किसान का दर्द : "आमदनी छोड़िए, लागत निकालना मुश्किल"

किसान का दर्द : आमदनी छोड़िए, लागत निकालना मुश्किलकिसानों की आमदनी तो छोड़िए अपनी फसल का लागत तक निकालना मुश्किल हो रहा

विशेष सीरीज भाग-2 : लागत और महंगाई को देखते हुए किसानों जो उपज का जो भाव मिल रहा है वो काफी कम है। उनकी मांग है सरकार खेती को मुनाफे का सौदा बनाने के लिए हर वस्तु का एमएसपी तय हो और लाभकारी नीतियां बनें।

लखनऊ। फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर बहस जारी है। सरकार का कहना है कि जो एमएसपी घोषित किया गया है वो लागत का डेढ़ गुना है लेकिन किसान चाहते हैं घोषित एमएसपी में उनकी जमीन का किराया आदि भी शामिल हो। साथ ही कानून बनाया जाए, ताकि कोई भी फसल एमएसपी से नीचे खरीदी ही न जा सके। क्योंकि कुछ किसानों को एमएसपी का लाभ मिलता है बाकी को बाजार में उससे काफी नीचे बेचने पर मजबूर होते हैं।

एनएसएसओ के 2012-13 के सर्वे के अनुसार किसानों की औसत मासिक आमदनी पंजाब में 18059 रुपए, हरियाणा में 14434, बिहार में 3588 रुपए है। इस तरह अगर भारत की बात करें तो किसानों की औसत आमदनी 6426 रुपए है। हालांकि इसमें सिर्फ कृषि की आय लगभग इसकी आधी है। (अशोक गुलाटी और श्वेता सैनी का लेख)

न्यूनतम समर्थन मूल्य से मतलब उस रेट से है, जो सरकार किसी खाद्यान्न (गेहूं-धान आदि) के बदले किसी किसान को भुगतान की गारंटी देती है। सरकार ने गेहूं, धान गन्ना समेत कई चीजों का एमएसपी तय भी कर रखा है लेकिन वो किसान की लागत के बदले काफी कम है, जिसे लेकर पिछले कई वर्षों से किसान आंदोलनरत है। "किसानों की आमदनी तो छोड़िए अपनी फसल का लागत तक निकालना मुश्किल हो रहा है। कृषि उत्पाद की उपभोक्ता के स्तर पर कीमत और किसान के स्तर पर लागू कीमत में 50 से 300 प्रतिशत तक का अंतर होता है।" पिछले एक दशक से किसानों की आर्थिक स्थिति पर काम कर रहे किसान नेता निर्मल सिंह बरार बताते हैं।

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देश के जाने माने कृषि के जानकार देवेंदर शर्मा पिछले काफी समय से किसानों की आमदनी बढ़ाने के तरीकों निकालने पर जोर देते रहे हैं, उन्होंने इस पर अध्ययन भी किया है। किसान और खेती की मूल समस्या बताने पर वो बताते हैं, 1970 में गेहूं 76 रुपए कुंटल था और 2015 में करीब 1450 रुपए कुंटल, यानि सिर्फ 19 गुना जबकि इस दौरान सरकारी कर्मचारियों का मूल वेतन और डीए 120 गुना बढ़ा, प्रोफेसर रैंक में 150-170 गुना और कॉर्पोरेट सेक्टर में ये बढ़ोतरी 300-1000 गुना की था। अगर उस अनुमात में किसान की तुलना करें तो गेहूं कम से कम 7600 रुपए कुंटल होना चाहिए।

आर्थिक स्थिति के मामले में किसान कमजोर होता जा रहा।

देवेंदर शर्मा की बात को और आसानी से समझते हैं। अस्सी के दशक में गेहूं एक रुपए किलो, दूध एक रुपए लीटर और देसी घी करीब 5 रुपए लीटर था। उस वक्त चपरासी की तनख्वाह 80 रुपए और प्राइमरी के मास्टर का मूल वेतन 195 रुपए था। वक्त की सुई को तेजी से घुमाते हैं और 2017 में आते हैं। आज सरकारी चपरासी को कम से कम 20 हजार रुपए और प्राइमरी स्कूल के मास्टर को न्यूनतम 30 से 40 हजार रुपए मिलते हैं, जबकि ऊपर के ग्रेड में तनख्वाह और तेजी से बढ़ी हैं। जबकि गेहूं का सरकारी मूल्य 16 रुपए 25 पैसे ही है। 37 साल में सरकारी नौकर की सैलरी में कम से 150 गुना बढ़ोतरी हुई जबकि गेहूं की कीमत 16 गुना ही बढ़ी। जबकि इस दौरान 1 रुपए वाला डीजल 58 रुपए लीटऱ हो गया है। और 2-3 रुपए वाली मजदूरी 200 रुपए प्रतिदिन हो गई है। यानि किसान का खर्च तो तेजी से बढ़ा लेकिन बाकी लोगों के अऩुपात में उसे उपज की सही कीमत नहीं मिली।

