संरक्षित खेती की पूरी जानकारी, क्या हैं फायदे और कैसे कर सकते हैं शुरूआत

संरक्षित खेती आधुनिक तकनीक की वह संरचना है, जिसमें एक नियंत्रित वातावरण में फसलों की खेती की जाती है। इसमें कीट अवरोधी नेट हाउस, ग्रीन हाउस, नवीनतम तकनीक से लैस पॉलीहाउस, प्लास्टिक लो-टनल, प्लास्टिक हाई-टनल, प्लास्टिक मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल होता है।

संरक्षित खेती की पूरी जानकारी, क्या हैं फायदे और कैसे कर सकते हैं शुरूआत

जिस तरह से जलवायु परिवर्तन से देश की कृषि प्रभावित हो रही है, ऐसे समय जरूरत है कृषि में नई तकनीक के इस्तेमाल करना, जिससे फसल उत्पादन पर कोई असर न पड़े और अच्छा उत्पादन मिलता रहे। ऐसी ही एक तकनीक है संरक्षित खेती।

भारत भौगोलिक विभिन्नताओं से परिपूर्ण एक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाला देश है। हमारे देश के लगभग 58 प्रतिशत से ज्यादा लोग अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं। इस प्रकार कृषि, रोजगार और जीविकोपार्जन का सबसे बड़ा स्रोत है। कृषि वैज्ञानिकों ने पारम्परिक कृषि में विविधीकरण का व्यापक रुप से प्रयोग करके आधुनिक कृषि में बदल दिया है। हमारे देश के किसान अधिक लाभ अर्जित करने के लिए उचित मूल्य वाली सभी प्रकार की फसलों जैसे- फल, फूल और सब्जियों आदि की खेती को विविधता प्रदान करते हैं।

संरक्षित खेती नए युग की ऐसी नवीनतम् कृषि प्रणाली है, जिसके माध्यम से किसान फसलों की मांग के अनुसार वातावरण को नियंत्रित करते हुए मंहगी फसलों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करते हैं, जहां पर धूप, छांव, गर्मी व ठंडक का अधिक प्रभाव न हो साथ ही तेज बारिश का असर और तीव्र हवाओं का प्रकोप भी न हो, और फसलों का प्राकृतिक प्रकोपों व अन्य कारकों से बचाव किया जाता है।


इस तकनीक के तहत फसलों के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार करते हैं, जहां जलवायु परिवर्तन के चलते फसलों पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े। संरक्षित खेती के द्वारा किसान प्रतिकूल परिस्थितियों में अच्छा उत्पादन ले सकते हैं। आधुनिक कृषि में, संरक्षित संरचनाओं ने उच्च उत्पादकता के साथ अधिक उत्पादन के लिए अपनी अधिकतम् क्षमता का प्रदर्शन किया है। इन नवीनतम् तकनीकों के अंगीकरण से फल, फूल और सब्जियों की उत्पादकता को वातावरण की तुलना में 4-5 गुना बढ़ाया जा सकता है। इन तकनीकों के अंर्तगत फसलों की अच्छी उत्पादकता के साथ बेहतर गुणवत्ता भी प्राप्त होती है। प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक आमदनी लेने के लिए ग्रामीण युवाओं द्वारा इन तकनीकों को अपनाया जा सकता है।

संरक्षित खेती की परिकल्पना

भारत में, संरक्षित खेती प्रौद्योगिकी वाणिज्यिक उत्पादन के लिए लगभग तीन दशक ही पुरानी है, जबकि विकसित देशों जैसे जापान, रुस, ब्रिटेन, चीन, हॉलैंड और अन्य देशों में दो सदी पुरानी है। इजराइल एक ऐसा देश है जहां किसानों ने अच्छी गुणवत्ता वाले फल, फूल और सब्जियों को कम पानी वाले रेगिस्तानी क्षेत्रों में उगाकर इस तकनीक से अच्छे उत्पादन के साथ बढ़िया मुनाफा भी कमा रहे हैं। हॉलैंड ने पॉलीहाउस की उन्नत तकनीक विकसित करके दुनिया के फूल निर्यात जगत में 70 प्रतिशत का योगदान दिया है।

