डेयरी कारोबार से जुड़े 60 प्रतिशत लोगों ने कहा- दूध के कम दाम मिले, 56 फीसदी को सप्लाई में हुई दिक्कत: गांव कनेक्शन सर्वे

पूरे देश में लॉकडाउन के चलते लोगों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, गाँव कनेक्शन ने देश के 23 राज्यों के 179 जिलों में सर्वे कर जाना की लोगों पर लॉकडाउन ने असर डाला, सीरीज के इस भाग पढ़िए में डेयरी व्यवसाय से जुड़े लोगों को किन परेशानियों का सामना करना पड़ा।

Divendra SinghDivendra Singh   19 Aug 2020 8:22 AM GMT

बिहार के कैमूर जिले के अभिषेक सिंह के पास 7 पशु थे लेकिन अब 3 बचे हैं। 4 पशु उन्हें बेचने पड़े। "लॉकडाउन तो दूध की बिक्री, मिठाई के दुकानदारों के लिए था, गाय-भैंस तो उतना ही दूध दे रही थीं, लेकिन बिक्री काफी कम हो गई थी। हमारा दूध ज्यादातर मिठाई की दुकानों पर जाता था जो महीनों तक बंद रहीं। दूध बिक नहीं रहा था तो पशुओं का चारा कहां से खिलाते।" अभिषेक सिंह बताते हैं।

ये सिर्फ अभिषेक अकेले की परेशानी नहीं है, 22 मार्च को जनता कर्फ्यू से ही दूध की सप्लाई प्रभावित होने लगी थी। दुनिया में सबसे ज्यादा दूध उत्पादन करने वाले देश में लॉकडाउन ने डेयरी कारोबारियों और पशुपालकों को करोड़ों रुपए का नुकसान पहुंचाया। लॉकडाउन में दूध की मांग तो कम हुई ही पशुओं को खिलाने वाले भूसे से लेकर चूनी-चोकर के दाम भी काफी बढ़ गए, इसी कारण कई पशुपालकों को अपने पशु बेचने पड़े तो कई घाटे में चले गए।

बिहार के कैमूर से लगभग 984 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के सबसे बड़े पशु पालक मनीष भारती के पास 80 गाय हैं, जिनसे हर दिन 300 से 350 लीटर दूध का उत्पादन होता है। उन्हें लॉकडाउन में दूध बेचने में बहुत परेशानी उठानी पड़ी।

मनीष भारती गांव कनेक्शन को बताते हैं, "लॉकडाउन में जो घाटा लगा अभी तक हम उससे पूरी तरह से उबर नहीं पाए हैं। हर दिन इतना ज्यादा दूध का उत्पादन होता था, अचानक से सब कुछ बंद हो गया। हम कुछ दूध पराग (कॉपरेटिव) जैसी डेयरियों को भी देते हैं, लॉकडाउन में तो उन्होंने भी दाम कम कर दिया था, क्योंकि उनके पास भी खपत कम थी।" दूध की खपत कम होने से सरकारी समितियों ने पशुपालकों से खरीदे जाने वाले दूध का दाम भी घटा दिए।


कोविड-19 लॉकडाउन का दौरान ग्रामीण इलाकों में जनजीवन और कारोबार पर कैसा प्रभाव पड़ा और कैसे लोगों इस मुश्किल वक्त में अपनी आजीविका चलाते रहे, इसे समझने के लिए गांव कनेक्शन ने देशव्यापी सर्वे कराया। 30 मई से लेकर 16 जुलाई तक 20 राज्यों और 3 केंद्र शासित राज्यों के 179 जिलों में 25371 ग्रामीण लोगों के बीच कराए गए सर्वे में पशुपालक, किसानों और डेयरी वालों ने अपनी परेशानियों के बारे में बताया।

