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पानी निकासी के लिए नालियों की सफाई हो रही, उन्हें गाद और मलबा रहित बनाया जा रहा, फिर क्यों डूब रहा शहरी भारत?

भारत में नगरीय बाढ़ प्रबन्धन तंत्र सिर्फ वर्षा जल की निकासी के ढांचे में सुधार पर ही ध्यान दे रहा है जबकि उसे बाढ़ से निपटने के लिये सक्षम बनाने के टिकाऊ समाधान तैयार करने पर पहले ध्या़न देना चाहिये।

पानी निकासी के लिए नालियों की सफाई हो रही, उन्हें गाद और मलबा रहित बनाया जा रहा, फिर क्यों डूब रहा शहरी भारत?

सहाना गोस्वामी और सम्राट बसाक

भारत इस वक्त मानसून 2020 के मध्य दौर से गुजर रहा है और भारतीय मौसम विभाग ने इस साल मानसून सामान्य रहने की संभावना जतायी है। मगर मौसमी अनिश्चितता के कारण क्षेत्रीय वर्षा की मात्रा में अंतर की वजह से असम और बिहार के ग्रामीण और वन क्षेत्र पहले ही बाढ़ से लबालब हो गये हैं। हालांकि देश के अनेक शहरों में भारी वर्षा हो रही है, मगर नगरीय इलाकों के लिये चिंता गहरा रही है। मन में सवाल उठ रहा है कि क्या नगरीय भारत एक बार फिर पानी में डूब जाएगा?

बारिश के पानी की निकासी के माध्यमों जैसे कि नालियां, पम्प और आउटफाल्स‍ वगैरह अत्यधिक वर्षा या सड़कों और गलियों में बहने वाले बारिश के बेतहाशा पानी के कारण बार-बार उफान पर आ जाते हैं। न सिर्फ बेंगलूरू, दिल्ली, हैदराबाद और मुम्बई जैसे भारतीय शहर बल्कि दुनिया के विकासशील देशों के अनेक नगर बार-बार बाढ़ की चपेट में आते हैं।

दुनिया भर में बारिश के पानी की निकासी की व्यवस्था बार-बार चरमराने के मद्देनजर अब इसके हल तलाशे जा रहे हैं। कुदरती पारिस्थितिकी तंत्र जैसे कि झीलें, नदियां, बाढ़ के मैदान या पार्क और जंगल वगैरह कुछ कुदरती समाधान (ब्लूस-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर) हैं। वे बाढ़ से निपटने और उसके प्रबन्धन के लिये लचीले और किफायती समाधान उपलब्ध कराने के अलावा उसके साथ मिलने वाले फायदे भी मुहैया कराते हैं।

भारत में नगरीय बाढ़ प्रबन्धन तंत्र सिर्फ वर्षा जल की निकासी के ढांचे में सुधार पर ही ध्यान दे रहा है जबकि उसे बाढ़ से निपटने के लिये सक्षम बनाने के टिकाऊ समाधान तैयार करने पर पहले ध्या़न देना चाहिये। शहरों में बारिश के पानी की निकासी के नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है। नालियों की सफाई कर उन्हें गाद और मलबा रहित बनाया जा रहा है। सीवेज और बारिश के पानी की निकासी के लिये अलग-अलग नालियां बनायी जा रही हैं।

यह सभी जरूरी काम हैं और शहरों को वर्षा के पानी की निकासी का बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए काफी धन खर्च करना पड़ रहा है, मगर बार-बार आने वाली बाढ़ से यह पता चलता है कि ये सभी प्रयास काफी नहीं हैं। भारत के विभिन्ऩ नगरीय इलाकों में हर साल बाढ़ की समस्या पैदा होने के तीन मुख्य कारण चिह्नित किये गये हैं।

