इस बार के बजट में किसानों को प्राथमिकता नहीं दी तो संकट में आ जाएगा कृषि क्षेत्र

इस बार के बजट में किसानों को प्राथमिकता नहीं दी तो संकट में आ जाएगा कृषि क्षेत्र2018-19 के बजट में कहां होगा किसान।

उद्योग एवं वाणिज्य संगठन एसोचैम ने पिछले दिनों अपने एक बयान में कहा था कि सरकार को 2018-19 के बजट में कृषि को सर्वेाच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि सरकार कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता नहीं देती। लेकिन एसोचैम का ये बयान कई मायनों में बहुत जरूरी है। हमें ये देखना होगा कि आखिर क्यों सरकार को आगामी बजट में इस क्षेत्र पर सबसे ज्यादा ध्यान देने आवश्यकता है।

एसोचैम ने पीटीआई से कहा "सरकार को बजट में कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। क्योंकि खरीफ फसलों के उत्पादन में भारी गिरावट से चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में कृषि क्षेत्र की वृद्धि कम हो गयी है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में कृषि क्षेत्र के सकल मूल्यवर्धन की वृद्धि दर पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 4.1 प्रतिशत की तुलना में कम होकर 1.7 प्रतिशत पर आ गई है। आधारभूत कीमत के आधार पर वृद्धि इस दौरान 10 प्रतिशत से कम होकर 3.7 प्रतिशत पर आ गयी।

खाद्यान्न उत्पादन में 2.8 प्रतिशत की गिरावट

इस दौरान खाद्यान्न उत्पादन में 2.8 प्रतिशत की गिरावट आयी। पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में खाद्यान्न उत्पादन में 10.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। एसोचैम के महासचिव डी.एस.रावत ने पीटीआई से कहा "चूंकि कृषि क्षेत्र में सकल मूल्यवर्धन में पशुपालन, मत्स्यपालन और वानिकी का करीब आधा योगदान होता है, वित्त मंत्री अरुण जेटली को सिंचाई जैसी प्रमुख कृषि ढांचगत संरचना समेत इन क्षेत्रों पर भी ध्यान देना चाहिए।"

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उन्होंने कहा, ‘‘हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार पाता है, उपभोग और निवेश आधारित वृद्धि का तब तक फायदा नहीं होगा जब तक कि पूरे कृषि क्षेत्र को संकट से बाहर नहीं निकाला जाए।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘भारतीय उद्योग जगत का बड़ा हिस्सा ग्रामीण मांग पर काफी निर्भर करता है। यह मांग तब तक कम रहेगी जब तक कि अल्पावधि या मध्यावधि में तत्काल इस बाबत कदम नहीं उठाया जाएगा।’’

कर्ज का लक्ष्य 10 लाख करोड़ रुपए किया गया

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 के बजट में कृषि पर विशेष जोर देते हुए किसानों की आय अगले पांच साल में दोगुना करने की सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई थी और कृषि क्षेत्र के लिए वित्त वर्ष 2017-18 में कर्ज का लक्ष्य एक लाख करोड़ रुपए बढ़ाकर रिकार्ड 10 लाख करोड़ रुपए कर दिया था। जेटली ने कहा था ‘‘वित्त वर्ष 2017-18 में कृषि ऋण के लिए लक्ष्य रिकार्ड 10 लाख करोड़ रुपए तय किया गया है। सरकार पूर्वोत्तर तथा तथा जम्मू कश्मीर में कृषि क्षेत्र के लिए ऋण प्रवाह सुनिश्चित करने के लिये विशेष उपाय करेगी।"

2022 तक आय दोगुना करने के लक्ष्य कैसे पूरा होगा

वर्ष 2001 से वर्ष 2015 के बीच भारत में 234657 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की क्योंकि न तो उन्हें उत्पाद का उचित मूल्य मिला, न बाज़ार में संरक्षण मिला और न ही आपदाओं की स्थिति में सम्मानजनक तरीके से राहत मिली। उत्पाद की लागत बढ़ती गयी और खुला बाज़ार किसानों को निचोड़ता गया। पिछले बजट में कृषि ऋण के रूप में 10 लाख करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया।इस सवाल का जवाब कौन देगा कि सरकार किसान को कर्जा दी तो देगी, पर वह “ऋण” चुकायेगा कैसे? इसका तब भी कोई जवाब नहीं था और आज भी कोई जवाब नहीं है। वास्तविकता यह है कि “कर्जा” ही किसानों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण बना है।

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बजट में कहा गया था कि अगले पांच सालों में किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। सवाल यह है कि आज बमुश्किल 3000 रुपए कमाने वाले परिवार की आय यदि वर्ष 2022 में 6000 रुपए हो भी गई, तो इसके मायने क्या होंगे?