गाँव कनेक्शन सर्वे में डेयरी व्यवसाय से जुड़े 56 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें बाजार तक दूध पहुंचाने में परेशानी हुई, जबकि 42 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कोई परेशानी नहीं हुई और तीन प्रतिशत लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया। वहीं 53 प्रतिशत लोगों के अनुसार उन्हें ग्राहक मिलने में परेशानी हुई, जबकि 40 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई और आठ प्रतिशत लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।

लॉकडाउन में बाजार बंद होने से मिठाई की दुकानें, होटल, रेस्टोरेंट जैसी वो सारी जगहों पर तालेबंदी हो गई, जहां दूध या दूध से बने उत्पादों की खपत होती थी। लॉकडाउन के दूसरे और तीसरे हफ्ते से दूध की सप्लाई पटरी पर आने लगी थी मगर लेकिन खोया, पनीर, दही, छांछ, मिठाई जैसे उत्पादों पर बिक्री न के बराबर हुई।


उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में मालवा का मोहन पेड़ा दूर-दूर तक मशहूर हैं, कोरोना के पहले तक यहां पर हर दिन 250 से 300 लीटर दूध की खपत हो जाती थी, त्योहार के समय तो 500-600 लीटर तक लग जाता था। लेकिन इस समय मुश्किल से 30-40 लीटर की खपत होती है। मोहन पेड़ा के मालिक नरेश गुप्ता बताते हैं, "हमारे आसपास के छोटी-बड़ी डेयरियों से दूध आता है, दर्जनों लोगों के घर खर्च ही इसी से चलता है। लेकिन लॉकडाउन में हमारा तो नुकसान हुआ ही पशुपालकों का भी काफी नुकसान हुआ। दूध और दूध से बनी मिठाइयों को तो ज्यादा दिनों तक भी नहीं सकते।"

शहरों से करोड़ों लोगों के गांवों लौटने का असर भी दूध कारोबार पर पड़ा है। अनलॉक वन के बाद बाजार तो खुल गए लेकिन कोरोना के डर से लोग आज भी बाजार की चीजें कम खा रहे, जिसका अभी असर डेयरी सेक्टर पर पड़ा है।

नरेश गुप्ता आगे कहते हैं, "अभी जैसे कई त्योहार आने वाले हैं, पहले तो हम कई दिन पहले से तैयारियां करने लगते थे, लेकिन इस बार बहुत कम पेड़ा बना रहे हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद भी अभी लोग पेड़े कम ही खरीद रहे हैं।"

यूपी में मेरठ के दूध कारोबारी मनीष आगे कहते हैं, "अनलॉक के बाद भी बहुत ज्यादा हालत नहीं सही हुई है, चार महीने से हम वहीं परेशानी झेल रहे हैं,अभी भी हमें परेशानी उठानी पड़ रही है।"

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में दीपक खटवानी भी पिछले तीस साल से भी ज्यादा समय से दूध का व्यवसाय करते आ रहे हैं, लेकिन इतनी परेशानी कभी नहीं उठानी पड़ी। दीपक बताते हैं, "लॉकडाउन में मार्केट बंद रहने से हमारे सामने परेशानी तो आयी, क्योंकि हमारा दूध होटलों में ही जाता है। दूध ऐसी चीज तो होती नहीं कि इसे रखकर बाद में बेचे। लॉकडाउन में 15 रुपए लीटर तक दूध बेचना पड़ा है।"

गाँव कनेक्शन के सर्वे में डेयरी व्यवसाय जुड़े 60 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें सही दाम नहीं मिला और 33 प्रतिशत लोगों ने कहा की कोई परेशानी नहीं हुई, जबकि तीन प्रतिशत लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।

"दूध का उत्पादन हो रहा था, लेकिन सही से बिक्री नहीं हो पा रही थी, डेयरियों को हमने बहुत कम में दूध बेचा है, "मध्य प्रदेश के देवास जिले के किसान सोहन सिंह पटेल कहते हैं।

