देश

देश में फिर बड़े किसान आंदोलन की आहट, 184 किसान संगठन मिलकर 20 को भरेंगे हुंकार

देश में किसानों पर केंद्रित राजनीति करवट ले रही है। कई राज्यों में किसान सड़क पर उतर चुके हैं, तो कई जगह आंदोलनों की सुगबुगाहट है। राज्यसभा टीवी के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह किसानों नेताओं के एकजुट होने किसानों की समस्याओं को आने वाले दिनों में एक बड़े आंदोलन के रुप में देख रहे हैं, पढ़िए कुछ खास

1989 के दिनों में जिस तरह से भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने देश के तमाम किसान संगठनों को जोड़ कर एक ऐतिहासिक शक्ति बनायी थी, उसी से मिलती जुलती तस्वीर फिर से नजर आने लगी है। कुछ खास मुद्दों पर किसान संगठनों के बीच में व्यापक समझदारी बढ़ती दिख रही है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर 184 किसान संगठनों को समाहित होकर बनी अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के साथ भारतीय किसान यूनियन, कर्णाटक रैय्यत संघ और शेतकरी संघटना के समूहों के साथ कुछ औऱ संगठन शामिल हो जायें तो फिर एक नयी ताकत बन जाएगी।

किसान संगठऩ आपस में जिस तरह से तैयारियों में लगे हैं, उससे इस बात को साफ तौर पर देखा जा सकता है कि आने वाले समय में बड़ा किसान आंदोलन आरंभ हो सकता है। छुटपुट कई राज्यों में इसकी झलक दिख भी चुकी है और मध्य प्रदेश में किसान आक्रोश का राजनीतिक असर भी दिखने लगा है।

यह भी पढ़ें: किसान आंदोलन नेताओं के बहकावे पर नहीं होते

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने 20 नवम्बर को दिल्ली में संसद भवन के सामने ऋण मुक्ति और स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने के मसले पर बड़ा आयोजन करने का फैसला किया है। इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों को एक ड्राफ्ट बिल भेज कर उनसे समर्थन मांगने का भी फैसला किया गया है।

समिति के संयोजक वीएम सिंह का कहना है कि खेती की लागत बढ़ रही है, जबकि एमएसपी उनको मदद नहीं कर पा रहा है। ऐसे में कुछ सवालों पर सरकार को तत्काल किसानों के हित में कदम उठाने की जरूरत है। समिति में 184 किसान संगठन शामिल हैं जिन्होंने 6 जुलाई को मंदसौर से एक यात्रा निकाली जो 18 राज्यों में 10 हजार किमी का सफर तय कर चुकी है। इसकी 500 से अधिक सभाओं में पचास लाख से अधिक किसान शामिल हुए हैं। इस बीच में महाराष्ट्र से सांसद और किसान नेता राजू शेट्टी एनडीए से स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट न लागू करने के मुद्दे पर अलग हो चुके हैं।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति पत्रकारों के बीच अपनी बात रखते हुए।

यह भी पढ़ें: भारत में किसानों की बदहाल तस्वीर दिखाते हैं हाल ही में हुए ये किसान आंदोलन

समन्वय समिति में शामिल स्वराज इंडिया ने 13 नवंबर को केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह के आवास का घेराव किया और उनको वायदों की याद दिलायी। प्रधानमंत्री के द्वारा लोक सभा चुनावों के दौरान स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने के वायदों के बारे में एलईडी स्क्रीन पर वीडियो संदेश चलाकर व्यापक प्रचार किया जा रहा है और बताया जा रहा है कि चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 120 से अधिक चुनावी रैलियों में इसकी घोषणा भी की थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद इससे मुकर गए। और कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने लोकसभा में इस वादे को ही नकार दिया। हालांकि कृषि मंत्रालय का नाम बदलकर "कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय" रखा गया लेकिन इससे किसानों की तस्वीर नहीं बदली न ही आत्महत्याओं में कमी आयी।

मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन अपना असर दिखा चुका है। फोटो- प्रभात सिंह

