ग्रामीण भारत में किसकी मजदूरी सबसे ज्यादा बढ़ी ?

ग्रामीण भारत में किसकी मजदूरी सबसे ज्यादा बढ़ी ?राजमिस्त्रियों की मजदूरी सबसे ज्यादा बढ़ी (फोटो-)

सोमवार को इंटरनेशनल राइट्स ग्रुप ऑक्सफैम ने आमदनी के मामले में अपनी सर्वे रिपोर्ट सार्वजिनक की। ये रिपोर्ट पढ़ने के बाद आम भारत में आर्थिक तरक्की का अनुमान लगा सकते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि देश की संपत्ति के 73 फीसदी हिस्से पर एक फीसदी अमीर बैठे हैं। वहीं ग्रामीण भारत के मजदूरों की स्थिति बदतर होती जा रही है।

इंटरनेशनल राइट्स ग्रुप ऑक्सफैम की रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि हमारे देश में अमीर और अमीर होते जो रहे हैं, गरीब और गरीब हो रहा है। ग्रामीण भारत में न्यूनतम मजदूरी पाने वाले मजदूरों को बड़ी कंपनी के शीर्ष वेतन वाले अधिकारियों की सलाना आय के बराबर पहुंचने में 941 साल लग जाएंगे।

इस रिपोर्ट से हमें पता चलता है कि ग्रामीण भारत में मजदूरों की स्थिति ठीक नहीं है। बावजूद इसके अगर पर एक दूसरे सर्वे पर नजर डालेंगे तो पता चलता है कि ग्रामीण भारत में वैसे तो मजदूरों की आमदनी घटी है लेकिन, राजमिस्त्रियों की मजदूरी दर पिछले 20 साल में सबसे ज्यादा बढ़ी है।

सरकार की योजनाओं से आम लोगों को फायदा तो होता ही है, उससे जुड़े लोग भी फायदे में रहते हैं। कुछ ऐसा ही राजमिस्त्रियों के साथ भी हुआ है। सरकार की आवासीय योजनाओं से इन्हें भी फायदा हुआ है।

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उत्तर प्रदेश के वाराणसी, ब्लॉक जंसा के गांव पंडितपुर के रहने वाले विनोद पांडेय (50) जो पेशे से टीचर हैं, उन्होंने गाँव कनेक्शन को बताया "15 साल पहले जब मैंने घर बनवाया था तो उस समय राजमिस्त्री डेली के आधार पर 100 रुपए से भी कम लेते थे। लेकिन अब जब फिर घर में कुछ काम करवा रहा हूं तो राजमिस्त्री 250 से 400 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से पैसे की मांग कर रहे हैं।

ग्रामीण भारत में राजमिस्त्रियों की मजदूरी दर पिछले 20 सालों में सबसे ज्यादा बढ़ी है। बेंगलुरु-स्थित फाउंडेशन फ़ॉर अग्रेरियन स्टडीज़ ने अपने शोधपत्र "रिव्यु ऑफ़ अग्रेरियन स्टडीज़" की शोध में ये बात सामने आई है। 1998 से 2017 के बीच राजमिस्त्रियों की मजदूरी बढ़ई, लोहार और अकुशल श्रमिक की अपेक्षा इन वर्षों में कहीं ज्यादा बढ़ी है।

रिव्यु ऑफ़ अग्रेरियन स्टडीज़ ने 1998 और 2017 के बीच के वर्षेां को दो भागों 1998-99 और 2016-17 में बांटकर ये रिसर्च किया। रिसर्च को इंडियन लेबर जर्नल में प्रकाशित किया गया जिसमें पूरे ग्रामीण भारत की तस्वीर सामने आई है।

ग्रामीण मजदूरों में बढ़ई, राजमिस्त्री, लोहार और अकुशल श्रमिकों को रखा गया है। 1998-99 से 2007 के बीच राजमिस्त्री की आय में मामूली बढ़त हुई थी। 1998 में ग्रामीण भारत में इनकी दैनिक आय 177 रुपए थी जो 2007 में 189 रुपए तक पहुंची। वहीं इस दौरान बढ़ई की 167 से 175 और अकुशल श्रमिकों की मजदूरी दर 91 से 93 रुपए तक पहुंची। तेजी 2007 के बाद आई। जनवरी 2007 से नवंबर 2017 तक राजमिस्त्रियों की मजदूरी दर 251 रुपए तक हो गई है। जबकि बढ़ई की 227 और अकुशल मजदूरों की मजदूरी दर 157 रुपए तक ही पहुंची। यही नहीं, राजमिस्त्री की मजदूरी दर कृषि मजदूरों की अपेक्षा भी बहुत ज्यादा बढ़ी है।