संरक्षित खेती नवीनतम् तकनीक की वह संरचना है, जिसमें एक नियंत्रित वातावरण के अंर्तगत मूल्यवान फसलों की खेती की जाती है। ये संरक्षित संरचनाएं कीट अवरोधी नेट हाउस, ग्रीन हाउस, नवीनतम् तकनीक से लैस पॉलीहाउस, प्लास्टिक लो-टनल, प्लास्टिक हाई-टनल, प्लास्टिक मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई तकनीक आदि प्रकार की होती हैं।


विश्व में सब्जियों के कुल उत्पादन में भारत का चीन के बाद दूसरा स्थान है। वर्ष 2020-21 के लिए भारत में सब्जियों की मांग लगभग 214.82 मिलियन टन का अनुमान है, जबकि आपूर्ति 211.29 मिलियन टन होने की उम्मीद है। सब्जियों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता आवश्यकता से कम है। हरित क्रांति के बाद बढ़ती खाद्य और पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उत्पादन की मात्रा के साथ-साथ कृषि उत्पाद की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या की मांग को पूरा करने के लिए सब्जियों की फसल के उत्पादन में वृद्धि करने की अत्यन्त आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों का विकास, छोटी जोत, शहरीकरण एवं औद्यीकरण के कारण कृषि योग्य भूमि का घटता क्षेत्रफल आदि सब्जियों की मांग को पूरा करने में बाधक हैं। इसलिए, गहन खेती, ग्रीनहाउस, पॉलीहाउस, हाइड्रोपोनिक्स (बिना मिट्टी के खेती), ऐरोपोनिक्स और पोषक तत्व फिल्म तकनीक को अपनाकर फल, फूल व सब्जियों की उत्पादकता में सुधार करना अत्यन्त आवश्यक है।

संरक्षित खेती की ओर सरकार की पहल

संरक्षित संरचनाओं की प्रारम्भिक लागत अधिक होती है, लेकिन फसलों के अच्छे उत्पादन के साथ 3-5 वर्षों में इसकी भरपाई की जाती है। ऑफ-सीजन सब्जी, फल व फूलों की खेती और नर्सरी को इससे अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए संरक्षित संरचनाओं के अन्तर्गत उगाया जाता है। वित्तीय सहायता या सब्सिडी भी सरकार द्वारा प्रदान की जाती है। इन संरचनाओं का संचालन कुशलता से किया जाता है, क्योंकि संरक्षित संरचनाओं में आधुनिक विधियों/तकनीकों का उपयोग किया गया था। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न उपक्रमों के अंर्तगत संरक्षित खेती की संरचनाओं पर लगभग 50 प्रतिशत तक की सरकारी छूट हर प्रदेश में दी जाती है। इसके साथ-साथ किसी-किसी प्रदेश द्वारा 25-30 प्रतिशत की अतिरिक्त सरकारी छूट भी दी जाती है। इन दोनों सरकारी अनुदानों को मिलाकर लगभग 75-80 प्रतिशत तक की छूट किसानों को प्राप्त हो जाती है। अधिक जानकारी के लिए प्रत्येक प्रदेश के निदेशक, उद्यान और जिला उद्यान अधिकारी से सम्पर्क किया जा सकता है।


संरक्षित खेती के फायदे

पर्यावरण नियंत्रित संसाधनों (ग्रीन हाउस व पॉली हाउस) के अंर्तगत की जाने वाली संरक्षित खेती से फसल की गुणवत्ता और उत्पादकता में लगभग 5-12 प्रतिशत की वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित अनेक लाभ होते हैं।

संरक्षित संसाधनों के अन्तर्गत पैदा की गई फसल के उत्पादों की लोगों मध्य विश्वसनीयता बढ़ जाती है।

यह तकनीक फल, फूल और सब्जियों की फसलों को पैदा करने के लिए आदर्श रूप से अनुकूल है।

इन तकनीकों के तहत उपरोक्त फसलों की खेती वर्षभर ली जा सकती है।

फल, फूल व सब्जियों का इस तकनीक के माध्यम से ऑफ सीजन उत्पादन करके अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है।