यह भी पढ़ें: चकबंदी का चक्रव्यूह: भारत में 63 साल बाद भी नहीं पूरी हुई चकबंदी

स्वराज इंडिया के संयोजक योगेंद्र यादव का कहना है कि 20 नवंबर को देश के तमाम हिस्सों से विशाल संख्या में किसान संसद मार्ग पहुँचकर किसान मुक्ति संसद का आयोजन करेंगे। कर्ज़ मुक्ति और फ़सल के पूरे दाम ही उनका मुख्य मुद्दा रहेगा और अगर सरकार अपना वादा पूरा नहीं करती है तो किसान खुद अपनी संसद बनाकर किसान मुक्ति बिल पारित करेंगे। हम यह लड़ाई सरकार से लेकर सड़क और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ने को तैयार हैं।

वहीं दूसरी तरफ देश के अग्रणी किसान संगठन भारतीय किसान यूनियन की ओर से अलग से एक बड़े किसान आंदोलन की तैयारी चल रही है। 7 नवंबर 2017 को इस बाबत दिल्ली में हुई बैठक में किसान नेताओं ने भावी कदमों को लेकर गंभीर मंत्रणा की। भारतीय किसान यूनियन ने सरकार से मांग की है कि किसानों की समस्याओ के निदान को संसद का विशेष सत्र बुलाया जाये और कृषि क्षेत्र के लिए कैबिनेट कमेटी के गठन के साथ एक मुश्त किसानों को कर्जमुक्ति दिलायी जाये। किसान नेताओं ने 13 मार्च 2018 को दिल्ली में विशाल किसान महापंचायत का ऐलान भी किया है।

यह भी पढ़ें: किसान मुक्ति यात्रा और एक फोटोग्राफर की डायरी (भाग-2)

किसान यूनियन के नेता डॉ. युद्धवीर सिंह का कहना है कि वे पिछले साढ़े तीन सालों से किसानों के मसलों को लेकर प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांग रहे है लेकिन उनको समय नहीं दिया गया है जिससे किसानो के प्रति केंद्रीय सत्ता की संवेदनशीलता को समझा जा सकता है। इसी नाते भाकियू ने गुजरात के चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा का विरोध करने का फैसला भी लिया है। भाकियू दूसरे संगठनो के साथ मिल कर भी भविष्य की राजनीति तय कर रहा है।

भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ. राकेश टिकैत का कहना है कि सरकार की ओऱ से किए जा रहे तमाम दावों और कदमों के बाद भी खेती-बाड़ी की दशा चिंताजनक है और 80 के दशक के बाद से कृषि संकट और बढ़ता जा रहा है। किसान एक तरफ कर्ज के दलदल में फंस गया है दूसरी ओर खेती की लागत बढ़ती जा रही है। उनको न वाजिब दाम मिल रहा है न ही एमएसपी पर खरीद की गारंटी। इस समय उड़द का एमएसपी 5700 रुपए है लेकिन किसान 2700 रुपए कुंतल से भी कम पर बेचने को मजबूर है।

लगातार मुखर हो रही है किसानों की मांग।

एक दौर में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के काफी करीबी रहे, पंजाब भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष अजमेर सिंह लखोवाल का कहना है कि राज्य सरकारों की बेरूखी के नाते तमाम जगहों पर किसान आंदोलन भड़क रहे हैं। वहां मसले का हल निकालने की जगह राज्य सरकारें किसानों का उत्पीड़न कर रही हैं। इस नाते भारत सरकार को जमीनी हकीकत को देखते हुए कुछ खास बिंदुओं पर तत्काल ध्यान देना चाहिए।

किसानों की प्रमुख मांगे

  • फसलों का उचित और लाभकारी मूल्य
  • सभी फसलों को एमएसपी के दायरे में लाकर खरीद तय करना
  • किसानों को कर्ज मुक्त बनाना
  • कृषि क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक और ब्याजरहित ऋण
  • कृषि संकट के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों को राहत पैकेज
  • जीएम फसलों पर रोक लगाना
  • गन्ना किसानों का भुगतान सुनिश्चित करना
  • विश्व व्यापार संगठन में किसानों के हितों को बचाए रखना

