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लॉकडाउन: 'हमारी बिहार की सरकार ने हमें एहसास करा दिया है कि हम बिहारी हैं तो हमेशा पीछे ही रहेंगे'

देश के अलग-अलग हिस्सों में फंसे बिहार के छात्र अपने घर लौटने की मांग कर रहे हैं। कोटा में सोमवार 27 अप्रैल को छात्रों ने विरोध प्रदर्शन भी किया।

Mithilesh DharMithilesh Dhar   28 April 2020 4:45 PM GMT

लॉकडाउन: हमारी बिहार की सरकार ने हमें एहसास करा दिया है कि हम बिहारी हैं तो हमेशा पीछे ही रहेंगेबायें से पहली तस्वीर राजस्थान के कोटा की है जबकि दूसरी तस्वीर प्रयागराज की है।

"भैया हम बहुत परेशान हैं। हमारे पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। हमने कल रात में खाना खाया था, आज देखिये दिन के चार बज गये हैं। अभी तक भूखे ही हैं, जल्दी से कुछ मदद भेजिये।" फोन पर यह बताते-बताते 18 साल के रमनजी महतो का गला भर आता है।

राजस्थान के कोटा में मेडिकल की तैयारी करने वाले बिहार के जिला दरभंगा के रहने वाले रमनजी महतो से जब 29 मार्च को हमारी बात हुई थी तब उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था। समाजसेवियों के माध्यम से उन तक खाना पहुंच तो गया लेकिन परेशानी अभी भी कम नहीं हुई। अपने घर से लगभग 1,200 किमी दूर पिछले साल वे डॉक्टर बनने का सपना लिये कोटा पहुंचे थे।

वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "जब आप लोगों से बात हुई थी तब खाने की व्यवस्था तो हो गई थी। खाना लेकर आने वाले लोगों ने कहा था कि आगे कोई दिक्कत होगी तो बताना, लेकिन अब कोई फोन नहीं उठाता। कोई कब तक खाना भेजेगा। पहले हॉस्टल में 30-40 बच्चे थे। उसमें से ज्यादातर बच्चे उत्तर प्रदेश के थे, जो अपने घर जा चुके हैं। अब हम तीन-चार लोग बचे हैं जो बिहार के हैं। आप प्लीज सरकार से बोलिए कि हमें भी बुला ले।"

राजस्थान के कोटा में देशभर के छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी करने के लिए जाते हैं। इसमें बिहार और उत्तर प्रदेश के छात्रों की संख्या भी काफी होती है। लॉकडाउन बढ़ने के बाद जब इन छात्रों की परेशानी बढ़ने लगी तब पहले उत्तर प्रदेश की सरकार ने कोटा से छात्रों को बुलाने का फैसला लिया, फिर मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, पश्चिम बंगाल और असम सरकार ने भी अपने-अपने प्रदेश के छात्रों को बुलाने का फैसला लिया, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन है।


अब देश के अलग-अलग हिस्सों में फंसे बिहार के छात्र अपने घर लौटने की मांग कर रहे हैं। कोटा में सोमवार 27 अप्रैल को छात्रों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। कोटा पुलिस ने इसके बाद मेस और कोचिंग संचालकों और छात्रों पर मामला भी दर्ज किया है।

"मेरे पापा सूरत (गुजरात) में काम करते हैं। उनके पास भी पैसे भी नहीं हैं कि हमें भेज सकें। हम यहां कब तक जिंदा रह पाएंगे। किसी तरह खिचड़ी बनाकर खा रहे हैं। मेस बंद हैं और बाहर खाने का कुछ मिल नहीं रहा। ऐसे में हमारे पास और चारा ही क्या है, जब कोई सुनेगा नहीं तो हम विरोध प्रदर्शन ही करेंगे ना।" रमनजी आगे कहते हैं।

कोटा में रह रहे है धर्मवीर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वे बिहार के नालंदा जिले के रहने वाले हैं और वर्ष 2019 में स्टूडेंट कार्ड पर लोन लेकर कोटा डॉक्टरी की तैयारी कर रहे हैं।