रोग प्रतिरोधिता व अनुवांशिक रुप से उत्कृष्ट प्रत्यारोपण से उत्पादन निरन्तर लिया जा सकता है।

संरक्षित संसाधनों के तहत फसलों के लिए पानी की आवश्यकता को सीमित और नियंत्रित किया जा सकता है।

इस तकनीक से बहुत अच्छी गुणवत्ता वाली फसलों को आसानी से उगाया जा सकता है। जिनकी बाजार में मांग एवं कीमत दोनों ही अधिक होती हैं।

इस युग की आधुनिक तकनीक हाइड्रोपोनिक्स (बिना मिट्टी के खेती), ऐरोपोनिक्स और पोषक तत्व फिल्म तकनीक का भी अंगीकरण करके लाभ लिया जा सकता है।

स्टॉक, कलम और सूक्ष्म प्रोपोगेट का रखरखाव के लिए अति सुविधाजनक तकनीक है।

यह तकनीक बेरोजगार ग्रामीण महिलाओं और नवयुवकों के लिए स्वरोजगार के अच्छे अवसर प्रदान करती है।

आद्रता, तापमान, सूर्य का प्रकाश और वायु के प्रवाह को फसलों की आवश्यकतानुसार परिवर्तित करके फसलों का उत्पादकता के साथ-साथ गुणवत्ता भी बढ़ाई जा सकती है।

संरक्षित खेती के अंर्तगत आने वाली संरचनाएं

हाई-टेक पॉली हाउस

यह संरक्षित संरचना सभी संरचनाओं में महंगी एवं नवीनतम तकनीक है क्योंकि इसमें इस्तेमाल किए जाने वाले सभी ऑपरेशन जैसे सिंचाई, तापमान नियंत्रण, प्लास्टिक की दीवारों को ऊपर और नीचे करना आदि कम्प्यूटरों द्वारा संचालित किए जाते हैं। इस तरह की संरचनाओं का प्रयोग उच्च मूल्यवान फसलें उगाने में किया जाता है। इन संरचनाओं की लागत अधिक होने के कारण बहुत कम लोगों द्वारा अपनाया जाता है, लेकिन इन संरचनाओं के तहत फसलों का उत्पादन अन्य संरक्षित संरचनाओं की तुलना में अधिक एवं गुणवत्ता वाला होता है।

प्राकृतिक हवादार पॉली हाउस

इन संरचनाओं में सिंचाई, उर्वरता एवं सभी अन्य सभी कार्य मैन्युअल रूप से संचालित किया जाता है। इन संरचनाओं की लागत उच्च तकनीक से कम लेकिन दूसरों की तुलना में अधिक होती है। इसलिए यह संरचनाएं मध्य-सीमा लागत संरचनाओं के अंतर्गत आती हैं। इसमें खड़ी संरचना की दीवार स्टेनलेस स्टील और छत प्लास्टिक की दीवारों से बनी होती है। निर्माण में उपयोग की जाने वाली पॉलिथीन शीट पराबैंगनी प्रकाश के प्रवेश को रोक कर कार्बडाईऑक्साइडका संरक्षण करती है जिससे पौधे के विकास में वृद्धि होती है। पॉली हाउस के अंदर का तापमान और नमी बाहरी की स्थिति से अधिक होता है, जो कि प्रकाश संश्लेषण को बेहतर एवं पौधों के विकास को एक समान बनाता है।


लकड़ी और बांस

यह संरचनाएं ट्यूबलर संरचनाओं के समान होती हैं। लेकिन खड़ी संरचना बांस या लकड़ी से बनी है। ट्यूबलर संरचना की तुलना में इन संरचनाओं का जीवन छोटा है। इस पॉली हाउस में आंतरिक वातावरण को नियमित करने के लिए किसी विशिष्ट नियंत्रण उपकरण का उपयोग नहीं किया जाता है। जहां बिजली की उपलब्धता आसानी से नही होती है तो ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में प्राकृतिक वायुसंवाहित (नेचुरली वैंटीलेटर) पॉलीहाउस का निर्माण करते हैं।

