सूखे और पिता से लड़कर एक किसान पूरे इलाके में ले आया 'तालाब क्रांति'

vineet bajpaivineet bajpai   31 Dec 2018 11:33 AM GMT

सूखे और पिता से लड़कर एक किसान पूरे इलाके में ले आया तालाब क्रांतिसिंचाई के लिए खुद की जमीन पर खोदा तालाब।

इंदौर (मध्य प्रदेश)। करीब 16 वर्ष पहले की बात है जब मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के साथ-साथ दूसरे कई राज्यों के किसान भी भीषण सूखे की चपेट में थे। धरती पानी के लिए तरह रही थी तो किसान मायूसी में घिरते जा रहे थे। जमीन के अंदर का पानी भी सूखने लगा था, लेकिन कुछ किसान ऐसे थे जिन्होंने इस सूखे में लड़ने की ठान ली थी। ये तब कि बात है जब फार्म पाउंड यानी खेत तालाब चलन में नहीं थे, ऐसे ही इंदौर के एक किसान दिलीप सिंह तोमर (55 वर्ष) ने अपनी जमीन में एक तालाब बनाया था, और फसल पैदाकर किसानों को नई राह दिखाई थी।

55 साल के इस किसान की कहानी इसलिए जरुरी हो जाती है, क्योंकि लंदन के इंपीरियल कॉलेज के शोधकर्ताओं की एक स्टडी के अनुसार उस वक्त यानि वर्ष 2000 में भारत में करीब 1 करोड़ 30 लाख लोग सू्खे से प्रभावित हुए थे।

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दिल्ली से करीब एक हज़ार किलोमीटर दूर मध्यप्रदेश के इंदौर के मोरोट हाट गाँव के रहने वाले दिलीप सिंह उस दौर को याद करते हैं तो काफी गंभीर हो जाते हैं। एक लंबी सांस लेने के बाद वो बताते हैं, ''1990 के दशक में वॉटर लेवल (जलस्तर) काफी नीचे चला गया था, क्योंकि बारिश कम होती थी, जिसकी वजह से ट्यूबवेल की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी और पेस्टीसाइड और राशायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल की वजह से जमीन की जल ग्रहण करने की क्षमता बहुत कम हो गई थी। उस समय सिर्फ बारिश के मौसम में ही फसल हो पाती थी।''

खेती करना बहुत कठिन हो गया था और दिलीप के परिवार को लोग भी नहीं चाहते थे कि वो सूखे खेतों में पसीना बहाए। लेकिन दिलीप नहीं माने। 50 एकड़ पुश्तैनी जमीन को रोजगार का जरिया बनाने के लिए उन्हों‍ने सबसे पहले पानी की कमी से लड़ाई लड़ने की ठानी तो घर वालों से ही रिश्ते बिगड़ गए। दिलीप खेत के एक हिस्से में तालाब खुदवाना चाहते थे और पिता इसके सख्त खिलाफ थे।

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दिलीप बताते हैं, तालाब बनाने के बारे में पिता जी (मान सिंह तोमर) को पता चला तो वो भड़क गए। बोले, पागल हो गए हो खेती की जमीन ताल खोदकर बर्बाद करोगे। घरवालों के साथ पड़ोस वालों को भी मेरा ये फैसला मूर्खतापूर्ण लगा। लेकिन मैं समझ गया था पानी कम ही सही बरसता तो है, और मैं उसे जमा करुंगा। आखिर मैंने तालाब खुदवाया।" कुछ देर चुप रहकर वो हंसते हुए बताते हैं, इसके बाद पिता जी ने मुझसे बात करनी बंद कर दी थी।"

''तालाब की खुदाई में ज्यादा रुपया खर्च नहीं हुआ क्योंकि हमारे यहां जमीन ऊंची नीची है जिसको बराबर करने के लिए किसानों को मिट्टी की जरूरत पड़ती है, इस लिए जब किसानों को पता चला तो वो खुद मज़दूर और ट्रैक्टर ट्रॉली लाकर मिट्टी खोद कर ले जाने लगे, जिससे मेरा तालाब आसानी से खुद गया।'' ‍वो आगे जोड़ते हैं।

2000 में ही उनका तालाब बनकर तैयार हो गया था। बरसात के बाद जब रबी के सीजन में फसलो‍ं की सिंचाई के लिए बाकी किसान पानी के जद्दोजहद कर रहे थे, दिलीप के खेत लहलहा रहे थे। वो बताते हैं, ''बाकी किसानों की अपेक्षा मेरी फसल काफी अच्छी हुई थी। ये देख कई किसानों ने मेरे प्रयास और फैसले की सराहना की। कई किसानों ने तो अगले साल अपनी जमीन पर तालाब खुदवा भी लिए थे।"

दिलीप के पास दो जगह पर खेत हैं और दोनों जगहों पर तालाब बना रखे हैं। उनके खेतों पर आसपास के किसानों का आनाजाना शुरु हो गया था, वो अब लोगों से ये भी बताने लगे थे कि खेत के किस हिस्से में तालाब बनवाना ज्यादा अच्छा होगा।

दिलीप बताते हैं, "मैं ये तो नहीं कहूंगा कि सब मेरी वजह से हुआ लेकिन उसके बाद तमाम लोगों ने तालाब बनवाए। फिर बाद में बारिश भी अच्छी हुई तो तालाब पानी से लबालब भी हुए। आज मेरे घर के करीब 10 किलोमीटर की एरिया में 1000 तलाब हैं। और अब तो सरकार भी काफी अनुदान देती है।"

भारत में अब छोटे तालाब और कुएं सिंचाई की समस्या वाले इलाकों के लिए सिंचाई का जरिया बन रहे हैं। यूपी और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में रहने वाले ( सभी 13 जिलों) इलाकों, महाराष्ट्र के विदर्भ समेत गुजरात, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के कई इलाकों में भारी संख्या में तालाब बनवाए गए। उत्तर प्रदेश में इन तालाबों को मनरेगा से भी जोड़ा गया था। ताकि किसान से ज्यादा से ज्यादा इसका फायदा उठा सकें।

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दिलीप ने बताया, ''वर्ष 2001 मैने एक एकड़ के तालाब को बड़ा करके पांच एकड़ में कर दिया। मेरे पिता जी मुझसे करीब पांच वर्षों तक नाराज रहे, मुझसे ठीक से बात नहीं करते थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि तालाब की वजह से फसल अच्छी हो रही है तब वो खुश हुए। उसके बाद वो जब किसी रिश्तेदार से भी मिलते तो उसे बताने लगते कि मेरे बेटे ने ये काम किया।''

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