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मीडिया की गिरती साख का खामियाजा भुगत रहे फील्‍ड रिपोर्टर

Ranvijay SinghRanvijay Singh   27 Dec 2019 12:14 PM GMT

मीडिया की गिरती साख का खामियाजा भुगत रहे फील्‍ड रिपोर्टर

एक रिपोर्टर को फोन पर मैसेज आता है कि उपद्रवियों ने आगजनी कर दी है। वो मौके पर पहुंचता है तो देखता है पुलिस चौकी जल रही है, पास ही एक बाइक में भी आग लगी है। वो अपना फोन निकालता है और इसका वीडियो बनाने लगता है। इसी बीच चार उपद्रवी आ जाते हैं। यह कहते हुए कि 'मीडिया वाला है, ये मोदी की मीडिया है, हमारी बातें नहीं दिखाती', उपद्रवी रिपोर्टर पर टूट पड़ते हैं। उसके सिर पर लोहे की रॉड और ईंट से बार-बार वार किया जाता है। यह रिपोर्टर किसी तरह अपनी जान बचाकर भाग पाता है।

यह घटना 20 दिसंबर को यूपी के मेरठ में घटी। जिस रिपोर्टर को मारा गया उसका नाम खुर्शीद अहमद है जो 'ईटीवी भारत' के लिए काम करता है। यह कोई पहली घटना नहीं है जब किसी रिपोर्टर के साथ अभद्रता या मारपीट हुई हो। इससे पहले भी इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं, लेकिन हाल के दिनों में मीडिया कर्मियों और खास तौर से फील्‍ड रिपोर्ट्स के साथ इस तरह की घटनाए होना आम हो चला है। कहीं रिपोर्ट्स को घेरकर 'गो बैक' के नारे लगाए जाते हैं तो कहीं बात हाथापाई तक आ जाती है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों (2014-19) में भारत में पत्रकारों पर 200 से अधिक गंभीर हमले हुए हैं। 'Getting Away with Murder' नामक इस रिपोर्ट के अनुसार, इन पांच वर्षों के बीच 40 पत्रकारों की हत्याएं हुईं। इनमें से 21 हत्‍याओं में यह पुष्टि हुई है कि यह हत्‍याएं पत्रकारिता की वजह से हुईं। इस बढ़ते ट्रेंड को समझने के लिए गांव कनेक्शन ने कुछ वरिष्‍ठ पत्रकार, विभ‍िन्‍न मीड‍िया संस्‍थानों से जुड़े फील्‍ड रिपोर्ट्स और संपादकों से बात की है। पढ़‍िए इन घटनाओं पर उनका क्‍या नजरिया है।

स्‍टूडियो की बातों की वजह से सॉफ्ट टारगेट बन रहे रिपोर्टर: राजदीप सरदेसाई

ऐसी घटनाओं पर वरिष्‍ठ पत्रकार और इंडिया टुडे ग्रुप के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई कहते हैं, ''ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है, जब भी हिंसा होती है रिपोर्टर्स को टारगेट किया जाता है। भीड़ आजकल इसलिए भी मीडिया पर टूटती है कि उसे लगता है कि मीडिया एकतरफा बयान देती है। रिपोर्टर भले ही कुछ भी कहे, लेकिन जो स्‍टूडियो में कहा जाता है, खासकर टीवी पर जो कहा जाता है उसकी वजह से रिपोर्टर सॉफ्ट टारगेट बन गया है। भीड़ को यह भी लगता है कि पत्रकारों पर हमला होगा तो पब्‍लिसिटी ज्‍यादा मिलेगी, ऐसे में वो अपना गुस्‍सा यहां निकाल रहे हैं।''

लखनऊ में भड़की हिंसा में मीडिया की ओबी वैन जला दी गई थी। फोटो- अभ‍िषेक वर्मा

मीडिया के राष्‍ट्रवादी होने से बढ़ी दिक्‍कतें: अजित अंजुम

वरिष्ठ पत्रकार अजित अंजुम पत्रकारों पर हो रहे हमलों के दूसरे पहलू को भी बताते हैं। उनका कहना है कि हाल के दिनों में मीडिया निष्‍पक्ष की जगह एकतरफा काम कर रहा है और इस बात का खामियाजा फील्‍ड के रिपोर्टर भुगत रहे हैं। वे कहते हैं, ''मैं मानता हूं कि रिपोर्टर्स पर हमला नहीं होना चाहिए। क्‍योंकि रिपोर्टर अपनी ड्यूटी कर रहा है, चैनल ने जो उसे जिम्‍मेदारी दी है वो उसे निभा रहा है। अगर किसी का चैनल को लेकर गुस्‍सा है तो वो रिपोर्टर पर नहीं फूटना चाहिए। यह चिंता की बात है।

''लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है, वो यह है कि जिस तरीके से हाल के दिनों में मीडिया तथाकथित राष्‍ट्रवादी हुआ है। जेल से लौटकर आया हुआ आदमी जो घोषित तौर पर ब्‍लैकमेलिंग कर रहा था, जो कतई पत्रकारिता के पक्ष के हिसाब से गैरवाजिब, गलत और अनैतिक था। वो आदमी आज की तारीख में सबसे बड़ा राष्‍ट्रवादी है और वो आदमी बाकी जो भी लोग सरकार से असहमत होते हैं उन्‍हें टुकड़े-टुकड़े गैंग घोषित कर देता है या उसके खिलाफ मुहिम चलाता है। तो अगर एकतरफा मीडिया होगी, जहां आप विरोध और असंतोष की आवाज को अचानक टुकड़े-टुकड़े गैंग कह दोगे तो इसका भी आक्रोश लोगों में होगा। क्‍योंकि लोगों को लगता होगा कि उनकी बात नहीं सुनी जाती है।''

अजित अंजुम आगे कहते हैं, ''जैसे- यह सच है कि पुलिस पर पथराव और आगजनी हुई। हमने सीलमपुर से लेकर कानपुर और लखनऊ तक की हिंसक तस्‍वीरें देखी हैं, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है जो मुजफ्फरनगर, बिजनौर और कानपुर से पुलिस की हिंसा की तस्‍वीरें और वीडियो आ रहे हैं, लेकिन यह चीजें राष्‍ट्रवादी मीडिया नहीं दिखाती। उसका सारा फोकस इस पर है कि असामाजिक तत्‍वों ने कहां पत्‍थरबाजी की, वो पुलिस की हिंसा नहीं दिखाते। तो यह जो मीडिया का भरोसा लोगों में टूटा है तो कई बार यह आक्रोश देखने को मिलता है। लेकिन यह सही नहीं है कि आक्रोश रिपोर्टर पर निकले, अगर ऐसा कोई करता है तो उसे कानून के हिसाब से सजा मिलनी चाहिए।''

बात करें विश्‍व में पत्रकारों की हत्‍या की तो Committee to Protect Journalists के आंकड़ों के मुताबिक, विश्‍व में 1992 से लेकर 2019 तक 1363 पत्रकार और मीडियाकर्मी की हत्‍या हुई है। साल 2019 की बात करें तो विश्‍व में 50 की संख्‍या में पत्रकार और मीडियाकर्मी की हत्‍याएं हुई हैं। वहीं, भारत में यह आंकड़ा एक पत्रकार का है। यह पत्रकार तेलुगु भाषा के क्षेत्रीय दैनिक 'आंध्र ज्योति' के स्थानीय रिपोर्टर कथा सत्यनारायण थे, जिनकी हत्‍या 15 अक्टूबर, 2019 को हुई थी। उनपर हमला तब हुआ जब वो आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में स्‍थ‍ित अपने घर जा रहे थे।

हाल के द‍िनों में पत्रकारों के साथ अभद्रता और मारपीट की घटनाएं बढ़ी हैं। फोटो- अभि‍षेक वर्मा

विचारधार के आधार पर बंटा है मीडिया, नुकसान फील्‍ड रिपोर्टर्स का: नूपुर शर्मा

एक ओर जहां अंजित अंजुम हाल के कुछ वर्षों में मीडिया के राष्‍ट्रवादी विचारधार के वाहक होने की बात कह रहे हैं तो वहीं 'ऑप इंडिया' की एडिटर नूपुर शर्मा का मानना है कि मीडिया में पहले से विचारधारा के आधार पर विभाजन था, जो अब ऊपरी तौर पर दिखने लगा है और इसका सीधा असर फिल्ड में काम कर रहे रिपोर्टर पर हो रहा है। नूपुर शर्मा कहती हैं, ''फील्‍ड में जो स्‍ट्र‍िंगर होते हैं वो मीडिया की रीढ़ की हड्डी हैं। वो आपको न्‍यूज लाकर दे रहा है। मेरे हिसाब से 95 फीसदी स्‍ट्र‍िंगर अपना काम बहुत ईमानदारी से करते हैं। असली पत्रकार वही होते हैं। उनकी दी गई जानकारी को तोड़ना मोरोड़ना एंकर का काम है। अगर एक स्‍ट्र‍िंगर खुद को रिस्‍क पर रखकर एक असल स्‍टोरी भेजता है और वो टीवी पर जाकर कुछ और ही बन जाती है तो इसका उस स्‍ट्र‍िंगर के मोराल पर गलत प्रभाव पड़ता होगा। लेकिन यह स्‍टोरी इसलिए बदल जी जाती है क्‍योंकि जो एंकर है वो सेक्युलर छवि रखने वाला है और उसे यह नहीं दिखाना कि मुस्‍लिम मॉब ने दंगा किया है। आज उस स्‍ट्र‍िंगर ने अपना काम सही से किया है लेकिन उसकी स्‍टोरी कचरा बना दी गई, क्‍योंकि वो स्‍टोरी एंकर को पसंद नहीं, उसकी विचारधार के मुताबिक नहीं।''