आत्मनिर्भर भारत योजना लॉचिंग की प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि लॉकडाउन के दौरान, दूध की मांग 20-25 प्रतिशत कम हो गई। दूध किसानों की सुविधा के लिए सहकारी समितियों के जरिए 560 लाख लीटर की रोजाना खरीद की गई।


भारत पिछले 2 दशकों से दुग्ध उत्पादन में विश्व में पहले स्थान पर है। भारत, विश्व के 20 फीसदी दूध का अकेले उत्पादन करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से डेयरी से जुड़े किसान लगातार मुसीबतें झेल रहे हैं। अप्रैल महीने में गांव कनेक्शन ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक 14 राज्यों के सैकड़ों किसानों से बात की थी, उनके मुताबिक कई इलाकों में मांग घटने के बाद दूध बोतल बंद पानी से भी सस्ता बेचना पड़ा था।

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के करीमपुर में डेयरी चलाने वाले तरुन घोष कहते हैं, "लॉकडाउन में तो दूध का दाम बिल्कुल गिर गया था, मजबूरी में 25-30 रुपए लीटर दूध बेचना पड़ रहा था। यहां अभी भी बहुत अच्छी हालत नहीं है।"

भारत के दूध उत्पादन में लगभग 75% हिस्सेदारी लघु, सीमांत और भूमिहीन किसानों की है। लगभग 10 करोड़ डेयरी किसान हैं। 20वीं पशुगणना के अनुसार देश में दुधारू पशुओं (गाय-भैंस) की संख्या 12.53 करोड़ है।

लॉकडाउन के दूसरे-तीसरे दिन बाद से ही कर्नाटक समेत कई राज्यों से ऐसी ख़बरें आने लगीं कि किसान दूध सड़कों पर फेंक रहे हैं। तब किसानों ने कहा कि वे दूध बेचने जा ही नहीं पा रहे हैं, ऐसे में उसे बचाकर करेंगे ही क्या। वहीं कुछ पंजाब में कई जगह पर दूध के लंगर की ख़बरें आयीं। ऐसा नहीं है कि लॉकडाउन में ही दूध कीमतों में गिरावट आयी, साल 2018 की नेशनल डेयरी डवलपमेंट बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में सबसे कम दूध का रेट महाराष्ट्र में है। यहां पर लगातार किसान इसके लिए आंदोलन भी कर रहे हैं।

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अनुसार देश में दूध उत्पादन में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है, एनडीडीबी के अनुसार, साल 2018 में देश में 176.3 मिलियन टन दूध का उत्पादन हुआ था।

गाँव कनेक्शन सर्वे के अनुसार 35 प्रतिशत लोगों ने माना कि उन्हें दूध सही दाम नहीं मिला, जबकि 56 प्रतिशत लोगों के अनुसार उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई और आठ प्रतिशत लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।

लॉकडाउन के चलते पंजाब में दूध उत्पादन से जुड़े लोगों को काफी नुकसान उठाना पड़ा। प्रदेश में दुध उत्पादन का धंधा, कृषि क्षेत्र की कुल घरेलू पैदावार का एक तिहाई हिस्सा है। पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले करीब 34 लाख परिवारों में से कम से कम 60 फ़ीसदी परिवार इस धंधे से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं।


पंजाब प्रोग्रेसिव डेयरी फार्मर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष दलजीत सिंह कहते हैं, "पंजाब ही नहीं पूरे देश में पशुपालकों की एक जैसी स्थिति है, लॉकडाउन के बाद से अभी लोग इससे उबर नहीं पाए हैं। सरकार ने तमाम घोषणाएं की हैं, लेकिन पशुपालकों तक कितनी पहुंच पाती हैं।"

