इस कृषि वैज्ञानिक की पहल से देश हर साल बचा सकता है 100 करोड़

इस कृषि वैज्ञानिक की पहल से देश हर साल बचा सकता है 100 करोड़के.के. सुब्रमणि पादप आनुवंशिकी के जानकार हैं

क्या आप जानते हैं कि पपीते के बीज खरीदने के लिए हर साल भारत 100 करोड़ रुपये खर्च करता है? असल में, भारत को हर साल ताइवान की एक कंपनी से पपीते की एक खास वैरायटी आरएलडी के बीज खरीदने पड़ते हैं। अब भारत के एक कृषि वैज्ञानिक के. के. सुब्रमणि ने आरएलडी की एक संकर प्रजाति विकसित की है जिसके फल भी आरएलडी जैसे ही उन्नत किस्म के हैं। अगर यह देसी किस्म चलन में आई तो हर साल देश के 1 अरब रुपये बच सकते हैं।

कर्नाटक के मांड्या जिले में स्थित सुब्रमणि की कंपनी एग्रीमा बायोसाइंस ने इस संकर प्रजाति का विकास किया है। वह कहते हैं, पिछले 30 बरसों में हम 2 हजार किलो पपीते के बीजों का आयात करने में करोड़ों खर्च कर चुके हैं। आप अंदाजा लगाइए कि इस तरह देश को कितनी विदेशी मुद्रा का नुकसान हो रहा है।

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पपीता ऐसा फल है जो साल भर मिलता है। इसे सब्जी की तरह खाना चाहें तो कच्चा खाएं, पकने पर मीठा फल खाएं। इसके औषधीय गुण भी हैं, तमाम दवाओं में इसके बीज पड़ते हैं, बहुत से जानकार इसके पत्तों के ढेरों फायदे गिनाते हैं। पपीते में मिलने वाले एंजाइम पैपिन का इस्तेमाल दवाओं के अलावा मीट इंडस्ट्री, चुइंग गम, कॉस्मेटिक्स, सिल्क और ऊन उद्योग में होता है। भारत के अधिकतर किसान ताइवान की आरएलडी या रेड लेडी ड्वार्फ किस्म उगाते हैं। इसकी अच्छी गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ की वजह से इसे ताइवान 786 पपीता भी कहते हैं।

इसके पौधे आठ महीने में ही फल देने लगते हैं। एक पौधे से 60 किलो तक फल मिलते हैं। ये फल नाशपाती की आकृति वाले और पीले रंग के होते हैं। पेड़ से टूटने के 15 दिनों तक यह अच्छी हालत में रहते हैं। इस प्रजाति के एक किलो बीज के लिए भारतीय किसान 3 लाख रुपये तक देते हैं। भारत में पपीते की 12 प्रजातियां उगाई जाती हैं इनमें आरएलडी के अंतर्गत सबसे ज्यादा क्षेत्र आता है। यह देश में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, असम, केरल, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में उगाया जाता है। इसका सर्वाधिक निर्यात खाड़ी देशों को होता है।

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पपीते के बीज हर साल क्यों चाहिए यह समझने के लिए पपीते के बारे में जानकारी होना जरूरी है। पपीता ऐसा अनोखा पौधा है जिसमें नर और मादा दोनों तरह के पेड़ होते हैं। पेड़ नर है या मादा यह तब पता चलता है जब वह 4.5 महीने का हो गया हो। पपीते के बीजों में बहुत कम अंकुरण होता है साथ ही यह अपनी उर्वरता भी जल्द ही खो देते हैं। इसमें बहुत आसानी से वायरस जनित बीमारियां हो जाती हैं और अभी तक पपीते की कोई ऐसी मूल प्रजाति नहीं है जिसमें वायरस या विषाणुओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता हो। रोगमुक्त पपीते का विकास करना भी सुब्रमणि की रिसर्च का एक मकसद था।

सुब्रमणि पादप आनुवंशिकी के जानकार हैं अपनी इसी विशेषज्ञता का उपयोग करके उन्होंने पपीते में लगने वाली सदियों पुरानी बीमारी रिंगस्पॉट और मोसेक वायरस के प्रति इस नई प्रजाति में प्रतिरोधक क्षमता का विकास किया।

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आएलडी की संकर प्रजाति विकसित करने के लिए पिछले सात बर्षों में सुब्रमणि ने हवाई द्वीप, जापान, साउथ अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देशों की यात्रा की। उन्होंने यहां से पपीते की स्थानीय प्रजातियों के बीज इकट्ठे किए। इस प्रकार सुब्रमणि ने जो किस्म विकसित की है वह न केवल रोगों से मुक्त है बल्कि उसमें ज्यादा मिठास है व उसके फल ज्यादा सुंदर और ठोस है।

अपनी रिसर्च के शुरूआती दिनों में सुब्रमणि ने देश के अलग-अलग क्षेत्र के किसानों को बीजों के सैंपल बांटे थे। वह कहते हैं, जब हमें भरोसा हो गया कि हमारे द्वारा विकसित किस्म अच्छी गुणवत्ता वाली है तभी हमने उसे बाजार में उतारा।

इस समय सुब्रमणि की कंपनी एग्रीमा बायोसाइंस 100 किलो बीजों का उत्पादन करती है। इन बीजों को या तो बीज बेचने वाली कंपनियों को बेच दिया जाता है या फिर उनका निर्यात कर दिया जाता है। पपीते की यह उन्न्त प्रजाति झारखंड के आदिवासियों के बीच काफी मशहूर भी हो रही है।

भारत में 1991-92 से 2001-02 के बीच पपीते की खेती के क्षेत्र में 63 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यह 45.2 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 73.7 हजार हेक्टेयर हो गई है। पूरी दुनिया में हर साल 60 लाख टन पपीते का उत्पादन होता है जिसका आधा यानि लगभग 30 लाख टन अकेले भारत में ही होता है।

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