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हावभाव और हरकतों से पहचाने जा सकते हैं महिलाओं के प्रति गलत सोच रखने वाले लोग

Arvind ShukklaArvind Shukkla   3 April 2018 12:01 PM GMT

हावभाव और हरकतों से पहचाने जा सकते हैं महिलाओं के प्रति गलत सोच रखने वाले लोगहावभाव देखकर भी अपनों को किया जा सकता है सचेत

‘अक्सर देखा गया है कि महिलाओं से जुड़े मामलों के बाद लोग सिर्फ पुलिस और सरकार को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। लेकिन पुलिस आपके घर में छिपे चचेरे भाई, दूर के मामा, पड़ोसी और अंकल को कैसे कैसे पहचान पाएगी’

“मेरे घर में दो नौकर थे। एक नौकर मेरी आठ वर्ष की बहन को हमेशा गलत तरीके से टच करता था। बहन तो नहीं समझ पाती थी लेकिन एक दिन मैंने समझा और पापा से बोलकर उसे हटवा दिया।” नोएडा में रहने वाली एमबीए की छात्रा मयूरी बताती हैं।

मयूरी की समझदारी से उनकी मासूम बहन नौकर की बदनियती से बच गईं लेकिन लखनऊ में कुछ समय पहले एक बच्ची के परिजन सामने रहने वाले रिक्शा चालक पड़ोसी को पहचान नहीं पाए। उसकी रेप के बाद हत्या कर दी। ऐसे वाक्ये हर शहर, मुहल्ले गांव से सुनने को आते हैं, ज्यादातर मामलों में आरोपी कोई जानकार, करीबी या ‘अपना’ होता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में यौन शोषण 34,651 के मामले हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र महिला द्वारा एक 2013 वैश्विक समीक्षा के अनुसार, “विश्व स्तर पर करीब 35 फीसदी महिलाओं ने या तो शारीरिक या यौन अंतरंग साथी हिंसा या गैर साथी यौन हिंसा का अनुभव किया है।”

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यौन शोषण के अधिकांश मामलों में आरोपी जानकार, दूर के रिश्तेदार निकले हैं। ऐसे में सिर्फ पुलिस और सरकार को कोसने भर से काम नहीं चलने वाला। अगर हम मयूरी की तरह थोड़ी सी जागरुकता और सावधानी बरतें तो न सिर्फ बच्चियों व महिलाओं बचाया जा सकेगा बल्कि ऐसे मानसिक रोगियों पर भी नकेल कसी जा सकेगी

यौन शोषण के अधिकांश मामलों में आरोपी जानकार, दूर के रिश्तेदार निकले हैं। ऐसे में सिर्फ पुलिस और सरकार को कोसने भर से काम नहीं चलने वाला। अगर हम मयूरी की तरह थोड़ी सी जागरुकता और सावधानी बरतें तो न सिर्फ बच्चियों व महिलाओं बचाया जा सकेगा बल्कि ऐसे मानसिक रोगियों पर भी नकेल कसी जा सकेगी। विदेशों में ऐसे अपराधियों पर लंबे समय से शोध किए जा रहे हैं। जापान की टोकियावा यूनिवर्सिटी से विक्टमोलॉजी पर अध्ययन करने करने वाली अपराध मनोवैज्ञानिक डॉ. अनुजा कपूर मानती हैं, “यह सही है कि ऐसे अपराधियों के सीघ नहीं होते हैं। लेकिन वो होते सोसायटी के बीच के ही हैं। उनकी हरकतों, व्यवहार और नजरों से समझा जरुर जा सकता है।”

“किसी भी पुरुष से मिलते वक्त उसकी शारीरिक भाषा, उसके हावभाव को समझने की कोशिश करें। अगर कोई लगातार घूरता है, आपको बार-बार छूने की कोशिश करता है। फेसबुक और व्हाट्सऐप पर एक दो दिन की चैटिंग के दौरान ही दोस्त या प्रेमी अगर सीधे वल्गर बातें या फिर न्यूड फोटो मांगता है तो उससे सावधान हो जाएं। भगवान ने लड़कियों को अपने अंदर की आवाज के रुप में छठी इंद्री का कवच दिया है।” वो आगे बताती हैं।