पंजाब के अमृतसर के सठियाला गाँव के रहने वाले बलजिंदर सिंह के पास 90 गाय हैं, जिनसे हर दिन 400 लीटर से ज्यादा दूध का उत्पादन होता है। वो आसपास के लोकल बाजार में दूध की सप्लाई करते हैं। बलजिंदर बताते हैं, " लॉकडाउन में तो 10-15 रुपए लीटर की कमी आ गई थी, जब तक लॉकडाउन लगा रहा बहुत परेशानी उठानी पड़ी। अभी भी हालत बहुत अच्छा नहीं है, एक बार जो नुकसान हो गया, जल्दी उससे नहीं उबर पाएंगे।"

एक तरफ लॉकडाउन से डेयरी किसानों द्वारा उत्पादित दूध का दाम गिर गया है, वहीं पर दूसरी ओर केंद्र सरकार ने 10 हजार मीट्रिक टन मिल्क पाउडर के आयात की अनुमति दे दी है। यही नहीं दूध पर 50 फीसदी सीमा शुल्क घटाकर 15 फीसदी कर दिया गया है। जबकि भारत में पहले से मिल्क पाउडर का स्टॉक है।

महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों के किसान इसका विरोध भी कर रहे हैं। महाराष्ट्र में किसान संगठन 'स्वाभिमान शेतकारी संगठन' दूध की कीमतों और मिल्क पाउडर आयात के विरोध में लगातार प्रदर्शन भी कर रहा है। संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी कहते हैं, "लॉकडाउन में डेयरी किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा और अब सरकार उनकी मदद करने के बजाए बाहर से मिल्क पाउडर मंगा रही है। हमारा संगठन लगातार इसके खिलाफ आंदोलन कर रहा है।'

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लॉकडाउन में पशु पालकों के सामने पशु आहार और चारे की समस्या भी आयी। पशु आहार की कमी से जूझ रहे हैं, जबकि 26 मार्च को गृह मंत्रालय ने पशु आहार के आवाजाही पर छूट दे दी थी, लेकिन फिर भी लोगों तक पशु आहार नहीं पहुंच रहा था, जहां मिल भी रहा था दोगुने-तिगुने दाम में मिल रहा था।

गाँव कनेक्शन के सर्वे में 29 प्रतिशत लोगों ने माना कि उन्हें चारा मिलने में परेशानी हुई, जबकि 64 प्रतिशत लोगों ने माना की उन्हें दिक्कत नहीं हुई(इनमें 31 प्रतिशत लोगों को चारा मिला था, लेकिन बहुत कम मात्रा में) और आठ प्रतिशत लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।

बिहार के अररिया जिले के बिशनपुर गाँव के पशु पालक नवीन कुमार कहते हैं, "हमें पशु चारा मिलने में बहुत परेशानी हुई, बड़ी मुश्किल से चारा मिल पाया था।" लॉकडाउन की वजह से गेहूं की हार्वेस्टिंग में देरी हुई, जिसकी वजह से पशुपालकों को भूसा नहीं मिल पाया।

यूपी-एमपी के कई जिलों में पशु आहार सप्लाई करने वाली एक प्राईवेट कंपनी के निदेशक यतींद्र यादव बताते हैं, "लॉकडाउन में पशु आहार का प्रोडक्शन पूरी तरह से घट गया था, क्योंकि मजदूर ही नहीं थे, उस समय जो माल बन भी रहा था, उससे भेजने में बहुत परेशानी आयी। ट्रांसपोर्ट की कमी और जिलों के बॉर्डर पर लगी पुलिस जाने ही नहीं दे रही थी। इस वजह से पहले से जिन दुकानदारों के पास आहार का स्टॉक था, उन्होंने दोगुने दाम में बेचा।"


उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू बसे गुर्जर समुदाय के लोग भी दूध का कारोबार करते हैं, लेकिन लॉकडाउन में उन्हें अलग ही परेशानी झेलनी पड़ी। उत्तराखंड के देहरादून में राजाजी नेशनल पार्क के पास कई मुस्लिम गुर्जर परिवार रहते हैं, जमात प्रकरण और उससे जुड़ी अफवाहों के बाद लोगों ने उनसे दूध ही खरीदना बंद कर दिया। पशुपालक लियाकत कहते हैं, "लॉकडाउन के पहले हम रोजान 60-70 लीटर दूध बेचते थे, लेकिन लॉकडाउन में तो लोगों ने हमसे दूध ही लेना बंद कर दिया था। लोग कहते कि हमसे दूध लेंगे तो उन्हें कोरोना हो जाएगा।"