''दूसरी बात यह है कि हम खुद से ईमानदार रहे तो हमें यह मानना होगा कि मीडिया में पहले से राजनीतिक विभाजन था। लेकिन अब शायद सोशल मीडिया के बढ़ते चलन और लोगों की बढ़ती जानकारी की वजह से इस पर ज्‍यादा बात होने लगी है। इसके साथ ही विचारधार का विभाजन तो है ही। आज के वक्‍त में मैं यह विश्‍वास ही नहीं कर सकती कि कोई भी एंकर, कोई भी मीडिया हाउस, कोई भी वेबसाइट 100 प्रतिशत निष्‍पक्ष है, मैं यह नहीं मान सकती ।कोई लेफ्ट में है या कोई राइट में । अब एक खास तौर के प्रदर्शन में सिर्फ राइट की तरफ के लोगों को ही निशाना बनाया जाता है तो इसी से पता चल जाता है कि प्रदर्शन लेफ्ट की ओर से आयोजित किया गया है। अगर लेफ्ट विंग पत्रकार पर हमला हो रहा है तो उसी से पता चल जाता है कि प्रदर्शन को शक्‍त‍ि राइट विंग से मिल रही है।'' - नूपुर शर्मा

नूपुर आगे कहती हैं, ''आज रवीश कुमार की क्रेडिबिल्‍टी मेरे लिए नेगेटिव में है, क्‍योंकि मैं उनकी दर्शक नहीं हूं। लेकिन जो लेफ्ट‍िस्‍ट लोग उन्‍हें देखते हैं उनके लिए उनकी क्रेडिबिल्‍टी 100 प्रतिशत है, चाहे वो झूठ भी बोलें। अर्णव गोस्वामी की क्रेडिबिल्‍टी उनके दर्शकों के लिए 100 प्रतिशत होगी, लेकिन लेफ्ट के लोगों के लिए वो नेगेटिव में है। दुर्भाग्‍य से राजनीतिक और विचारधारा के हिसाब से बंटवारा है। जर्नलिस्‍ट की क्रेडिबिल्‍टी उसके ऑडियंस तय करेंगे। अगर जामिया में सिर्फ जी न्‍यूज और रिपब्‍लिक टीवी को चुनौती मिल रही है तो यह बहुत हद तक यह बताता है कि कौन इस प्रदर्शन को शक्‍त‍ि प्रदान कर रहा है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा लूजर वो स्‍ट्र‍िंगर है जो ग्राउंड पर स्‍टोरी कर रहा है।''


रिपोर्टर पर हमले चैनल को नुकसान पहुंचाने की नियत से हो रहे: निवेदिता शांडिल्‍य

वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम और ऑप इंडिया की एडिटर की बातों से यह बात तो साफ होती है कि मीडिया दो धड़ों में बंट चुका है। ऐसे में इस बंटवारे का सीधा असर फील्‍ड में काम कर रहे रिपोर्टर पर देखने को मिलता है। ऐसी ही घटना हाल में जेएनयू के प्रदर्शनों में भी हुई थी। वहां कई रिपोर्टर्स के साथ अभद्रता की गई। जेएनयू के प्रदर्शन को कवर करने वाली एबीपी न्‍यूज की रिपोर्टर निवेदिता शांडिल्‍य बताती हैं, ''मेरा सबसे बुरा अनुभव जेएनयू में रहा था। मैं जब वहां पहुंची तो यह हल्‍ला हो गया कि जी न्‍यूज वाली आ गई। इसके बाद अचानक से मेरी तरफ बच्‍चे बढ़ने लगे, लेकिन जेएनयू के बहुत से बच्‍चे मुझे पहचानते हैं तो उन्‍होंने दूसरों को डांट कर भगाया। लेकिन मैंने देखा कि वो लोग 'आज तक' की एक लड़की पर काफी अटैकिंग पोज में थे और एक और चैनल की रिपोर्टर के कंधे पर हाथ रखा था और 'गो बैक-गो बैक' के नारे लगा रहे थे। वो कैमरे को भी धक्‍का दे रहे थे। मैंने उस दिन कह दिया था कि मैं आज शूट नहीं कर रही हूं।''