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यौन हिंसा की शिकार अगर नाबालिग लड़कियां ज्यादा हुईं हैं ऐसे मामलो में आरोपी भी अधिकतर नाबालिग ही सामने आए हैं।पिछले वर्ष लखनऊ में रहने वाला एक 15 साल का लड़का उस समय वूमेन पॉवर लाइन द्वारा पकड़ा गया जब वह एक हजार लड़कियों और किशोरियों को फोन से प्रताडि़त कर चुका था। लड़के के पास से पांच मोबाइल फोन और 15 सिम कार्ड बरामद हुए थे। वुमेन पॉवर लाइन में ट्रैकिंग का काम संभालने वाले सत्यवीर सचान बताते हैं, ‘’कुछ महीनों पहले गोमती नगर विस्तार की कक्षा 11 की एक छात्रा को एक छात्र ने व्हाट्सएप और फेसबुक पर ब्लैकमेल करने की कोशिश की। परेशान छात्रा ने पॉवर लाइन के नंबर पर अपनी शिकायत दर्ज कराई तब पता चला कि वो छात्र उसी के स्कूल का छात्र था। मामला एकतरफा प्रेम का था।“

वुमेन पॉवर लाइन से मिले आंकड़ों के अनुसार 15 नवंबर 2012 से 31 मार्च 2017 तक 7,44,296 महिलाओं-लड़कियों ने पावर लाइन में शिकायतें कीं। इनमें से 6,47,026 शिकायतें फोन द्वारा उत्पीड़न से संबंधित हैं। 61,072 शिकायतें सार्वजनिक स्थान पर उत्पीड़न से संबंधित हैं। 11,501 शिकायतें इन्टरनेट द्वारा उत्पीड़न से संबंधित हैं। 11,042 शिकायतें घरेलू उत्पीड़न हैं और महिलाओं के साथ होने वाली विभिन्न अपराधों की 1,758 शिकायतें हैं।

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नाबालिग आरोपियों के मनोदशा के बारे में बात करने पर मनोरोग चिकित्सक और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ की वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. शालिनी अनंत बताती है, ''यौन हिंसा करने वाले बच्चों में 70 से 80 प्रतिशत मानसिक रोगी होते हैं। 50 फीसदी बच्चे मारपीट का शिकार हो चुके होते हैं। 40 से 80 फीसदी बच्चे ऐसे होते हैं जो पूर्व में यौन हिंसा का शिकार हो चुके होते हैं।''

आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में 96.6 फीसदी रेप व छेड़छाड़ के मामलों में आरोपी पीड़ित के पड़ोसी, मित्र, परिजन, सहकर्मी या फिर रिश्‍तेदार पाए गए हैं। महज 3.39 फीसदी मामले ऐसे हैं जिसमें अज्ञात आरोपियों द्वारा हादसों को अंजाम दिया गया है। छेड़छाड़ और बलात्कार बढ़ने के पीछे मानसिक सोच और उत्तेजना या फिर नशाखोरी सामने आया है।

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता, डॉ. स्वेता पाठक बताती हैं, “संशोधित जुवेनाइल एक्ट आने के बाद भी बाल अपराध कम नहीं हो पा रहा है। जो भी दुष्कर्म के मामले हुए उनमें कारणों पर नजर रखने की जरूरत है। हाल ही में महिला से रेप करने के जुर्म में बंद एक अपराधी ने फिर से एक बच्ची से बलात्कार किया। ऐसे मामलों से साफ हो जाता है कि बाल सुधार गृह में बाल आरोपियों को सुधारा नहीं जा रहा।

अक्सर देखा गया है कि महिलाओं से जुड़े मामलों के बाद लोग सिर्फ पुलिस और सरकार को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। लेकिन पुलिस आपके घर में छिपे चचेरे भाई, दूर के मामा, पड़ोसी और अंकल को कैसे कैसे पहचान पाएगी

विशेषज्ञों ने दिए हैं ये कुछ सुझाव

लखनऊ में राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. संजय सिंह बताते हैं, “समस्या घर से ज्यादा है। घर में सबसे पहले छुपाने की आदतें खत्म होनी चाहिए। माता-पिता, खासकर घर की महिलाओं को बच्चों की मनोदशा समझनी चाहिए। बच्चों को भी अपने किसी न किसी बहुत करीबी को अपनी हर बात शेयर (साझा)करनी चाहिए।”

समाजसेविका उर्वशी शर्मा भी डॉ. संजय सिंह से इत्तेफ़ाक रखती हैं। वो बताती हैं, “बच्चे को गुड और बैड टच जरूर बताएं। जागरूकता और स्कूलों में सेक्स एजुकेशन से ऐसे मामलों में कमी लाई जा सकती है।” पुलिस विभाग के एक बड़े अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “अधिकतर मामलों में आरोपी जानकार निकलते हैं। इसलिए घर के लोगों को सतर्कता तो बरतनी ही होगी।”

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