हाई-टेक नेट हाउस/ग्रीन हाउस

हाई-टेक ग्रीनहाउस अत्याधुनिक जलवायु नियन्त्रित सुविधा, प्रकाश संश्लेषक सक्रिय विकिरण सुविधा, उन्नत वेंटिलेशन और स्क्रीनिंग सिस्टम, प्लांट ट्रेलिंग, नवीनतम माइक्रो सिंचाई और फर्टिगेशन सिस्टम से लैस होते हैं। प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के बावजूद विभिन्न बागवानी फसलों के लिए स्वस्थ पौधे एवं उनको समग्र विकास प्रदान करने के लिए वास्तविक नवाचारों में से एक माना जाता है। यह फसलों को हानिकारक पराबैंगनी और कुछ अवरक्त विकिरण से बचाता है। इसके साथ ही यह पौधों को अत्यधिक तापमान से बचाव, हवा एवं मिट्टी की नमी को बनाए रखने में मदद करता है। इस संरचना का उपयोग अत्यधिक धूप, ठंड, तेज हवा एवं कीट/पक्षियों के प्रति मूल्यवान फसलों के संरक्षण के लिए किया जाता है। हाई-टेक ग्रीनहाउस 500 वर्गमीटर से लेकर 20000 वर्गमीटर क्षेत्रफल केअनुकूलित आकार में उपलब्ध हो सकते हैं।

प्लास्टिक टनलपॉली हाउस

ये छोटी संरचनाएँ नर्सरी बनाने के लिए प्रभावी संरचनाएं समझी जाती हैं। यह पौधों को प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों जैसे बारिश, हवा, ओलावृष्टि आदि से बचाती हैं। इनका उपयोग मुख्य रूप से नर्सरी बढ़ाने के लिए किया जाता है। ये संरचनाएं शुरुआती बीज अंकुरण में मदद करती हैं और इनकी मदद से वर्ष भर खेती सम्भव है। यह संरचनाएं निम्नलिखित दो प्रकार की होती हैं।


प्लास्टिक लो-टनल

यह 1-3 माह के लिए सब्जियों के ऊपर बनाई जाने वाली अस्थाई संरचना है। यह देखने में सुरंग की तरह लगती है इसलिए इस संरचना को टनल की संज्ञा दी जाती है। इस लो-टनल संरचना को बनाने के लिए 2-3 मीटर लम्बी व 0.6-1.0 सेंटीमीटर मोटी जीआई (लोहे) सरिया या बांस की फट्टियों को अर्द्ध गोले/चंद्राकार के आकार में 1-1.5 मीटर चैड़े बेड पर 2 मीटर की दूरी पर गाड़ देते हैं। इस प्रकार बने टनल के ऊपर 25-30 माईक्रोन की पारदर्शी पॉलीथीन सीट से पूरी तरह से ढक देते हैं। इस प्रकार 2.5-3.0 फीट ऊंचाई की टनल बनकर तैयार हो जाती है। प्लास्टिक लो-टनल को मैदानी क्षेत्रों में कद्दू वर्गीय सभी सब्जियों की अगेती खेती को बढावा देने के लिए अधिकांशतः अपनाई जाती है। इस तकनीक से उत्पादन 1.5-2 माह पहले बाजार में आने से किसानों को अधिक लाभ प्राप्त होता है।

प्लास्टिक हाई-टनल (वॉक-इन टनल) पॉली हाउस

यह संरचना प्लास्टिक लो-टनलपॉली हाउस का बड़ा रूप हैं इसके अन्दर आसानी से आ जा सकते हैं। इसलिए इसे वॉक-इन टनल कहते हैं। वॉक-इन टनल की संरचना यूवी फिल्म से कवर की जाती है, जो सभी प्रकार की फसलों जैसे फल, फूल और सब्जियों के लिए उपयुक्त होती हंै। ये संरचनाएँ आकार में छोटी एवं प्रारम्भिक लागत कम होने के कारण अधिकतर किसानों द्वारा अपनाई जाती हैं। इस संरचनाओं में तापमान पर नियंत्रण नहीं होता है। लेकिन आंतरिक जलवायु बाहर से भिन्न होती है। समशीतोष्ण क्षेत्रों के सब्जी उत्पादक किसान कम लागत वाली संरक्षित संरचनाओं (पॉली हाउस) में जल्दी फसल उगाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं।