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लखनऊ में अकडरिया गांव के मूल निवासी कौशल किशोर (68 वर्ष) एक दशक पहले पलायन कर लखनऊ के मड़ियांव (शहर) आ गए। अब वो किसान नहीं हैं, शहर में उनके 2 दो बेटे प्राइवेट नौकरी करते हैं, और खेतों को बटाई पर दे रखा है। वजह पूछने पर कौशल किशोर बताते हैं, " किसान जो खेतों में उगाता है वो सब माटी मोल जाता है और जो खरीदता है वो इतना महंगा हो गया है किसान को लोन लेना पड़ता है, फिर कोई फसल ज्यादा हो गई तो बेचने में लाले (मुश्किल) पड़ जाते हैं। बच्चों के शादी-ब्याह करने के लिए खेत बेचने पड़ते हैं। फिर किसान खेती क्यों करेगा ?" कौशल किशोर का दर्द भारत के लाखों किसानों का है। यही शहरों की बढ़ती आबादी, किसानों की आत्महत्या और गांवों से कम होते किसानों की वजह है।

वक्त की सुई को तेजी से घुमाते हैं और 2017 में आते हैं। आज सरकारी चपरासी को कम से कम 20 हजार रुपए और प्राइमरी स्कूल के मास्टर को न्यूनतम 30 से 40 हजार रुपए मिलते हैं, जबकि ऊपर के ग्रेड में तनख्वाह और तेजी से बढ़ी हैं। जबकि गेहूं का सरकारी मूल्य 16 रुपए 25 पैसे ही है। 37 साल में सरकारी नौकर की सैलरी में कम से 150 गुना बढ़ोतरी हुई जबकि गेहूं की कीमत 16 गुना ही बढ़ी। जबकि इस दौरान 1 रुपए वाला डीजल 58 रुपए लीटऱ हो गया है। और 2-3 रुपए वाली मजदूरी 200 रुपए प्रतिदिन हो गई है

गेहूं की कटाई करते किसान।

देश में खेती-किसानी के हालत पर साल 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार देश के 17 राज्यों में किसान परिवारों की औसत आय सालाना 20000 रुपए है जो देश के औसत आय के लगभग आधी है। स्टेट ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर (2015-16) की रिपोर्ट यह बताती है कि एक तरफ जहां देश में खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ रहा है वहीं दूसरी तरफ इसका फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में सीमांत आकार के जोतों की संख्या बढ़ रही है। यानि खेत सिकुड़ रहे हैं और किसान खेती के सहारे घर नहीं चला पा रहे। देश में 2001 में जोतों (खेतों) की संख्या 75.41 मिलियन थी जो अब बढ़कर 92.83 हो गई है।

देश में बढ़ती बेरोजगारी, शहर में बढ़ती भीड़, क्राइम ग्राफ और देश के हालातों को सरसरी तौर पर समझने के लिए कुछ और आंकड़ों की गवाही लेते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे रिपोर्ट के अनुसार देश के 9 करोड़ किसान परिवारों में लगभग छह करोड़ किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम खेती योग्य जमीन है। इस रिपोर्ट के अनुसार ऐसे परिवार की महीने की आमदनी मुश्किल से पांच हजार से लेकर छह रुपए होती है। इऩ सरकारी रिपोर्टर और किसानों के हालात को समझेंगे तो पाएंगे किसानों की आमदनी वर्षों से ठहरी हुई है। किसान नेता नौकरीपेशा लोगों से तुलना इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि सर्दी, गर्मी हो या ओले पड़े, नौकरी पेशा आदमी को सैलरी मिलना तय है जबकि सूखा, ओलावृष्टि और आंधी बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाएं किसानों को भारी नुकसान पहुंचाती हैं, जबकि इनके बदले मुश्किल से मिलने वाला मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरा जैसा होता है।

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आप इन दिनों प्याज भले 10 रुपए में खरीद रहे हों लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर में पिछले दिनों प्याज 50 पैसे किलो तक बिका, इसी तरह गर्मियों में महाराष्ट्र के नागपुर इलाके में बाग मालिकों को संतरा माटी बोल बहाना पड़ा। किसान हेल्प संगठन के राष्टीय अध्यक्ष और जैविक जागरुकता चलाने वाले डाॅ. आर के सिंह कहते हैं, प्याज की लागत कम से कम साढ़े चार रुपए आती है और किसान जब उसे 50 पैसे किलो में बेचेगा तो सड़क पर तो उतरेगा ही।'