निवेदिता इस तरह घटनाओं के पीछे की वजह बताते हुए कहती हैं, ''होता यह है कि चैनल की ओर से ग्राउंड पर हम लोग ही प्रतिनिधि होते हैं। इन्‍हें लगता है हमें नुकसान पहुंचाएंगे तो चैनल को नुकसान पहुंचा पाएंगे, लेकिन यह सही नहीं है। साथ ही यह ट्रेंड भी बनता जा रहा है कि अगर प्रदर्शन को लाइम लाइट नहीं मिल रही तो मीडिया के लोगों के साथ अभद्रता कर दीजिए वो प्रदर्शन लाइम लाइट में आ जाएगा। यह ट्रेंड गलत है।''

मीडिया पर घट रहा विश्‍वास: नीलेश मिसरा

फील्‍ड रिपोर्टर्स के साथ हो रही अभद्रता और मारपीट की घटनाओं पर चिंता जाहिर करते हुए गांव कनेक्‍शन के फाउंडर नीलेश मिसरा कहते हैं, ''पहले हिंसा ग्रस्‍त क्षेत्रों में रूल ऑफ इंगेजमेंट तय होते थे। अगर आप पत्रकार हैं तो आपको न सुरक्षाबलों की ओर से हानी पहुंचाई जाएगी न ही प्रदर्शनकारियों की ओर से हानी पहुंचाई जाएगी। कहीं न कहीं आप सेफ थे। आप ड्यूटी पर हैं इस बात की इज्‍जत रखी जाती थी। लेकिन पिछले कई सालों में वो लक्ष्‍मण रेखा जो स्‍थापित थी वो एकदम खत्‍म हो गई है। इस वक्‍त आपको पुलिस भी पीट सकती है, अगर आप ड्यूटी कर रहे हैं तो आपका कैमरा भी तोड़ा जा सकता है। हमारे वक्‍त में इसकी कल्‍पना भी नहीं की जा सकती थी। तब तो कैमरा निकाल दिया तो एक अदृश्‍य लक्ष्‍मण रेखा बन जाती थी।''

मीडिया पर लगातार बढ़ रहे हमले बताते हैं कि लोगों विश्‍वास कम हुआ है। फोटो- अभ‍िषेक वर्मा

''इस वक्‍त चाहे हिंसक भीड़ हो या पुलिस हो, जिसका मन आए वो पत्रकारों को किसी एक एजेंडा का वाहक बताकर टारगेट कर सकता है। यह दो चीजों को दिखाता है। पहला मीडिया पर विश्‍वास का घटना। क्‍योंकि औसत जो मीडियाकर्मी है वो किसी न किसी एजेंडे को बढ़ा रहा है। दूसरी बात है कि भीड़ का कॉन्‍फिडेंट होना, वही मॉब जो कभी भी मॉब लिंचिंग कर सकती है, वहीं अब किसी को भी टारगेट कर सकती है। एक बात है कि इस पर मीडिया संस्‍थानों को भी सोचना चाहिए कि जब पत्रकार ऐसी कोई रिपोर्ट‍िंग करने जाए तो उनकी सुरक्षा का ध्‍यान रखा जाए।'' नीलेश मिसरा कहते हैं।

नीलेश मिसरा जिस लक्ष्‍मण रेखा के टूटने की बात कर रहे हैं, वैसा ही कुछ हाल ही के नागरकिता संशोधन कानून (सीएए) के प्रदर्शनों में भी देखने को मिला है। जहां एक ओर पत्रकारों को भीड़ ने तो मार ही है, लेकिन सुरक्षाबलों की ओर से भी उन्‍हें परेशान करने की कोश‍िश की गई। खासकर उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में इन प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहे कई पत्रकारों को हिरासत में लिया गया। इन पत्रकारों में 'द हिंदू' अखबार के रिपोर्टर ओमार राशिद भी शामिल हैं, जिन्हें लखनऊ में हिरासत में लिया गया था और करीब दो घंटे की पूछताछ के बाद छोड़ा गया।