1. बाढ़ वाले रास्तों पर निर्माण कार्य

बारिश की घटनाओं के दौरान निचले इलाकों (बाढ़ के मैदान, झील के बेड) पर स्थित सार्वजनिक अवसंरचना (बस डिपो, सड़कें, मेट्रो रेल, हवाई अड्डे आदि) सहित शहरी विकास ने बाढ़ के जोखिम को बढ़ा दिया। ऐसे क्षेत्र आमतौर पर खास जलभराव वाले होते हैं क्योंकि ढलान की वजह से पानी हरे-भरे निचले इलाकों में भर जाता है।

डब्ल्यूआरआई इंडिया के एक मौजूदा रिसर्च प्रोजेक्ट के प्रारंभिक निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि भारत के 10 सबसे ज्या्दा आबादी वाले शहर (अहमदाबाद, बेंगलूरु, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, जयपुर, कोलकाता, मुंबई, पुणे और सूरत) में वर्ष 2000-15 (शहर के केंद्र के 20 किमी के भीतर) के बीच हुए नये नगरीय विकास कार्यों के तहत बनी 35 प्रतिशत इमारतों का निर्माण (428 वर्ग किमी) भूजल रीचार्ज की अधिक या अत्ययधिक सम्भावना वाले निचले (निचले एवं हरे-भरे) इलाकों में हुआ है। पिछले पांच वर्षों के दौरान ये सभी शहर बाढ़ की समस्या से बार-बार जूझते नजर आये हैं।

वर्ष 2000-15 के बीच भूजल रीचार्ज की सम्भा़वना वाले विभिन्न श्रेणियों के क्षेत्रों (0-20 किमी) में हुआ नया नगरीय विकास। फोटो: डब्लूआरआई इं‍डिया

झील, वेटलैंड्स (कच्छ‍ भूमि) और जंगल वगैरह वर्षा के पानी को कुदरती तरीके से सोखने का काम करते हैं। वे पानी को यहां-वहां बहने से रोकने के साथ-साथ उसके बहाव की रफ्तार को भी कम करते हैं। इस तरह से वे बाढ़ के खतरे को कम करते हैं। इन प्राकृतिक स्थलों पर अति‍क्रमण और उनके विनाश से शहरों को बाढ़ से बचाने का कवच कमजोर पड़ जाता है।

कुछ चुनिंदा नगरों (बेंगलूरू, चेन्नई और हैदराबाद) की सेटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वर्ष 1970-2020 के बीच बेतरतीब शहरीकरण की वजह से झीलें या तो सिकुड़ गयी हैं या फिर उन पर सड़कें, आवासीय क्षेत्र या खेल के मैदान बनने से उनका अस्तित्व ही खत्म हो गया है। इन क्षेत्रों में नियमित रूप से बाढ़ आती है क्योंकि बारिश का पानी इन निचले इलाकों में भरता है।

चयनित झीलों के ऐतिहासिक सेटेलाइट चित्र यह जाहिर करते हैं कि निर्माण कार्यों ने झीलों को ढक लिया है। डेटा स्रोत- लैंडसेट 1 एमएसएस की सेटेलाइट इमेजरी से झील के वास्तविक क्षेत्र का पता लगा। फोटो: डब्लूआरआई इंडिया

2. बाढ़ का रास्ताल साफ होना

बारिश का पानी जमीन के अंदर जाता है, सतह पर बहता है और वाष्प-उत्सर्जन के जरिये वातावरण में घुल जाता है। अभेद्य सतहों वाले शहरी क्षेत्रों में पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता और न ही उसका वाष्पीकरण हो पाता है। ऐसे में पानी को कोई और जगह नहीं मिलती। वह केवल सतहों पर बहता है। अमेरिका में हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि अभेद्य सतह वाले क्षेत्र में एक प्रतिशत की वृद्धि होने से नगरीय बाढ़ की तीव्रता 3.3 फीसदी बढ़ जाती है।

