वैज्ञानिकों ने बनाया सस्ता एंटीवेनम, घरों में भी रख सकेंगे ग्रामीण

आईआईटी, दिल्ली और अमेरिका की सैन होजे यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने विकसित किया नया एंटीवेनम। अगले दो साल में आ सकता है बाजार में।

वैज्ञानिकों ने बनाया सस्ता एंटीवेनम, घरों में भी रख सकेंगे ग्रामीण

भारत में सरकारी आंकड़े कहते हैं कि देश में हर साल लगभग एक हजार लोगों की मौत सांप के काटने से होती है। हालांकि असलियत में यह तादाद 50 हजार के आसपास है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद सर्पदंश के इलाज में दो बड़ी बाधाएं हैं, एंटीवेनम की कीमत और उसे स्टोर करने में आ रही समस्या। लेकिन भारत और अमेरिका के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा नया एंटीवेनम विकसित कर लिया है जिससे इन दोनों समस्याओं का समाधान हो जाएगा। नया एंटीवेनम सस्ता होने के साथ-साथ घरों में स्टोर भी किया जा सकेगा।

इसके अलावा इस नए एंटीवेनम का इस्तेमाल सांप की कई प्रजातियों के मामलों में किया जा सकेगा। मौजूदा एंटीवेनम का इस्तेमाल केवल रसल्स वाइपर, सॉ-स्केल्ड वाइपर, किंग कोबरा और करैत सांप के काटने पर ही किया जा सकता है।

रसल्स वाइपर दिन में सक्रिय होते हैं और घास में छिपकर बैठते हैं।

आईआईटी दिल्ली के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अनुराग एस. राठौर ने मोंगाबे इंडिया को बताया, "इस समय एंटीवेनम या विषरोधी टीका बनाने के लिए सांप के जहर को घोड़े में इंजेक्ट किया जाता है, इसके बाद इस घोड़े का ब्लड सीरम इस्तेमाल में लाया जाता है। लेकिन पहली समस्या यह है कि सीरम बहुत स्थायी नहीं है, दूसरी बात यह कि इसे केवल उसी सांप के जहर के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है जिसका जहर घोड़े के शरीर में इंजेक्ट किया गया हो। वहीं हमारा नया एंटीवेनम सांपों की कई प्रजातियों के जहर के खिलाफ कारगर साबित होगा।" यह नया एंटीवेनम लीथल टॉक्सिन न्यूट्रलाइजिंग फैक्टर (एलटीएनएफ) आधारित है। फिलहाल यह परीक्षण के स्तर पर है। इसे प्रोफेसर राठौर की अगुआई में आईआईटी, दिल्ली और अमेरिका की सैन होजे यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने डेवेलप किया है।

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राठौर के मुताबिक, इसे विकसित करने में दो साल का समय लगा जो कि दवाओं के व्यापार में बहुत ज्यादा समय नहीं है। इसे महज 70 लाख रुपयों के छोटे से बजट में पूरा किया गया है। उम्मीद है कि इस नए एंटीवेनम की कीमत प्रति खुराक 100 रुपए के आसपास होगी, जबकि वर्तमान में उपलब्ध एंटीवेनम की एक डोज कई हजारों की बैठती है। ग्रामीण इसका खर्चा नहीं उठा पाते।

करैत रात में निकलते हैं और जमीन पर लेटे लोग इनका शिकार बनते हैं।

"हमारा पेप्टाइड आधारित एंटीवेनम ज्यादा स्थाई है और पाउडर के रूप में उपलब्ध होगा। इसे घरों में रखा जा सकेगा, जरूरत के समय इसे केवल पानी में घोलकर प्रभावित व्यक्ति के शरीर में इंजेक्शन से लगाना होगा। यही वजह है कि इसे ग्रामीण अपने घरों में भी रख सकेंगे। फिलहाल यह परीक्षण के स्तर पर है। दो-एक महीने में चूहों पर परीक्षण पूरे होने वाले हैं। अगर नतीजे अच्छे रहे तो यह अगले एक या दो साल में बाजार में आ सकता है।" राठौर ने बताया।

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राठौर का कहना था, "अगर यह कामयाब रहा तो सांप काटने के मौजूदा इलाज के तरीके को पूरी तरह से बदल कर रख देगा। अभी जो एंटीवेनम उपलब्ध है वह बिना विशेष सुविधाओं के नहीं रखा जा सकता। लेकिन भारत में सर्पदंश के अधिकतर मामले गांव-देहात, छोटे कस्बे या जंगलों में होते हैं। वहां से पीड़ित व्यक्ति को मेडिकल सेंटर या अस्पताल लाते-लाते महत्वपूर्ण समय बर्बाद हो जाता है क्योंकि इसमें कई घंटे लग जाते हैं।"

सॉ स्केल्ड वाइपर भी दिन में ही सक्रिय होते हैं।

ग्रामीण इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं

दुनिया भर में सांपों की लगभग 2 हजार प्रजातियां हैं इनमें से 300 भारत में पाई जाती हैं, इनमें से भी 52 को जहरीला पाया गया है। भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, यह एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या है जिसे रोका जा सकता है। भारी वर्षा और आर्द्र जलवायु वाले उष्ण और उपोष्णकटिबंधीय देशों के ग्रामीण इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

उदाहरण के लिए, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, करैत सांप केवल रात में ही सक्रिय होते हैं और जमीन पर सो रहे लोगों को काट बैठते हैं, जबकि अधिकतर वाइपर और कोबरा दिन में या शाम के समय काटते हैं जब लोग खेतों में काम कर रहे होते हैं या नंगे पैरों घास में चल रहे होते हैं।

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भारत में सर्पदंश और उससे होने वाली मौतों के आंकड़ों में बड़ा अंतर

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, हर साल दुनिया भर में 81 हजार से 1,38000 लोग सर्पदंश से अपनी जान गंवाते हैं। करीब चार लाख लोग सांप के जहर की वजह से हमेशा के लिए विकलांग हो जाते हैं। अकेले भारत में, डब्ल्यूएचओ के हिसाब से हर साल 46,900 लोग सांप के काटने से मारे जाते हैं। यह दुनिया में सर्पदंश से होने वाली मौतों का लगभग 50 प्रतिशत है।

लेकिन सरकारी आंकड़ों से तुलना करें तो बड़ा फर्क पाते हैं, मार्च 2016 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने संसद में जानकारी दी थी कि 2013 से 2015 तक तीन बरसों के दौरान 3,252 लोग सांप के काटने से मारे गए। खुद स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने अपने एक मसौदे में माना है कि सर्पदंश से हुई मौतों के आधिकारिक आंकड़ों और देश में हुए सीधे सर्वे से जुटाए गए आंकड़ों में बहुत ज्यादा अंतर है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बनाया कार्यदल

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक कार्यदल बनाया है ताकि दुनिया भर में, खासकर औसत से निम्न आयवर्ग के देशों में सर्पदंश की समस्या से निबटने के लिए रणनीति तैयार की जा सके। उम्मीद है कि 2018 के अंत तक यह रणनीति तैयार हो जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि अभी भी बहुत से देशों में सांप के काटने का प्रभावी उपचार नहीं है। और जहां है भी वह इतना महंगा है कि उसकी कीमत इलाज में बाधा बनती है।

(यह लेख मूल रूप से Mongabay में प्रकाशित हो चुका है।)

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