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'मैं तीरंदाजी का कोच होकर आज पकौड़ियाँ तल रहा हूँ, मैं अब क्यों किसी बच्चे को खिलाड़ी बनाऊंगा'

तीरंदाजी के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे महेंद्र आज घर के बाहर समोसे और पकौड़ियाँ बेच रहे हैं, उत्तर प्रदेश में उनके जैसे संविदा पर काम कर रहे कई खेलों के प्रशिक्षकों को निकाल दिया गया।

Virendra SinghVirendra Singh   8 Sep 2020 10:01 AM GMT

बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)। घर के बाहर दरवाजे की मुंडेर पर बैठे महेंद्र चूल्हे में एक तरफ पकौड़ियाँ तो दूसरी तरफ समोसे तल रहे हैं, बगल में एक तख्त भी है जिस पर रोजमर्रा की जरूरत के कई सामान बेचने के लिए रखे हैं, करीब छह महीने पहले यही महेंद्र स्टेडियम में बच्चों को तीरंदाजी सिखाते थे।

बाराबंकी के एक छोटे से कस्बे शाहवपुर के रहने वाले महेंद्र सिंह अपने पिता की तरह तीरंदाजी में नाम कमाना चाहते थे। महेंद्र के पिता राष्ट्रीय स्तर के बड़े तीरंदाज थे। उनकी देखा-देखी महेंद्र ने भी तीरंदाजी की कई प्रतियोगताओं में हिस्सा लिया। अपने पिता के साथ दिन रात कड़ी मेहनत की और एक-एक करके महेंद्र ने दर्जनों मैडल अपने नाम किये, आखिरकार वे राष्ट्रीय स्तर के तीरंदाज भी बने।

इसके बावजूद महेंद्र को बाराबंकी के केडी सिंह बाबू स्टेडियम में बतौर कोच नौकरी मिली, मगर संविदा पर। करीब 18 साल से संविदा पर ही काम कर चुके महेंद्र को अब अपनी आजीविका चलाने के लिए पकौड़ियाँ बेचना पड़ रहा है। कोरोना काल में महेंद्र जैसे और संविदा पर काम कर रहे 450 कोच को निकाल दिया गया। अब महेंद्र नहीं चाहते हैं कि किसी बच्चे को तीरंदाजी सिखाकर वो उसका भविष्य बर्बाद करें।

घर के दरवाजे पर ही पांच महीनों से दुकान चला रहे हैं महेंद्र । फोटो : गाँव कनेक्शन

अपने घर के बाहर दुकान पर बैठे महेंद्र सिंह 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "मैंने अपना जीवन खेल को दे दिया, दर्जनों मैडल जीते, साल 2002 से मैं उत्तर प्रदेश के खेल विभाग में प्रशिक्षक रहा तीरंदाजी का, बाराबंकी के अलावा गोरखपुर, सोनभद्र, मिर्जापुर समेत कई जनपदों में बच्चों को सिखाया, मेरे सिखाये हुए 20 से ज्यादा बच्चे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेलें, कई बच्चे सेना में नायाब सूबेदार तक की रैंक पाए, आईटीबीपी वगैरह और बीएसएफ में भर्ती हुए हैं, मगर आज खुद मेरे यह हालात हैं।"

महेंद्र कहते हैं, "24 मार्च से उत्तर प्रदेश खेल निदेशालय द्वारा हम लोगों की प्रशिक्षण सेवाएँ समाप्त कर दी गईं, हमारे जैसे 450 कोच आज बेरोजगार हो गए, कोई मानदेय भी नहीं मिला, न हम लोगों को एक पैसा मिला, और हम लोगों की सेवाएँ भी समाप्त कर दी गईं। इतने सालों बाद आज भुखमरी से जूझते हुए मुझे यह पकौड़ी का स्टॉल लगाना पड़ रहा है।"

खेल की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले महेंद्र के परिवार में छह लोग हैं। माँ, पत्नी, दो बच्चे, इसके अलावा घर में बड़े भाई भी हैं, मगर उनका मानसिक संतुलन ठीक न होने की वजह से वो कुछ काम नहीं कर पाते। पांच महीनों से अपनी नौकरी खो चुके महेंद्र अपने हालात पर उत्तर प्रदेश में खेलों की व्यवस्था में सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हैं।

तीरंदाजी में कई मैडल अपने नाम कर चुके हैं महेंद्र। फोटो : गाँव कनेक्शन

महेंद्र बताते हैं, "उत्तर प्रदेश में खेलों की बहुत दुर्दशा है, तमाम प्रतिभाएं जो अपने प्रदेश में निकलती हैं वो पंजाब-हरियाणा जैसे खेलों को तरजीह देने वाले राज्यों में चली जाती हैं, मेरी ही हालात यह है तो मैं किस मुंह से अपने बच्चे से या किसी बच्चे से कहूँ कि वो तीरंदाजी में अपना करियर बनाए या तुम्हें नौकरी मिल जायेगी, मैं खुद 20 साल के करियर के बाद पकौड़ियाँ तल रहा हूँ।"

निराश होकर महेंद्र कहते हैं, "मैं अंतरात्मा से बहुत दुखी हूँ और कम से कम अब अपने बच्चे या किसी भी बच्चे को तीरंदाजी में लाने का प्रयास नहीं करूँगा।"

सालों कड़ी मेहनत के बाद उनके जैसे कई खेलों के प्रशिक्षक कोरोना काल में बेरोजगार हो गए। महेंद्र बार-बार अपने मेडलों की ओर देखते हैं, शायद इस उम्मीद में कि संविदा पर ही सही मगर सरकार कम से कम उनकी नौकरी उनको वापस दे दे।

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