गाँव कनेक्शन कब पांच साल का हो गया पता ही नहीं चला: शरत प्रधान

गाँव कनेक्शन कब पांच साल का हो गया पता ही नहीं चला: शरत प्रधानशरत प्रधान

वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक शरत प्रधान गाँव कनेक्शन के पहले अंक के साथ ही जुड़े हुए हैं, गाँव कनेक्शन के पांच साल पूरे होने पर बधाई देते हुए कहते हैं।” वक़्त गुज़रते मालूम नहीं पड़ता, अंग्रेजी की कहावत है, 'टाइम फ्लाइज' और गाँव कनेक्शन के साथ ये बात बिल्कुल दिगर बैठती है, सच में कब पांच साल गुजर गए, पता ही नहीं चला।”

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लगता है अभी कल की ही बात थी, जब कुम्हरावां गाँव में बड़ी धूमधाम के साथ गाँव कनेक्शन साप्ताहिक का उद्घाटन किया गया था। केवल उस छोटे से गाँव के लिए ही नहीं, ये एक अनोखी पहल थी प्रदेश के लिए। इससे पहले कहने को तो बहुत ग्रामीण अखबार निकलते थे, पर शायद ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं था जिसकी रगों में गाँव बसता था। और उससे बड़ी बात थी कि इस अखबार का जन्म वहीं हो रहा था जहां बैठकर कुछ लोगों के दिमाग में इसका बीज उगा था।

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उस उपज के सूत्रधारों में हम भी थे, जब नीलेश ने पहली बार इसका जिक्र किया तो मेरे दिमाग में बहुत से संदेश आए। हमारा मानना था कि ये इस किस्म के अखबार दो ही तरीकों से चलते हैं, "या तो सरकार की भीख से, या सरकार की ब्लैकमेलिंग करके" और ये स्पष्ट है कि ये दोनों तरीके अपनाने में नीलेश की कोई दिलचस्पी नहीं थी। एक सच्चे प्रोफेसनल पत्रकार होने के नाते, नीलेश का मक़सद था कि अखबार केवल प्रोफेसनस्लिज्म के बूते पर ही छाया है। जब मनीष अमर उजाला जैसे विशाल अखबार को छोड़कर गाँव कनेक्शन में आए तब मुझे भी लगता था कि शायद उनमें आगे चलकर पछतावा होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि गाँव कनेक्शन एक सक्सेस स्टोरी बन गई।

और हर्ष की है कि जैसा संकल्प लिया था वैसे ही किया, ये शायद अकेला उदाहरण है जहां अखबार के कर्ता-धर्ता अपनी बॉलीवुड की कमाई को अपना संकल्प में लगाकर उसे पूरा होने का सपना देख रहा था।

नीलेश ने जो मार्केटिंग के तरीके अपनाए वो भी कुछ नायाब ही थे, ऐसे-ऐसे लिंकेज बनाए जो कि बिना किसी प्रकार के कम्प्रोमाइज किए अखबार के खर्चों को निकालने के लिए कामयाब साबित हुए। नीलेश ने अपनी व्यक्तिगत प्रतिभाओं को सही इस्तेमाल कर के अखबार को बढ़ावा दिया। लेकिन अखबार का कैरेक्टर नहीं बदला, अपने नाम पर अमल करना उसका मुख्य लक्ष्य बना रहा। इसीलिए आज यदि कोई अखबार पूरी तरह से ग्रामीण मामलों पर पूरी तरह से फोकस्ड है तो उसका नाम है गाँव कनेक्शन। जी हां सही मायने में गाँव का अखबार।

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उस समय मुझे लगता था कि डेली चलाना आसान काम नहीं है, पर नीलेश का कान्फिडेंस और मनीष की लगन ने उसे एक खूबसूरत अंजाम दे ही डाला। यामिनी की मार्केटिंग स्ट्रेजीज और संपादक महोदय डॉ. एसीबी मिश्रा साहिब का फूल-टाइम गाइडेंस का जवाब नहीं। लेकिन इन सबके साथ, जो सबसे ज्यादा सरहानीय है वो उस जवान टीम का योगदान, जिसके बगैर ये सफर पूरा नहीं हो सकता था।

नीलेश ने जिस तरह से एक यंग टीम को बढ़ावा दिया वो सिर्फ एक हिम्मत का काम था, उससे ज्यादा वो उनका आत्मविश्वास भी दर्शाता है।

लगभग चार दशकों में पत्रकारिता करने के तर्जुबे से में ये बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि जिस तरह की स्टोरीज गाँव कनेक्शन के कुछ रिपोर्टर ने कर दिखाए, वो कई बड़े-बड़े अखबारों के लिए मिसाल हैं। मैं बड़े हर्ष के साथ यह कहना चाहूंगा कि कई बार मुझे गाँव कनेक्शन की कुछ स्टोरीज से बड़े-बड़े आइडियाज प्राप्त हुए हैं और कोई शर्म नहीं है ये एक्सेप्ट करने में कि मैं जीसी की स्टोरीज भी की हैं।

निकालने को तो बहुत से अखबार निकालते हैं और बंद हो जाते हैं। कैसे निकाले जाते हैं और उनमें कैसे खबरें की जाती हैं, इससे भी लोग वाकिफ हैं। लेकिन जिस तरह से पांच वर्षों में गाँव कनेक्शन ने अपनी एक अलग छाप बनाई, उसका कोई सानी है। पांच साल पूरे होने वर हमारी ओर से गाँव कनेक्शन के समस्त परिवार को बहुत-बहुत बधाई और भरपूर शुभकामनाएं की समय के साथ ये दिन दोगुना रात चौगुना तरक्की करे। हमें विश्वास है कि ये अगले पांच साल पूरे होने पर यही दोहराए कि पांच साल और गुजर गए, मालूम नहीं पड़ा।

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