प्रतिष्ठित ग्रामीण पत्रकार और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता पी. साईंनाथ ने कहते हैं, 'किसान की आमदनी का जरिया बहुत अनिश्चित है। उसकी आमदनी को आप किसी दूसरे पेशे से जोड़कर देखेंगे तो साफ हो जाएगा कि खेती में आमदनी बहुत कम है।

किसानों की आमदनी तो छोड़िए अपनी फसल का लागत तक निकालना मुश्किल हो रहा है। कृषि उत्पाद की उपभोक्ता के स्तर पर कीमत और किसान के स्तर पर लागू कीमत में 50 से 300 प्रतिशत तक का अंतर होता है।
निर्मल सिंह बरार, किसान नेता

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और साल 2011 में आई जनगणना की रिपोर्ट के अनुसार हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे है। कुछ साल पहले आई सरकार की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि अगर मौका मिले तो देश के 50 फीसदी किसान खेती छोड़ना चाहेंगे। अन्न का कटोरा कहे जाने वाले पंजाब में इसी वर्ष नई सरकार बनने के बाद 37 किसान मौत को गले लगा चुके हैं, खेती बंजर हो रही है। पंजाब से जुड़े किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बलविंदर सिंह बाजवा बताते हैं, " अभी हाल ही में मैंने आॅस्ट्रेलिया के किसानों की स्थिति पर अध्ययन करके लौटा हूं। वहां की सरकार ने अपने देश के किसानों की आर्थिक स्थिति को ठीक करने में ऐसी नीति बनाई कि आज वहां अधिकतऱ लोग कृषि में जाना चाहते हैं।''

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1970 में गेहूं 76 रुपए कुंटल था और 2015 में करीब 1450 रुपए कुंटल, यानि सिर्फ 19 फीसदी जबकि इस दौरान सरकारी कर्मचारियों का मूल वेतन और डीए 120 गुना बढ़ा, प्रोफेसर रैंक में 150-170 गुना और कॉर्पोरेट सेक्टर में ये बढ़ोतरी 300-1000 गुना की था। अगर उस अनुमात में किसान की तुलना करें तो गेहूं कम से कम 7600 रुपए कुंटल होना चाहिए।
देवेंदर शर्मा, कृषि निति विश्लेषक

किसान की लागत कैसे बढ़े इस बारे में बात करने पर गिरी अध्ययन विकास संस्थान, लखनऊ के एसोसिएट प्रोफेसर प्रशांत कुमार त्रिवेदी कहते हैं, "सरकारों को तीन काम करने होंगे। आसानी से लोन मिले, देश में छोटे और मंझोले किसान ज्यादा है तो उनसे संबंधित तकनीकों का विकास हो। ताकि वो कम लागत में ज्यादा उत्पादन करें। और तीसरा जो वो पैदा करें उसका हर हाल में समुचित मूल्य मिले, जिसका एक तरीका बिचौलियों को हटाना और हर वस्तु की एमएसपी तय करना हो सकता है।"

वो आगे बताते हैं, एमएसपी तय करने से ज्यादा जरुरी है किसानों को उसका लाभ मिले, अभी सरकारी खरीद केंद्रों की संख्या बहुत कम है, किसान 70-80 फीसदी गेहूं फुटकर आढ़तियों को बेचता है। आज भले गेहूं का मूल्य 1650 रुपए हो लेकिन गांवों में 1200-1400 में बिका है। पैसे वाले भंडारण करते हैं और फिर पांच-छह महीन में यही गेहूं 1800 में आसानी से बेचेंगे तो इन बिचौलियों को खत्म किए बिना किसान का भला नहीं हो सकता।

(आंकड़ें किसान विशेषज्ञों की बात के आधार पर लिए गए हैं। ये ख़बर मूलरुप से किसान आगबबूला सीरीज (6 जून 2017 ) को प्रकाशित की गई)

सरकारों को तीन काम करने होंगे। आसानी से लोन मिले, छोटे-मझोले किसानों के लिए तकनीकों का विकास हो, ताकि वो कम लागत ज्यादा उत्पादन करें। और तीसरा जो उपज हो उसका समुचित मूल्य मिले।
प्रशांत कुमार त्रिवेदी, एसोसिएट प्रोफेसर, गिरी अध्यक्ष विकास संस्थान, लखनऊ

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