बेंगलूरू में पानी से भरी पार्किंग। फोटो: तेजस/फ्लिकर


मुम्बई की सड़क। फोटो: ए. कैप/फ्लिकर

शहरी भारत में कंक्रीट के जंगल का दायरा लगातार बढ़ रहा है। बारिश के पानी की निकासी की व्यवस्था की परवाह किये बगैर शहरी नागरिकों के लिये इमारतें, सड़कें और फ्लाईओवर (बिल्टक-अप कवर/निर्मित) बनाने का काम निरन्तर चल रहा है। भारी मात्रा में वर्षा जल के इन अभेद्य सतहों में भर जाने की वजह से बार-बार बाढ़ की समस्या पैदा होती है।

डब्लूआरआई इंडिया के एक मौजूदा शोध से यह संकेत मिलते हैं कि नगर के केन्द्र (मुम्बई में 9 प्रतिशत से लेकर सूरत में 127 प्रतिशत तक) के 0-20 किमी के दायरे में बिल्ट-अप कवर में 47 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नगर के केन्द्र से 20-50 किमी की परिधि में बिल्ट-अप कवर में 134 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है (कोलकाता/मुम्बई में 30 प्रतिशत से लेकर पुणे में 412 प्रतिशत)। उपरोक्त 10 में से ज्यादातर शहर पिछले पांच वर्षों (2015-2020) के दौरान बार-बार बाढ़ ग्रस्त हुए हैं और खासकर पार्किंग स्थलों, सड़कों और अंडरपास में बार-बार भारी जलभराव हो रहा है।

वर्ष 2000-15 के बीच सिटी सेंटर से 0-20 किमी और 20-50 किमी क्षेत्र में निर्माण कार्यों के दायरे में वृद्धि। डेटा स्रोत : ईसी-जेआरसी ग्लोबल ह्यूमन सेटेलमेंट लेयर (जीएचएसएल) फोटो: डब्लूआरआई इंडिया

3. अनिश्चिततापूर्ण बारिश

जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश के समय और आवृत्ति में भी बदलाव हुआ है। हाल के कुछ वर्षों में ऐसा देखा गया है कि किसी शहर में एक महीने के दौरान या फिर पूरे मौसम में अनुमानित औसत बारिश के बराबर पानी महज कुछ दिनों में ही बरस जाता है।

इस साल मुंबई में जुलाई माह में अनुमानित बारिश का 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ आठ दिनों के अंदर ही बरस गया। वर्ष 2018 में केरल में आयी विनाशकारी बाढ़ भी राज्य के बारिश के पूरे मौसम में अनुमानित वर्षा के 200 प्रतिशत अतिरिक्त के बराबर पानी बरसने का नतीजा थी। इसमें से ज्यादातर बारिश एक हफ्ते के अंदर हुई थी।

वर्ष 2015 में चेन्नई में आई बाढ़ एक दिसंबर को हुई 345 मिमी बारिश का परिणाम थी (दिसंबर में चेन्नई में होने वाली औसत वर्षा 191 मिमी है)।

बाढ़ की वजह से भारी आर्थिक और सामाजिक नुकसान होता है। एक अनुमान के मुताबिक केरल में आई बाढ़ से 3.56 अरब डॉलर यानी 27,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था जबकि चेन्नई में बाढ़ की वजह से तीन अरब डॉलर यानी 22,000 करोड़ रुपए की क्षति हुई थी।

डब्ल्यूआरआई एक्वेडक्ट प्लेटफार्म के फ्लड एनालाइजर टूल के अनुमान के मुताबिक वर्ष 2030 तक 3 करोड़ 40 लाख भारतीय नदी के कारण होने वाली बाढ़ के खतरे का सामना करेंगे (वर्ष 2010 में यह संख्या एक करोड़ 20 लाख थी)।