राजमिस्त्रियों की आय क्यों बढ़ रही, या क्यों बढ़ी। बात अगर इस पर करेंगे तो इसमें सरकारी योजनाओं की भूमिका सबसे ज्यादा है। दूसरा कारण ये भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पक्के मकान तेजी से बनाये जा रहे हैं। जैसे-जैसे कच्चे मकानों की संख्या घट रही है, वैसे-वैसे पक्के मकान भी बनते जा रहे हैं। बढ़ती आबादी के कारण भी ज्यादा मकान बन रहे हैं। ऐसे में राजमिस्त्री की आय तो बढ़नी ही है। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत 2022 तक पूरे देश में 4 करोड़ आवास बनने हैं। इनमें से 1 करोड़ पक्के माकन देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बनेंगे।

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जून 2017 में भारत सरकार द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने 2016-17 में देशभर में 32 लाख पक्के मकानों का निर्माण कराया। जबकि मार्च 2015 में ये आंकड़ा 18 लाख घरों का था। ये सभी आवास प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत बनाए गये थे। इस योजना का नाम पहले इंदिरा आवास योजना था।

वहीं अब केंद्र सरकार ने 2017-18 के भीतर 51 लाख घरों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस योजना के तहत 2019 तक 1 करोड़ घरों का लक्ष्य रखा गया है। सरकार ने अब घरों के निर्माण की अवधि को 18-36 महीनों से घटाकर 6-12 महीनों तक लाने का निर्णय लिया है। संशोधित योजना के तहत करीब 7 महीने में लगभग 10000 घरों का निर्माण किया गया है।

उत्तर प्रदेश, भदोही में बिहार सिवान के रहने वाले राजमिस्त्री कृष्ण कुमार (40) बताते हैं "मैं पिछले 15 सालों से ये काम कर रहा हूं। इधर कुछ सालों में काम बहुत ज्यादा बढ़ गया है। परदेश में कमाने वाले लोग गांव में घर तो बनवा ही रहे हैं, सरकार की ओर से बनने वाले आवासों का काम भी हमें मिलता है। काम ज्यादा होने के कारण हम अब एक दिन की मजदूरी 300 रुपए तक लेते हैं।"

इतनी तेजी से घर बनेंगे तो उससे जुड़े लोगों की आय तो बढ़ेगी ही। प्रधानमंत्री आवास योजना इंदिरा गांधी आवास योजना का बदला हुआ रूप है। इंदिरा गांधी आवास योजना की शुरुआत 1985 में तत्तकालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने की थी। इस योजना के तहत ग्रामीण भारत में 1985 से 2014 तक 2.5 करोड़ आवास बनाए गये। बढ़ती आबादी के साथ-साथ बढ़ते मकानों की संख्या भी प्रमुख वजह रही राजमिस्त्रियों की आय बढ़ाने में। इसमें 2005 से 2009 के बीच सबसे ज्यादा आवास बनाए गये। इसी बीच राजमिस्त्री की मजदूरी दर में तेजी आई जो अभी तक बनी हुई है।

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लखनऊ के बख्शी तालाब ब्लॉक के गाँव अयोध्यापुरी के राजमिस्त्री सुरेंद्र कुमार (26) कहते हैं "अब हमें शहर नहीं जाना पड़ता। यहीं बहुत काम है। प्रधानमंत्री आवासीय योजना के आवासों का काम हमारे पास हैं। मैं इस समय एक दिन का 300 रुपए ले रहा हूं। जबकि कुछ साल पहले ये दाम 200 रुपए तक था।"

1998-99 से 2006-7 तक राजमिस्त्री की मजदूरी देश में 0.15 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी। जो 2006-7 से 2014-15 के बीच 4.2 फीसदी तक पहुंच गई। बात अगर राज्यों की करेंगे तो इस समय केरल में राजमिस्त्री की मजदूरी सबसे ज्यादा है। वहां इस समय मजदूरी दर 428.34 रुपए है। जबकि सबसे कम 182.58 रुपए मेघालय में है। जबकि मेघालय में ग्रोथ रेट सबसे ज्यादा रहा। यहां मजदूरी दर 2014-15 में 8.4 फीसदी तक बढ़ी।

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