मुहैया कराएगी? निश्चय ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ेगा।

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स्पष्ट है कि इस कृषि संकट का कोई एक स्पष्ट समाधान नहीं है। इसके लिए हमें बहुआयामी रवैया अपनाना होगा। इसकी शुरूआत कृषि कीमतों को तय करने वाले तंत्र की समीक्षा से होनी चाहिए, ताकि किसानों को उनकी लागत के हिसाब से कीमत मिले साथ ही एक ऐसी नीति बनाई जाए जो हरेक किसान को न्यूनतम आमदनी तय करे। इसके अलावा जरूरी है कि न केवल राज्यों के हिसाब से फसल बीमा योजनाएं बनाकर लागू की जाएं बल्कि समय से दावों का निपटारा भी सुनिश्चित किया जाए।

सरकार यह भी तय करे कि हर किसान को उसकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिले। बेहतर होगा कि घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार प्रतिबंधात्मक निर्यात नीतियां लागू करने से बचे, खुली व स्थायी निर्यात नीति अपनाई जाए जिसमें अचानक निर्यात प्रतिबंध लगाने और ऊंचे मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस लागू करने जैसे कदमों से बचा जाए।

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