अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के नजरिए से जानिए क्या होगा जीएसटी का असर? 

अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के नजरिए से जानिए क्या होगा जीएसटी का असर? एक जुलाई से लागू होगा जीएसटी

लखनऊ। एक जुलाई से पूरे देश में जीएसटी लागू होने जा रहा है। जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) को लेकर लोगों में कई तरह के सवाल हैं। अब किसी भी तरह के सामान पर एक ही तरह का टैक्स लगेगा जो कि उसकी बिक्री (आउटपुट) पर आधारित होगा। अभी तक टैक्स वहां लगता था जहां सामान बनता था। उसके बाद अलग-अलग लेवल पर अलग टैक्स लगता था। जैसे एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स और वैट, इनकी जगह पर अब एक ही टैक्स लगेगा।

यहां जीएसटी को लेकर जेएनयू के अर्थशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर अरुण कुमार अलग-अलग बिंदुओं पर अपनी राय दे रहे हैं।

छोटे कारोबारियों को हो सकता है नुकसान

अरुण कुमार के अनुसार, छोटे उद्योग और कारोबारी जीएसटी को आसानी से अमल नहीं कर पाएंगे। कहा जा रहा है कि इसमें इंफास्ट्रक्चर होगा, आईटी का बैकबोन होगा लेकिन ये पूरी तरह जटिल प्रक्रिया है। जीएसटी अनुपालन जीएसटीएन नेटवर्क से जुड़े कंप्यूटर सिस्टम के बिना हो ही नहीं सकता है। इस वजह से छोटे कारोबारी व उद्योग इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ नहीं ले सकेंगे।

इनपुट टैक्स क्रेडिट- यानी एक प्रोडक्ट पर एक ही बार टैक्स लगेगा। मान लीजिए किसी सामान को बनाने के लिए आपने कच्चा माल खरीदा, उससे बनी वस्तु की लागत के आधार पर कुल 10,000 रुपए टैक्स हुआ जबकि 3,000 रुपए टैक्स आप पहले ही कच्चे माल पर अदा कर चुके हैं तो ऐसे में आपकी कुल देनदारी में कच्चे माल का टैक्स घटा दिया जाएगा और आपको कुल 7,000 रुपए टैक्स देना होगा। यानी 3000 रुपए इनपुट क्रेडिट हुआ।

लेकिन जीएसटी के इस नियम का फायदा तभी मिल सकता है जब सभी कच्चे माल का बिल साथ में अटैच हो।

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प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं कि मान लीजिए छोटा व्यापारी थोक में पेंसिल-रबर खरीदता है तो उसे उसका भी लेखा-जोखा रखना होगा। जरा सी भी चूक होने पर खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। जीएसटी के अनुसार 20 लाख से कम टर्नओवर वाला बिजनेसमैन जीएसटी के दायरे में नहीं आएगा। इससे अब जब छोटे व्यापारी आगे जहां माल बेचेंगे तो उन्हें इनपुट क्रेडिट नहीं मिल पाएगा।

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अब इस सुविधा का लाभ लेने के लिए छोटे कारोबारियों को जीएसटीएन नेटवर्क में रजिस्टर्ड कराना होगा। उसके लिए लागत काफी आएगी। यानी दोनों ही तरह से छोटे व्यापारियों को नुकसान है। वहीं बड़े व्यापारियों का व्यापार पहले से ही क‍म्प्यूटराइज है, उनके पास अकाउंटेड है, तो उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट का भी फायदा होगा। उनका माल सस्ता हो जाएगा, छोटे उद्योगों का नहीं होगा। यानी कुल मिलाकर जीएसटी बड़े उद्योगों और कारोबारियों के लिए ही फायदेमंद है।

रोजगार कम होने की संभावना

अरुण कुमार कहते ह‍ैं, ‘छोटे व्यापारियों को नुकसान होने से बेरोजगारी बढ़ेगी क्योंकि असली रोजगार तो छोटे उद्योग में होते हैं, जहां 93 फीसदी रोजगार होता है। बड़े उद्योगों में तो 60 फीसदी लोग काम करते हैं। छोटे कारोबारियों को नुकसान होने से 93 फीसदी पर झटका लगेगा तो रोजगार को भी नुकसान होगा। इकोनॉमी की डिमांड कम हो जाएगी। जैसे विमुद्रीकरण के दौर में हुआ था। अब आउटपुट यानी प्रोडक्शन का स्तर गिर सकता है।’