वे बताते हैं, "पिताजी नालंदा में ही रहते हैं। वे मजदूर हैं बड़ी मुश्किल से वे कुछ पैसे भेज पाते थे। मैं यहां किसी तरह से खर्च मैनेज कर रहा था, लेकिन लॉकडाउन के बाद सभी दरवाजे बंद हो गये। मेरे पीजी में पहले 10 लोग रहते थे, अब हम दो लोग बचे हैं और दोनों लोग बिहार के हैं। सबसे बड़ी दिक्कत खाने की है। मेस बंद है और हमें खाना बनाने नहीं आता। किसी तरह कुछ बना रहे हैं लेकिन कोटा हॉटस्पॉट है, इस कारण हम बहुत परेशान हैं। मैं नीतीश कुमार जी से निवेदन करता हूं बस भेजकर हमें यहां से अपने गांव भेज दें।"

ये तस्वीर भी राजस्थान के कोटा की है।

कोटा और देश के दूसरे राज्यों में फंसे बिहार के छात्रों को वापस बुलाने की मांग अब धीरे-धीरे जोर पकड़ रही है। जहां विपक्ष सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार को घेर रही है तो वहीं मंगलवार को पटना विश्चविद्यालय के बाहर छात्र नेताओं ने विरोध प्रदर्शन की कोशिश की। जिसके बाद पटना विश्चविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष मनीष कुमार और छात्र नेता लव कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया।

समस्तीपुर के राजन कुमार भी कोटा में रहकर मेडिकल की तैयारी करते हैं। वे अब इसलिए ज्यादा परेशान है क्योंकि उनके पीजी से ज्यादातर लोग अपने घर चले गये।

वे कहते हैं, "मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश हर जगह के बच्चे चले गये। शायद हम बिहार के हैं इसलिए हमारे साथ ऐसा हो रहा है। हम हर तरह से पिछले हैं और इस मामले में भी पीछे ही रहेंगे। हम लोग यहां एक कमरे में रहते-रहते मानसिक रूप से बीमार हो जो रहे हैं। पढ़ेंगे क्या भगवान ही जाने। न ढंग से खाना बनाने आता है और न ही यहां कुछ खाना मिल रहा।"

इलाहाबाद विश्चविद्यालय प्रशासन द्वारा जारी आदेश।

इधर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों को हॉस्टल खाली करके घर लौटने के लिए कह दिया गया है। यहां भी बिहार के छात्र फंसे हुए हैं जो अब बिहार सरकार से मांग कर रहे हैं कि उन्हें प्रदेश सरकार उनके घरों तक पहुंचा दे। अपनी मांग को लेकर छात्रों ने मंगलवार को 12 घंटे का उपवास भी रखा।

बिहार के सिवान जिले के रहने वाले राहुल पांडेय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र हैं और विश्वविद्यालय के ही हॉस्टल में रहते हैं। वे काफी दिनों से परेशान थे, लेकिन उनकी परेशानी तब ज्यादा बढ़ गई जब विश्वविद्यालय के तरफ से आदे आदेश में कह दिया गया कि सभी छात्र हॉस्टल खाली करके अपने घर लौट जाएं।

राहुल गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "बताइये, कोई मजाक चल रहा है। यहां कहा जा रहा है कि सभी छात्र अपने घर चले जाएं, हॉस्टल खाली कर दें लेकिन कोई यह तो बताये हम अपने घर जाएंगे कैसे। आसपास जिलों के छात्र कबके अपने घर लौट गये, लेकिन हमारी प्रदेश सरकार हमें बुला ही नहीं रही है। ये हमारे साथ अन्याय है।"

"हमारे मुख्यमंत्री नीतीश जी विधायक के बेटे को बाहर से बुलाने के पास दे सकते हैं तो हमें क्यों नहीं बुला रहे हैं। योगी जी तो अपने छात्रों को बुला रहे हैं। हमारी जांच हो जाये फिर हमें अपने घर पहुंचवा दें। अगर बुला नहीं सकते तो हमें कम से कम पास दे दें ताकि हम अपने घर जा सकें। लॉकडाउन कब खत्म होगा पता नहीं। हम यहां रहकर क्या करेंगे।"