प्लास्टिक मल्चिंग

खेत में लगे पौधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक फिल्म से सही तरीके से ढकने की प्रणाली को प्लास्टिक मल्चिंग कहते है। यह फिल्म अनेक प्रकार एवं कई रंगों में आती है।भूमि में नमी संरक्षण, भूमि के तापक्रम को नियन्त्रित करने एवं भूमि के सोलेराइजेशन आदि की आवश्यकतानुसार प्लास्टिक मल्च फिल्म का रंग काला, पारदर्शी, दूधिया, प्रतिबिम्बित, नीला, लाल आदि का चयन किया जा सकता है।यह तकनीक खेत में मिट्टी के कटाव को रोकने में सहायक होती हैतथा बागवानी में होने वाले खरपतवार नियंत्रण एवं पोधों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने में सहायक होती है। इस तकनीक से भूमि की कठोरताकम होने के कारण पौधों की जड़ों का विकास अच्छा होता है। सामान्यतः 90-180 सेंटीमीटर की चैड़ाई वाली फिल्म ही प्रयोग में लाई जाती हैं। खुले खेतों में उगने वाली अधिकांश सब्जियों जैसे टमाटर, कद्दू एवं गोभी वर्गीय आदि के लिए प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक उपयोगी साबित होती है। सामान्य खेती की तुलना में 30-40 प्रतिशत उपज एवं गुणवत्ता बढ़ जाती है। इस तकनीक द्वारा पारम्परिक खेती की तुलनामें लगभग 20-25 प्रतिशत उर्वरकों की बचत के साथ 40-50 प्रतिशत सिंचाई जल की भी बचत होती है। खरपतवार नियन्त्रण पर होने वाले खर्च में भी लगभग80-90 प्रतिशत की कमी हो सकती है।

हाइड्रोपोनिक्स खेती (बिना मिट्टी के खेती)

हाइड्रोपोनिक्स खेती पद्धति एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पोधे अपने वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्वों के लिए मिट्टी पर नहीं बल्कि पोषक तत्त्व घोल पर निर्भर रहते हैं। पौधों को सहारा देने के लिए विभिन्न पदार्थों जैसे बालू कंकड़ नारियल का बुरादा (कोको-पिट), परलाइट, आदि को किसी गमले, बैग, ट्रफ, नलिका टंकी, आदि, जिसमें पोषण के लिए घोल का बहाव आसानी से बना रहे, में भरकर उनमें पौधें लगाये जाते हैं। इस पद्धति को अपनाने से पौधे मिट्टी जनित बिमारियों के प्रकोप से बचे रहते हैं। इस तकनीक से प्राप्त उत्पादों की गुणवत्ता उच्च कोटि की होती है जिनकी बाजार में मांग और कीमत दोनों ही अधिक होते हैं।



संरक्षित खेती के अंतर्गत उगाई जाने वाली उपयुक्त फसलें

भारतवर्ष में जलवायु एवं फसलों में बहुत विविधताएँ होने के कारण यह सम्भव नही है कि ग्रीनहाउस की कोई एक परिकल्पना/संरचना सभी पस्थितियों के लिये पर्याप्त होगी। आकार को ध्यान में रखते हुए आमतौर पर छोटे एवं कम आयतन के पौधों को संरक्षित खेती के लिए उपयुक्त समझा जाता है। बौनी प्रजातियों के फलों को भी संरक्षित खेती के लिए अपनाया जा सकता है। संरक्षित खेती के अन्र्तगत निम्नलिखित तालिका में उल्लेखित फसलों को संरक्षित खेती का अंगीकरण किया जा सकता है। फसल का चयन ग्रीनहाउस की क्षमता, उत्पादकता, अनुभव एवं बाजार सम्बन्धी कारकों के आधार पर निर्भर करता है। फसलों की विस्तृत जानकारी तालिका-1 में दी गई है।