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जीडीपी कम होगी

सरकारा दावा कर रही है कि जीएसटी लागू होने से जी़डीपी (ग्रॉस डॉमेस्टिक प्रोडक्ट) पर ग्रोथ होगी लेकिन बड़े उद्योग को फायदा मिलने और छोटे उद्योग में बेरोजगारी बढ़ने से जीडीपी ग्रोथ भी कम होने की संभावना ज्यादा है। देश की जीडीपी पर जीएसटी का एक से दो फीसदी असर हो सकता है। छोटे व्यापारी तो अभी भी जीएसटी का ककहरा सीखने की जुगत में परेशान हैं। चार्टेट अकाउंटेड की मदद ले रहे हैं।

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टैक्स रेट काफी ऊंचे- महंगाई बढ़ने की संभावना

जीएसटी में टैक्स रेट काफी ऊंचे रखे गए हैं। हालांकि बेहद जरूरी चीजों को जीरो पर्सेंट टैक्स स्लैब में रखा गया है लेकिन चूंकि जीएसटी इनडायरेक्ट टैक्स है तो इसमें टैक्स जहां लगता है उसका असर कहीं और होता है। गेहूं पर जीरो पर्सेंट टैक्स है। जीएसटी या सीएसटी कुछ नहीं है लेकिन अगर ट्रक के दाम बढ़ गए, ट्रांसपोर्टेशन या पेट्रोल के दाम बढ़ गए तो गेहूं के दाम अपने आप इजाफा हो जाएगा। टैक्स रेट ऊंचे रखने की वजह राजस्व ज्यादा इकट्ठा होना भी है। ज्यादा रेवेन्यू इकट्ठा करने की वजह से महंगाई आने की संभावना है। इनडायरेक्ट टैक्स की मात्रा बढ़ेगी तो दाम बढ़ेंगे और महंगाई बढ़ेगी। मेरे अनुसार टैक्स रेट को 10 फीसदी रखा जाना चाहिए था। फिलहाल 15 से 18 फीसदी है।

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कैसे निर्धारित होता है किस पर कितना लगेगा टैक्स

टैक्स लगाने के दो प्रावधान है पहला रेवेन्यू म्युचुअल रेट (आरएमएल)। यानी जिस उत्पाद पर अभी जितना राजस्व मिल रहा है उसे आगे भी मेंटेन करने के लिए। दूसरी चीज ये है कि कौन सी चीज कितनी जरूरी है। रेट बहुत ज्यादा इधर उधर न हो, इसका ध्यान भी रखा जाता है। इस लिहाज से कुछ बेहद जरूरी चीजों पर जीरो पर्सेंट टैक्स, फिर उससे कम को दूसरे टैक्स दरों में शामिल किया गया है।

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टैक्स दरों की संख्या कम होनी चाहिए

जीएसटी तभी अच्छा काम करता है जब एक टैक्स दर एक हो। 2015 में सरकार के प्रस्ताव में एक टैक्स रेट शामिल किया जा रहा था फिर तीन और अब पांच हो गए हैं इस वजह से जीएसटी असंतुलित हो रहा है। जीएसटी का डिजाइन अपसेट हो गया और काफी जटिलता आ गई है। जिन वस्तुओं पर ज्यादा टैक्स होता है उनको बाहर रख दिया। पेट्रोलियम, रियलस्टेट, अल्कोहल और बिजली को इससे बाहर किया गया है। इससे जीएसटी का डिजाइन खराब हो रहा। 28 फीसदी टैक्स स्लैब में कुछ आयटम पर टैक्स के ऊपर टैक्स भी लगाया है जिसे सेस टैक्स कहते हैं।

(जैसा कि उन्होंने गांव कनेक्शन से शेफाली श्रीवास्तव को बताया)

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