यह भी पढ़ें: किसान आंदोलन : अगर लागू हो जाएं ये सिफारिशें तो हर किसान होगा पैसे वाला

किसान नेताओं का दावा है कि जीएसटी का कृषि क्षेत्र पर भी बुरा असर पड़ा है। बुग्गी के टायर पर भी 18 फीसदी जीएसटी है और इसे तय करते समय किसानों को नजरंदाज किया गया है। आज कृषि बाजारों पर बिचौलिया हावी हैं। इस नाते भारत सरकार को चाहिए कि कृषि से जुड़े 18 मंत्रालयों के बीच बेहतर तालमेल बना कर 25 सालों के लिए एक ठोस राष्ट्रीय कृषि नीति बनायी जाये। और समय रहते भारत सरकार हस्तक्षेप करे।

अजमेर सिंह लाखोवाल का कहना है कि जब पंजाब जैसे संपन्न प्रांत में किसान तबाह है तो बाकी राज्यों की दशा को समझा जा सकता है। कृषि लागत निकालते समय हमारी जमीन का किराया 13 हजार प्रति हेक्टेयर आंका जाता है, जबकि पंजाब में रेट 40 हजार रुपए है। हम पर बिजली का भारी बिल थोपा जाता है, जबकि हकीकत यह है कि हम बिजली नहीं खंभे का बिल दे रहे हैं। उपभोक्ताओं के बीच किसानो को विलेन बनाने की कोशिश हो रही है, जबकि जांच इस बात की होनी चाहिए कि जो आलू किसान तीन रुपए में बेच रहा है वह उपभोक्ता तक 20 रुपए में क्यों पहुंच रहा है। बिचौलिया तंत्र हावी होता जा रहा है। किसान को थोड़ा ज्यादा दाम मिले और उपभोक्ता को थोड़ा सस्ता यह राह कठिन नहीं है।

किसान संगठनों की ओर से उठ रहे सवाल नाहक नहीं हैं। नेशनल सैंपल सर्वे की 70वीं रिपोर्ट बताती है कि पशुपालन समेत किसान परिवार की औसत मासिक आय 3844 रुपए है। इसमें परिवार का भरण पोषण कैसे संभव है। इसी नाते कर्ज बढ़ रहा है और किसान खेती छोड़ रहे हैं। किसानों की अधिकतर उपज लागत से कम पर बिक रही है। इस नाते जरूरी है कि किसानों की न्यूनतम आमदनी तय हो और किसान आय आयोग का गठन किया जाये। इसी तरह फसल बीमा में किसान को इकाई मानते हुए जंगली जानवरों, आग और पाले के कारण हुई फसलों की क्षति भी फसल बीमा में कवर हो।

मध्यप्रदेश के मंदसौर की ये तस्वीर अलग कहानी कहती है। फोटो प्रभात सिंह

यह भी पढ़ें: क्या किसान आक्रोश की गूंज 2019 लोकसभा चुनाव में सुनाई देगी ?

कृषि को विश्व व्यापार संगठन के दायरे से बाहर करने का मसला भी तेजी से उठ रहा है। आज कृषि आयातों को नियंत्रित करने की जरूरत है। भारत में आयात बढ़ रहा है जबकि निर्यात घट रहा है। भारी सब्सिडी से तैयार आस्ट्रलिया का गेहूं, न्यूजीलैंड का डेयरी उत्पाद और कनाडा का खाद्य तेलों और दालें अगर आयातित होकर हमारे बाजारों पर छाएंगी तो हमारे किसानों की आजीविका प्रभावित होगी। ये तीनों देश इन फसलों के मुख्य निर्यातक हैं।

विभिन्न किसान संगठनों की ओर से इन सवालों का उठना यह साबित करता है कि अब किसान संगठनों का नजरिया बदल चुका है और वे स्थानीय मसलों के बजाय किसानों के व्यापक हितों से जुड़े मसलों पर ही खुद को केंद्रित करना चाहते हैं। इन सवालों को लेकर भले ही किसान संगठन अभी अलग जुबान बोल रहे हों लेकिन इनमें पैदा हो रही एकता बड़े किसान आंदोलन की आहट है।