सर्वेक्षण की पद्धति

भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने लॉकडाउन का ग्रामीण जीवन पर प्रभाव के लिए कराए गए इस राष्ट्रीय सर्वे को दिल्ली स्थित देश की प्रमुख शोध संस्था सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम के परामर्श से पूरे भारत में कराया गया।

देश के 20 राज्यों, 3 केंद्रीय शाषित राज्यों के 179 जिलों में 30 मई से लेकर 16 जुलाई 2020 के बीच 25371 लोगों के बीच ये सर्वे किया गया। जिन राज्यों में सर्वे किया गया उनमें राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, अरुणांचल प्रदेश, मनीपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, केरला, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और चंडीगढ़ शामिल थे, इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, लद्धाख, अंडमान एडं निकोबार द्वीप समूह में भी सर्वे किया गया।

इन सभी राज्यों में घर के मुख्य कमाने वाले का इंटरव्यू किया गया साथ उन लोगों का अलग से सर्वे किया गया जो लॉकाडउन के बाद शहरों से अपने गांवों को लौटे थे। जिनकी संख्या 963 थी। सर्वे का अनुमान 25000 था, जिसमें राज्यों के अनुपात में वहां इंटरव्यू निर्धारित किए गए थे। इसमें से 79.1 फीसदी पुरुष थे और और 20.1 फीसदी महिलाएं। सर्वे में शामिल 53.7 फीसदी लोग 26 से 45 साल के बीच के थे। इनमें से 33.1 फीसदी लोग या तो निरक्षर थे या फिर प्राइमरी से नीचे पढ़े हुए सिर्फ 15 फीसदी लोग स्नातक थे।

सर्वे में शामिल 43.00 लोग गरीब, 24.9 फीसदी लोवर क्लास और 25. फीसदी लोग मध्यम आय वर्ग के थे। ये पूरा सर्वे गांव कनेक्शन के सर्वेयर द्वारा गांव में जाकर फेस टू फेस एप के जरिए मोबाइल पर डाटा लिया गया। इस दौरान कोविड गाइडलाइंस (मास्क, उचित दूरी, हैंड सैनेटाइजर) आदि का पूरा ध्यान रखा गया।

सीएसडीएस, नई दिल्ली के प्रोफेसर संजय कुमार ने कहा, "सर्वे की विविधता, व्यापकता और इसके सैंपल साइज के आधार पर मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि यह अपनी तरह का पहला व्यापक सर्वे है, जो ग्रामीण भारत पर लॉकडाउन से पड़े प्रभाव पर फोकस करता है। लॉकडाउन के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और अन्य सरकारी नियमों का पालन करते हुए यह सर्वे गांव कनेक्शन के द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें उत्तरदाताओं का फेस टू फेस इंटरव्यू करते हुए डाटा इकट्ठा किए गए।"

"पूरे सर्वे में जहां, उत्तरदाता शत प्रतिशत यानी की 25000 हैं, वहां प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और 95 प्रतिशत जगहों पर संभावित त्रुटि की संभावना सिर्फ +/- 1 प्रतिशत है। हालांकि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उनके जनसंख्या के अनुसार एक निश्चित और समान आनुपातिक मात्रा में सैंपल नहीं लिए गए हैं, इसलिए कई लॉजिस्टिक और कोविड संबंधी कुछ मुद्दों में गैर प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और वहां पर हम संभावित त्रुटि की गणना करने की स्थिति में नहीं हैं," संजय कुमार आगे कहते हैं।

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