किसानों की आय दोगुनी करने के दावे को कृषि से जुड़े विशेषज्ञ हवा-हवाई बता रहे हैं। किसानों के मुद्दे पर लिखने वाले देश के जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ कहते हैं, “देश में बीज, उर्वरक, कीटनाशक और साथ ही कृषि यंत्रों की कीमत तेजी से बढ़ी है, जिसका नतीजा है कि कृषि लागत तेजी से बढ़ी है, लेकिन सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से बच रही है। सरकार जानबूझकर कृषि को किसानों के लिए घाटे का सौदा बना रही है ताकि किसान खेती-बाड़ी छोड़ दें और फिर कृषि कॉर्पोरेट के लिए बेतहाशा फ़ायदे का सौदा हो जाए।“

किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले स्वराज इंडिया के संयोजक योगेन्द्र यादव बताते हैं, “आज देश एक बहुत बड़े कृषि संकट के दौर से गुज़र रहा है। किसान भारी कर्ज़े में डूबा हुआ है। हर दिन कहीं न कहीं से अन्नदाता के खुदकुशी की खबरें आती हैं। देश का पेट भरने वाला किसान खुद अपने परिवार का पेट नहीं पाल पा रहा। कर्ज़ न चुका पाने के अपमान के कारण अपनी जान तक देने को मजबूर हो रहा है। जिन कारणों से खेतीबाड़ी की ये स्थिति है, जिनकों दूर करने के लिए सरकारें काम नहीं कर रही हैं।"

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योगेंद्र यादव आगे कहते हैं, “आज स्थिति ऐसी है कि कोई भी किसान अपने बच्चे को किसान नहीं बनाना चाहता। जिनके पास खेती की ज़मीन है वो लोग भी मजबूर होकर गाँव से पलायन कर रहे हैं। गाँव में खेती करने के बजाए शहर में रिक्शा चलाने को, मज़दूरी करने को भी तैयार हैं किसान। ऐसे में केन्द्र सरकार का वर्ष 2022 तक किसान की आय दोगुनी करने का दावा सिर्फ लोकलुभावन घोषणा के अलावा कुछ नहीं है।"

लागत कम करना चुनौती

किसानों को क्यों लाभ नहीं हो रहा, इसका एक सबसे बड़ा कारण ये है कि किसानों लागत कम नहीं हो रही है। सरकार भले ही इसके लिए प्रयास कर रही हो, लेकिन ये जमीनी हकीकत से दूर है। इस बारे में प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक अरविंद सिंह गाँव कनेक्शन के लिए लिखे एक लेाख में कहते हैं "भारत को आजादी मिली तो कृषि का जीडीपी में योगदान 52 फीसदी तक था जो अब घट कर 17 फीसदी पर आ गया है।

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खेती और गांव-देहात की उपेक्षा से कई तरह के संकट खड़े हो रहे हैं। छोटे किसानों के पास पूंजी की कमी है, जबकि खेती की लागत बढ़ रही है। उनके पास मशीनरी और श्रम शक्ति का भी भारी अभाव है। योजनाएं उनके पास पहुंचने के पहले ही दम तोड़ देती है। इसी नाते बड़ी संख्या में छोटे किसान खेती छोड़ शहरों को पलायन कर रहे हैं।"

क्यों जरूरी है कृषि क्षेत्र

कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों एवं प्रयासों से कृषि को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विशेष दर्जा मिला है। कृषि क्षेत्रों में लगभग 60% श्रमिकों को रोज़गार मिला हुआ है। प्लानिंग कमीशन, भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार 1950-51 में कुल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 59.2% था जो घटकर 1982-83 में 36.4% और 1990-91 में 34.9% तथा 2001-2002 में 25% रह गया। यह 2006-07 की अवधि के दौरान औसत आधार पर घटकर 18.5% रह गया।

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दसवीं योजना (2002-2007) के दौरान समग्र सकल घरेलू उत्पाद की औसत वार्षिक वृद्धि दर 7.6% थी जबकि इस दौरान कृषि तथा सम्बद्ध क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि दर 2.3% रही। 2001-02 से प्रारंभ हुई नव सहस्त्राब्दी के प्रथम 6 वर्षों में 3.0% की वार्षिक सामान्य औसत वृद्धि दर 2003-04 में 10% और 2005-06 में 6% की रही। जो इस साल चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में कृषि क्षेत्र के सकल मूल्यवर्धन की वृद्धि दर पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 4.1 प्रतिशत की तुलना में कम होकर 1.7 प्रतिशत पर आ गई है। देश के कुल जीडीपी (सकल घरेलू उत्पादन) का 18 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र से ही आता है। देश में कुल रोजगार का 50 फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। 50 प्रतिशत आबादी कृषि पर आश्रित है।

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