पत्रकारों पर हमले की ऐसी घटनाओं की एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी निंदा की। गिल्‍ड ने 23 दिसंबर को जारी बयान में कहा, 'एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया देश के विभिन्न हिस्सों में, खासकर कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में मीडियाकर्मियों के खिलाफ पुलिस द्वारा की गई हिंसा और बर्बरता के विभिन्न कृत्यों की निंदा करता है।'


'गिल्ड देशभर के पुलिस बलों को यह याद दिलाता है कि प्रदर्शन स्थलों पर विभिन्न परिसरों में मौजूद पत्रकार सूचना एकत्र करने और अपने मीडिया मंचों के जरिए लोगों तक उन्हें पहुंचाने का अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं। ऐसे करने का अध‍िकार उन्‍हें संविधान से मिला है। अपना काम कर रहे पत्रकारों के खिलाफ बल प्रयोग या हिंसा लोकतंत्र की आवाज और मीडिया की स्वतंत्रता का गला घोंटती है।'

पत्रकारों पर हमले की एक वजह यह भी है कि हाल के दिनों में मीडिया पर लोगों का विश्‍वास घटा है। इस बात को कई फील्‍ड रिपोर्टर महसूस भी कर रहे हैं। 'द वायर' के रिपोर्टर अविचल दुबे बताते हैं, ''लोगों के बीच में मीडिया के प्रति अविश्‍वास घर कर गया है। पहले जहां लोगों को स्‍टोरी पब्‍लिश होने का इंतजार होता था, वहीं अब वो स्‍टोरी पब्‍लिश होने से पहले उसे देखने की मांग करते हैं, ताकि कुछ गलत न जाए।''

अविचल बताते हैं, ''हाल के दिनों में मैं वेस्‍टर्न यूपी में हुई हिंसा को कवर कर रहा था। यहां मीडिया के प्रति अविश्‍वास को साफ देखा जा सकता है। ज्‍यादातर लोग यह कह रहे हैं जब आप अपनी रिपोर्ट लिख लें या आपका वीडियो तैयार हो जाए तो पहले हमें भेज दीजिए, जब हम ओके करेंगे तब आप चलाइएगा। ये कितना बड़ा फिल्टर है। पहले हम अपनी स्‍टोरी एडिटर को ही दिखाते थे, अब जनता आपसे कह रही है कि हम देखेंगे तब आप स्‍टोरी चलाइएगा। यह विश्‍वास दिखाता है कि विश्‍वास खत्‍म हो रहा है।''

हाल के द‍िनों में मीडि‍या को बेइज्‍जत करने का चलन भी बढ़ है। फोटो- रणव‍ि‍जय स‍िंह

''दूसरी बात यह है कि यह दौर मीडिया की बेइज्‍जती करने का है। यह बेइज्‍जती रिपोर्टर की नहीं की जा रही, बल्‍कि मीडिया संस्‍थानों की हो रही है और इस बेइज्‍जती पर यह भी नहीं कह सकते कि कोई खास कौम है जो बेइज्‍जती कर रही है। क्‍योंकि ऐसा भी हो सकता है कि पिछले कुछ वर्षों से आप उनके खिलाफ खबरें चला रहे हों तो वो ऐसा कर रहे हैं। क्‍योंकि एकदम से तो कोई मीडिया के खिलाफ तो हो नहीं जाएगा। धीमे-धीमे चीजें बिल्‍ड हुई हैं और अब जो मीडिया भुगत रहा है वो उसका कर्मा है।'' अविचल दुबे रिपोर्टर द वायर।

वहीं स्‍क्रॉल के एडिटर नरेश फर्नांडिस इस तरह की घटनाओं पर कहते हैं, ''हिंसा जैसे हालातों में हमेशा पत्रकारों पर हमले होते आए हैं। मुझे लगता है भीड़ कैसे रिएक्‍ट करेगी इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। अगर भीड़ में हमलावर शामिल हैं तो वह यह नहीं चाहेगा कि वहां पत्रकार हो। लेकिन इसका एक और पहलू है, वो यह कि 1992 में मुंबई दंगों के वक्‍त हमारे ऑफिस में फोन आते थे और वो कहते थे 'भीड़ आ रही है और हम उसे देख पा रहे हैं, पुलिस कुछ नहीं करेगी, आप लोग कुछ कीजिए।' तो यह दोनो पक्ष हैं कभी पत्रकार से नफरत की जाती है तो कभी उसे चाहा भी जाता है।''


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