प्रतिक्रिया से क्षमता निर्माण तक

मूलभूत ढांचे के विस्तार और उसे बेहतर बनाने की कवायद के साथ-साथ अब बारिश और बाढ़ की पूर्व चेतावनी की ठोस व्यवस्था की जा रही है। जैसा कि चेन्नई और मुंबई में है। शहरों (बेंगलूरू) में बाढ़ की आशंका वाले इलाकों के संवादात्मक नक्शे तैयार किए जा रहे हैं। मगर फिर भी यह महज प्रतिक्रियात्मक कदम हैं।

अगर इन्हें बेहतरीन तरीके से लागू किया जाए तो लोगों को बाढ़ की आशंका वाले इलाकों से हटाने और राहत तथा बचाव कार्यों के लिए प्रभावी कदम उठाने में मदद मिलेगी। ये कदम निश्चित रूप से जरूरी हैं लेकिन यह बाढ़ को रोकने और बाढ़ के कारण होने वाले जान-माल के नुकसान के साथ-साथ भौतिक तथा सामाजिक मूलभूत ढांचे को होने वाली हानि को पूरी मुस्तैदी से नहीं रोक पाते।

भारत में वर्षा जल और बेतहाशा बारिश के प्रबन्धन का फौरन पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत है। वर्तमान और भविष्य में बनने वाले चरम मौसमी हालात को सम्भालने के लिये सदी पुरानी गैर लचीली और खर्चीली वर्षा जल निकासी अवसंरचना पर निर्भर रहना काफी नहीं होगा।

पूरी दुनिया में सिर्फ ग्रे इंफ्रास्ट्राक्चर (निर्मित आधारिक संरचना) की व्यवस्था के जरिये बारिश के पानी की निकासी मुमकिन नहीं है। नगरीय इलाकों में आने वाली बाढ़ के प्रबंधन के लिये शहरों में हरित (ग्रे+ग्रीन) अवसंरचना का चुनाव किया जा रहा है। अध्ययनों से पता चलता है कि वर्षा जल प्रबंधन के लिये हरित अवसंरचना का इस्तेमाल न सिर्फ किफायती है, बल्कि इससे परम्पंरागत ग्रे अवसंरचना प्रणालियों को उन्नत करने, उन्हें विस्तार देने या उनकी मरम्मत के मुकाबले कहीं ज्यादा अन्य फायदे भी होते हैं।

शहरी नियोजन पानी के प्रति विवेकपूर्ण विकास की ओर बढ़ रहा है और शहरों में (स्थानीय) सड़क, पड़ोस और (बड़े) शहर के पैमाने पर एकीकृत ग्रीन और ग्रे इन्फ्रास्ट्रक्चर सॉल्यूशन का एक हाइब्रिड तरीका अपना रहे हैं ताकि बाढ़ की परेशानी से निपटा जा सके।

बाढ़ की वजह से जान-माल के साथ-साथ आजीविका का भी नुकसान होता है। साथ ही इससे विकास के वे फायदे भी प्रभावित होते हैं, जो सम्बन्धित नगरीय प्राधिकरण/सरकार दशकों की कड़ी मशक्कत के बाद हासिल करती हैं।

एकीकृत हरित और ग्रे बुनियादी ढांचे के साथ मिलकर विवेकपूर्ण शहरी विकास किये जाने से किसी नगर को बाढ़ से निपटने के लिये तैयार किया जा सकता है। ऐसे तरीकों को नजरअंदाज करने और नगरीयकरण तथा जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले वर्षा जल के भरने की समस्याओं से निपटने के लिये सिर्फ ग्रे इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करने से भारत के शहर बार-बार बाढ़ से जूझने को मजबूर होंगे।

शहरी नियोजन में अनुकूलन के लिए शहर प्रकृति आधारित समाधानों को कैसे एकीकृत करते हैं। फोटो: डब्ल्यूआरआई इंडिया

(इस लेख को डब्ल्यूआरआई इंडिया से लिया गया है। आप मूल लेख यहां पढ़ सकते हैं)

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