... और इस तरह देश के पहले निर्दलीय राष्ट्रपति बने थे वीवी गिरि

Shefali SrivastavaShefali Srivastava   24 Jun 2017 1:20 AM GMT

... और इस तरह देश के पहले निर्दलीय राष्ट्रपति बने थे वीवी गिरिराष्ट्रपति की शपथ लेते वीवी गिरि (फोटो साभार: इंटरनेट)

लखनऊ। 17 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव इस समय हर तरफ सुर्खियों में है। एनडीए की तरफ से रामनाथ कोविंद के खिलाफ विपक्ष ने पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को उतारा है। बात जब राष्ट्रपति चुनावों की हो तो इससे जुड़े कई रोचक किस्से हैं जिनका जिक्र जरूरी है।

आज बात भारत के चौथे राष्ट्रपति वीवी गिरि की जिनका राष्ट्रपति बनने का सफर काफी रोचक रहा। वह 1969 से 1974 तक देश के पहले निर्दलीय राष्ट्रपति रहे।

उनके राष्ट्रपति बनने का किस्सा-

तीन मई 1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की अचानक मृत्यु के बाद उस समय के उपराष्ट्रपति वीवी गिरि को कार्यवाहक की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। हालांकि बाद में राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा लेने के लिए उन्होंने इंदिरा गांधी के कहने पर पद से इस्तीफा दे दिया था।

उस समय कांग्रेस में पहले से ही दो गुट थे। के कामराज वाले सिंडिकेट गुट का दबदबा ज्यादा था और वे नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति उम्मीदवार चुनने की आजादी इंदिरा गांधी को दी जाए। लिहाजा सिंडिकेट ने राष्ट्रपति पद के लिए नीलम संजीव रेड्डी का नाम घोषित कर दिया। रेड्डी उस समय लोकसभाध्यक्ष के पद पर काम कर रहे थे और कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके थे। इस बीच इंदिरा गांधी ने जगजीवन राम से भी उम्मीदवारी के लिए संपर्क किया लेकिन वे पिछले 10 साल से इनकम टैक्स रिटर्न न भरने की वजह से कानूनी पचड़े में फंसे थे।

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लिहाजा इंदिरा गांधी ने फिर गिरि को ही चुनाव लड़ने कोे कहा। गिरि ने तब सार्वजनिक रूप से ऐलान कर दिया कि अगर कांग्रेस उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं भी बनाती तब भी वो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेंगे।

कहा जाता है कि गिरि को जीत दिलाने में इंदिरा गांधी ने भी सभी राज्य के मुख्यमंत्रियों से भावुक अपील की थी। इसमें गैर कांग्रेसी राज्य भी शामिल थे। 16 अगस्त को चुनाव होने के बाद 20 अगस्त, 1969 को वोटों की गिनती शुरू हुई। पहले राउंड में पीछे चल रहे गिरि ने दूसरे राउंड में नीलम संजीव रेड्डी को 14650 मतों के अंतर से हरा दिया था। गिरि को इंदिरा के अलावा कम्यूनिस्टों, अकालियों, निर्दलीय और डीएमके का समर्थन भी मिला।

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यहां पर कम्यूनिस्ट का गिरि को सहयोग मिलना बड़ी बात थी क्योंकि 1959 में केरल में दुनिया की पहली वोटों के माध्यम से चुनी गई लेफ्ट की सरकार को गिराने के लिए इन्होंने ही जवाहर लाल नेहरू से सिफारिश की थी।

आयरलैंड से निकाले गए थे गिरि

10 अगस्त 1894 को ओडिशा के बेरहमपुर में पैदा हुए वीवी गिरि एक तेलुगू बोलने वाले ब्राह्मण परिवार से हैं। उनके पिता प्रख्यात वकील थे तो उनकी मां स्वतंत्रता आंदोलन की कार्यकर्ता। उनकी मां का ही प्रभाव था कि जब वीवी गिरि आयरलैंड गए तो वहां के स्वतंत्रता आंदोलन का असर उनपर हुआ था और वे उससे जुड़ गए थे।

दरअसल वीवी गिरि लॉ की पढ़ाई करने के लिए आयरलैंड के डबलिन गए थे लेकिन वहां के नागरिकों की स्वतंत्रता की लड़ाई ने उन्हें काफी प्रभावित किया। वह भी इससे जुड़ गए और नतीजा उन्हें आयरलैंड सरकार ने देश निकाला का आदेश दे दिया।

भारत आकर वह कांग्रेस के सदस्य बन गए और एनी बेसेंट के होम रूल आंदोलन से जुड़ गए।

मजदूरों की आवाज बने

1920 में वे महात्मा गांधी के संपर्क में आएद और उनके असहयोग आंदोलन में भागीदारी की। उन्हें दुकानों में शराब बेचने का विरोध करने की वजह से जेल भेजा गया।

मजदूरों के प्रति वह काफी समर्पित नेता थे और उनकी रक्षा और अधिकारों के लिए काफी चिंता करते थे। 1923 में कुछ लोगों की मदद से ऑल इंडिया रेलवेमेन फेडरेशन बनाया। करीब 10 साल से भी ज्यादा समय तक वह इसके जनरल सेकेटरी बने रहे।

1951 में आजादी के बाद हुए पहले आम चुनावों में ये मद्रास की पाथापटनम लोकसभा सीट से जीतकर देश के पहले श्रम मंत्री बने।

1957 में दोबारा आम चुनावों में ये पार्वतीपुरम क्षेत्र से हार गए थे और इन्हें यूपी का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसके बाद वे केरल और कर्नाटक के भी राज्यपाल बने।

केरल में लेफ्ट की सरकार गिराने की थी सिफारिश

कहा जाता है कि केरल में दुनिया की पहली लेफ्ट सरकार को बर्खास्त करने के लिए इन्होंने ही नेहरू को सुझाव दिया था। हुआ यूं था कि 1957 में आम चुनावों में राज्य में पहली बार लेफ्ट की सरकार बनी और ईएमएस नंबूदरीपाद राज्य के मुख्यमंत्री बने लेकिन उनके कई ऐसे प्रस्ताव थे जैसे भूमि सुधार अधिनियम, एजुकेशन सिस्टम में बदलाव, प्राइवेट टीचर्स का पारिश्रमिक वगैरह जिसके चलते सिर्फ केरल ही नहीं पूरे भारत में इसका असर होने लगा जबकि कांग्रेस की तरफ से ऐसे कोई भी प्रस्ताव किसी राज्य में नहीं लाए गए थे। नतीजा आर्टिकल 356 के तहत 31 जुलाई 1959 को राज्य में केरल की सरकार बर्खास्त दी गई।

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