संरक्षित खेती के अंतर्गत उगाई जाने वाली फसलें

सब्जियां: टमाटर, शिमला मिर्च, खीरा, पत्तागोभी, फूलगोभी, ब्रोकोली, हरी प्याज, सेम, मटर, चुकन्दर, मिर्च, धनिया, बैंगन, स्कैवश, भिंडी, करेला, शलगम, मूली, गाजर, अदरक, मिर्च, लौकी एवं तोरई आदि

फूल: गुलाब, गुलदाउदी, ऑर्किड्स, फॅर्न, कारनेशन, फ्रेशिया, एन्थोरियम, ग्लेडिओलस, लिली, रसकस, गनीगोजैन्घास, एल्सट्रोनेटिया, जरबेरा, बिगोनिया, टूयूलिप एवं डेजी आदि

फल: स्ट्राबेरी, अंगूर, सिट्रस, आलू बुखारा, आडू, केला, पपीता एवं खुमानी आदि

संरक्षित खेती से रोजगार सृजन

भारत में कृषि एक विधा से अधिक जीवन जीने का तरीका है। भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की अहम् भूमिका है। देश के लगभग 58 प्रतिशत से अधिक लोग अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं। इस प्रकार कृषि रोजगार और जीविकोपार्जन का सबसे बड़ा स्रोत है। कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में 14.7 प्रतिशत का ही योगदान है। संरक्षित खेती तकनीक से उगाए गये फल, फूल, और सब्जियों के फसलोत्पादन व दूसरे कृषि कार्यों को एक वैज्ञानिक तरीके से सम्पन्न किया जा सकता है। इसमें शिक्षित युवाओं और युवतियों के लिए रोजगार सृजन की अपार सम्भावनाएं हैं। औद्यानिक और तकनीकी के माध्यम से संरक्षित खेती के विभिन्न रूपों से रोजगार के क्षेत्र में बड़े-बड़े आयाम स्थापित किए जा रहे हैं। संरक्षित खेती के अंतर्गत अनेक तकनीकियों जैसे मृदा और जल गुणवत्ता सह इनपुट जांच प्रयोगशाला (आणविक संग्रहक स्पेक्ट्रो फोटोमीटर सहित), बीमारियों और कीटों पर नजर (उपचार व नियंत्रण सेवाएं), लघु सिंचाई प्रणाली (स्प्रिंलकर और ड्रिप समेत) के उपकरणों और अन्य उपकरणों के रख-रखाव (मरम्मत व किराए पर उपलब्ध कराना), कृषि सेवा केन्द्र, बीज प्रसंस्करण ईकाई, वर्मी कल्चर ईकाईयों की स्थापना, जैव उर्वरकों, जैव कीटनाशकों तथा जैव नियंत्रक उपायों का उत्पादन, संरक्षित खेती से सम्बन्धित विभिन्न पोर्टलों तक पहुंच स्थापित करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सूचना तकनीकी कियोस्क (दुकान/ऑफिस) की स्थापना, मूल्य सम्बर्धन केन्द्रों की स्थापना, प्रसंस्कृत फल, फूल, और सब्जियों के उत्पादों के लिए खुदरा व्यापार केंद्र की स्थापना, फल, फूल, एवं सब्जियों के निवेश एवं निर्गम के व्यापार के लिए ग्रामीण विपणन विक्रेता, सब्जियों के उत्पाद प्रसंस्करण की औधोगिक ईकाईयों की स्थापना, फल, फूल, एवं सब्जियों के अनुसंधान संस्थान एवं कृषि प्रौद्योगिकी आधारित स्टार्ट-अप के अंगीकरण से किसानों और इससे जुड़े हुए युवाओं एवं युवतियों को उनकी आय एवं दक्षता बढ़ाने में मदद मिल रही हैं।

(अनुज कुमार, मंगल सिंह, सत्यवीर सिंह,सेन्धिल आर एवं रमेश चन्द, भाकृअनुप-भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल)


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