देवरिया कांड की इनसाइड स्टोरी: सिसकियों में दब कर रह जाता है पीड़िताओं का दर्द

देवरिया कांड की इनसाइड स्टोरी: सिसकियों में दब कर रह जाता है पीड़िताओं का दर्द

बनारस/लखनऊ। यूपी का देवरिया हो या बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह का मामला आखिर तभी इतने लंबे समय तक छिपा क्यों रहा? क्यों लड़कियां वर्षों तक बलात्कार और यौन शोषण का दर्द झेलती रहीं, इसका जवाब इन लड़कियों की चुप्पी में ही छिपा है।

देवरिया के बालिका गृह में रह रही एक हिंदू लड़की ने जांच अधिकारियों को बताया, "गिरिजा दीदी ने कहा अगर तुम इस गाड़ी में बैठकर नहीं जाओगी तो तुम्हारे शौहर को मरवा डालेंगे।" इस लड़की ने एक मुस्लिम युवक से शादी की थी, मामला कोर्ट में पहुंचा, घर वालों ने लड़की को अपनाने से इंनकार कर दिया, जिसके बाद वो देवरिया में गिरिजा त्रिपाठी के बालिका गृह रखी गई थी। उसके साथ आगे क्या हुआ न उसने खुलकर अधिकारियों को बताया न काउंसलर को, वो चाहती भी नहीं कि उसके साथ क्या हुआ दुनिया को पता चले। इस लड़की को डर है कि शारीरिक शोषण की जानकारी होने पर ऐसा न हो उसका शौहर भी अपनाने से इनकार कर दें।

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"इन लड़कियों को उनके घर वाले पहले ही ठुकरा चुके होते हैं, बलात्कार पीड़ित, घर से भागी हुई लड़कियां पहले से मानसिक रूप से टूटी हुई होती हैं। ऐसे में इन्हें डर होता है कि अगर साथ कुछ गलत (बलात्कर-जिस्मफरोशी) की जानकारी बाहर गई तो पति-प्रेमी, समाज या परिवार उन्हें स्वीकर नहीं करेगा। इसलिए अक्सर ऐसे मामले वर्षों तक खुलते नहीं, लड़कियां ज्यादातर लड़कियां मजबूरी में मुंह नहीं खोलतीं।' देवरिया मामले से जुड़ी एक काउंसल ने नाम न छापने की शर्त पर बताया।

यूपी के समेत देश के तमाम शहरों में संचालित महिला और बालिका गृहों में ज्यादातर वो लड़कियां रखी जाती हैं जो प्रेम प्रसंग में भागकर शादी करती हैं, लड़का दूसरी जाति का होने पर केस कोर्ट पहुंच जाता है, बलात्कार पीड़ित (जिन्हें घर वाले नहीं अपनाते) मानव तस्करी में छुड़ाई गई लड़कियां होती हैं।

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अपने साथ होने वाली ज्यादती और दरिदंगी अक्सर ये लड़कियां बालिका गृह की दूसरी लड़कियों से भी नहीं बताती। पुलिस के पास पहुंचकर देवरिया कांड की शिकायत करने वाली एक बच्ची ने कहा, "शाम को कार में जाने वाली बड़ी दीदियां सुबह पांच-छह बजे रोती हुए आती थीं, पूछने पर वो कुछ नहीं बताती थीं।"

"यूपी का देवरिया हो या बिहार का मुजफ्फरपुर केस, ज्यादातर मामले लंबे समय के बाद खुले। बालिका गृहों में आने वाली लड़कियों की मनोदशा संचालक समझते हैं, इसी का वो फायदा उठाते हैं, कई बार डराते धमकाते भी हैं। ऐसी लड़कियों को मानसिक संबल की जरूरत होती है। देवरिया केस में पीड़ित लड़कियों के अलावा उनके परिजनों की भी काउंसिलिंग होगी।" एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया।


देवरिया के बालिका गृह में 43 लड़कियां थीं, जिसमें से 18 बच्चियां गायब हैं, जिनमें से 7 को विदेश भेजा जा चुका है। बाकी पुलिस-प्रशासन की निगरानी में हैं। पीड़ित लड़कियों के धारा 164 बयान दर्ज किए जा रहे हैं। कानून कार्यवाही पूरी होने के बाद इन्हें बनारस के शेल्टर होम में रखा जाएगा। बनारस के जिलाधिकारी बालिका गृह का निरीक्षण कर चुके हैं।

बनारस के उप मुख्य परिवीक्षा अधिकारी/प्रभारी जिला प्रोबेशन अधिकारी प्रवीन कुमार त्रिपाठी ने बताया, "पीड़िताएं अभी बनारस नहीं आयी हैं। जैसे ही देवरिया में कानूनी कार्यवाही पूरी होगी वैसे ही उन्हें बनारस के राजकीय पाश्चात्यवर्ती देखरेख संगठन जैतपुरा बनारस में रखा जाएगा। यहां इनके रहने का पूरा इंतजाम हो चुका है। जिलाधिकारी इस गृह की जांच कर चुके हैं।" उन्होंने आगे बताया, "एक बालिका पर सरकारी राशि महीने की 4000 रुपए आती है जिसमें 3400 का भोजन और 600 का वस्त्र, काॅपी-किताब में खर्च होता है। बनारस में जितने भी सेल्टर होम चल रहे हैं हर महीने हम उसकी जाँच के लिए जाते हैं।

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देवरिया की घटना के बाद जिलाधिकारी ने जाँच के दौरान एक नई चीज जोड़ी है कि जो भी अधिकारी जाँच के लिए जाएंगे वो बच्चियों से अकेले में भी बात करेंगे और उनकी समस्याओं का समाधान होगा।

मुजफ्फपुर में 34 लड़कियों से बलात्कार और देवरिया केस कोई पहले मामले नहीं हैं। देश में अलग-अलग सुधार और बालिका गृहों से ऐसी ख़बरें आती रही हैं। देवरिया की गिरिजा त्रिपाठी की तरह बिहार के ब्रजेश ठाकुर की संस्था भी ऐसे कई शेल्टर होम चलाती थी।

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "इस तरह की घटनाएं प्रदेश में तभी रुकेंगी जब सभी संवासिनी गृह में हर हफ़्ते उच्च अधिकारियों द्वारा जांच की जाए। इसके साथ ही हर हफ़्ते मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता के द्वारा संवासनियों की काउंसलिंग की जाए। काउंसलिंग रिपोर्ट को सील बंद लिफाफे में जिला परिवीक्षा अधिकारी को भेजी जाए।"


उन्होंने आगे बताया, "प्रदेश में इस तरह की घटनाएं इसलिए लगातार घट रही हैं क्योंकि इन संवासिनी गृहों की नियमित जांच नहीं होती है, अगर जांच होती भी है तो सफाई, खाना, कपड़ा या बिल्डिंग की होती है पर कभी यहां रह रही संवासनियों की मन की पीड़ा नहीं सुनी जाती, अगर सुनी गई होती तो पीड़िताओं की संख्या बहुत कम होती और ऐसी बड़ी घटनाएं अंजाम तक न पहुंच पाती।"

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