स्टूडेंट ऑफ इंडिया, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सोशल मीडिया संयोजक अंजय पांडेय बग्गी बताते हैं, "हम विश्वविद्यालय प्रशासन से बात कर रहे हैं और मांग भी कर रहे हैं कि जब तक बिहार के छात्रों को वापस नहीं बुलाया जाता तब तक उन्हें छात्रावास में रहने की इजाजत दी जाये। छात्रों के साथ तो यह ज्यादती है।"

पटना विश्चविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष मनीष कुमार आरोप लगाते हैं कि सरकार बस पूंजीपतियों की सुनती है। मंगलवार को गिरफ्तारी से ठीक पहले उन्होंने गांव कनेक्शन से फोन पर कहा, "हम बिहार सरकार से लगातार मांग कर रहे हैं बिहार के छात्र जहां भी फंसे हुए हैं उन्हें हर हाल में बुलाया जाये। अगर दूसरी प्रदेश सरकारें ऐसा क सकती हैं तो हमारे प्रदेश में ये संभव क्यों नहीं। हमारी प्रदेश सरकार तो यह भी जानने की कोशिश नहीं कर रही है कि हमारे छात्र वहां किन हालातों में है, किन मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।"

पटना विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं ने किया प्रदर्शन।

मिथिला स्टूडेंट यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव आदित्य मोहन बिहार सरकार पर संवेदनहीनता और लापरवाही के आरोप लगाते हुए कहते हैं, "हरेक राज्य सरकार कोटा से अपने छात्रों को वापस बुलाने पर राजी है, सिवाय बिहार के। कोटा के छात्र वहां खाने-पीने के लिए मेस और हॉस्टल पर ही डिपेंड किया करते हैं। उनके पास खुद खाना बनाने का साधन बहुत कम होता है। मेस, हॉस्टल आदि बंद हो चुके हैं तो 17-18 साल के ये हजारों छात्र वहां भूखे रहने की स्थिति में आ गए हैं।"

"नीतीश कुमार इन छात्रों को वहीं रहने की सलाह दे रहे हैं। ऐसे विपत्ति काल में उनके सरकार का ये बर्ताव संवेदनहीन और लापरवाह है। क्या इन बच्चों को वहां से लाकर अपने राज्य में कहीं टेस्टिंग और होम क्वारेंटाइन आदि की व्यवस्था नहीं की जा सकती। कोटा के छात्रों को त्वरित वहां से लाकर टेस्टिंग आदि के बाद क्वारेंटाइंन में रखने की व्यवस्था जल्द होनी चाहिए।" आदित्य आगे कहते हैं।

कोटा से बच्चों को लाने का मामला पटना हाईकोर्ट पहुंच गया है। कोटा में पढ़ रही बिहार की एक छात्रा के पिता ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि छात्रा को कोटा में रहने और खाने की परेशानी हो रही है। लड़की के पिता ने याचिका में कहा है कि जिस तरह यूपी, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, पश्चिम बंगाल और असम की सरकारें कोटा में पढ़ने वाले अपने छात्रों को वापस लाई हैं उसी तरह बिहार सरकार भी अपने राज्य के छात्रों को वापस बुलाए। इसी पर हाईकोर्ट ने बिहार सरकार से पांच दिन में जवाब मांगा है।

बिहार आपदा प्रबंधक विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत ने इस बारे में 28 अप्रैल को पत्रकारों को बताया कि दूसरे राज्यों में फंसे बिहार के लोग और उनको प्रदेश सरकार द्वारा दी जा रही मदद के बारे में हाईकोर्ट के निबंधक कार्यालय को रिपोर्ट सौंप दी है। इसमें बिहार सरकार ने बताया कि लॉकडाउन के नियमों और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन किया जा रहा है। लॉकडाउन की अवधि में प्रदेश के किसी भी व्यक्ति को वापस नहीं लाया जा सकता। ऐसे लोगों को समुचित भोजन, राशन के साथ तत्काल एक-एक हजार रुपए दिए जा रहे हैं।

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