'पुलिस ने आरोपियों को समय पर पकड़ा होता तो मेरी फूल सी बच्ची आज जिंदा होती'

पुलिसिया तंत्र से हारकर एक नबालिग गैंगरेप पीड़िता ने फांसी इसलिए लगा ली क्योंकि उसकी कहीं सुनवाई नहीं हो रही थी।

Neetu SinghNeetu Singh   13 Dec 2019 1:24 PM GMT

माता-पिता का आरोप कि जन्म प्रमाण पत्र न होने से तीन दिन तक दर्ज नहीं की रिपोर्ट। स्कूल से जन्म प्रमाण पत्र मिलने के बाद ही शुरू की कार्रवाई

पिता का आरोप- तीन आरोपियों में से एक ने पहले मां के साथ भी किया बलात्कार, दबाव में पंचायत बैठा कर कराया गया समझौता

कानपुर देहात के एसपी अनुराग वत्स ने पीड़िता को 13 दिन पुलिस कस्टडी में रखने का किया खंडन, उन्होंने कहा, 'पीड़िता को मेडिकल और मजिस्ट्रेट के बयान के लिए 16-22 नवम्बर को महिला कांस्टेबल के रूम पर रखा गया क्योंकि जिले में शेल्टर होम नहीं हैं,'

    रूरा (कानपुर देहात)। लगातार तीन दिन तक एक नाबालिग का गैंगरेप होता रहा। पुलिस तीन दिन बाद एफआईआर लिखती है और फिर पूछताछ और जांच के नाम पर पीड़िता को सात दिन तक महिला थाने में रखती है और जब पीड़िता 24वें दिन फांसी लगा लेती है तब उसी दिन आरोपियों को पकड़ लेती है।

कानपुर देहात जिले के रूरा थाना क्षेत्र में रहने वाली 16 वर्षीय निकिता (बदला हुआ नाम) के तीन पड़ोसियों ने उस वक्त उसका अपहरण किया जब वो अपने घर के बाहर बने शौचालय से शौच करके 13 नवंबर की शाम सात बजे अपने घर में जा रही थी। निकिता के बयान के आधार पर उसके घर से महज 15 फिट की दूरी पर रिंकू के घर में उसे कमरे में बंद कर लिया। उसके हाथ पैर बांध दिए, मुंह में कपड़ा लगा दिया, जिससे वो चिल्ला न सके।

अपने बयान में पीड़िता ने यह आरोप लगाया कि तीनों आरोपी रिंकू, लाला और सन्नी तीन दिन तक बारी-बारी से उसका रेप करते रहे। उसे धमकी देते रहे कि अगर उसने ये बात किसी को बताई तो उसे और उसके घरवालों को जान से मार डालेंगे। निकिता के परिवार ने जब एफआईआर दर्ज़ करवाई तो 16 नवंबर की शाम लड़की को उन लोगों (आरोपियों) ने छोड़ा।

पीड़िता की मां बच्ची के कपड़ों को दिखाते ही फफक कर रोने लगीं

पीड़िता के चचेरे भाई ने बताया, "जिस दिन बच्ची का अपहरण हुआ, उसी दिन हम थाने में एफआईआर दर्ज कराने गये थे, लेकिन तीन दिन तक एफआईआर केवल इसलिए नहीं लिखी गयी क्योंकि बच्ची के जन्म प्रमाणपत्र का हमारे पास कोई कागज नहीं था। जब तीसरे दिन सरकारी स्कूल से उसकी जन्म की तारीख निकालकर लिखित रूप से ले गये, तब एफआईआर दर्ज की गयी।"

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वह आगे कहते हैं, "जिस दिन एफआईआर दर्ज हुई उसी दिन शाम को उन लोगों ने हमारी बहन को छोड़ दिया। जिस दिन बहन छूटकर आयी हम फिर उसे थाने ले गये, उसके बाद 16 नवंबर से 28 नवंबर तक मेरी बहन पुलिस कस्टडी में रही। पुलिस ने कहा कुछ दिन के लिए इसे रिश्तेदारी में भेज दो जरूरत पड़ेगी तो हम बुला लेंगे,फिर उसे चचेरी बहन के यहां भेज दिया था।"

पीड़िता को एफआईआर दर्ज होने के 13 दिनों तक महिला पुलिस कस्टडी में रखना कितना सही था? इस सवाल के जबाब के लिए 'गांव कनेक्शन' ने पुलिस महानिदेशक से लेकर रूरा थाना और कानपुर देहात के जिलाधिकारी से लेकर कई जिम्मेदार अधिकारियों को कई बार फोन और मैसेज किये गये पर किसी से बात नहीं हो सकी। बमुश्किल कुछ सेकेण्ड के लिए अकबरपुर क्षेत्राधिकारी अर्पित कपूर से बात हुई उन्होंने कहा, "मुझे इस विषय में जानकारी नहीं है, कि पीड़िता को थाने में रखा गया।"

पुनः 14 दिसंबर को पीड़िता के चचेरे भाई को जब गांव कनेक्शन के रिपोर्टर ने दोबारा फोन किया कि क्या पीड़िता को 13 दिन ही थाने में रखा गया आप इस बात से सुनिश्चित हैं तो उन्होंने कागज चेक करने की बात कही और कहा, "मुझे 22 नवम्बर और 28 नवम्बर में थोड़ी दुविधा है चेक करके बताता हूँ।" कुछ देर बाद उन्होंने फोन करके बताया, " 22 नवम्बर को बयान होने के बाद पीड़िता को हमें सौंप दिया गया था।"

इस मुद्दे पर 15 दिसंबर को कानपुर देहात के एसपी अनुराग वत्स ने गाँव कनेक्शन को बताया, "पीड़िता को 16 से 22 नवम्बर तक मेडिकल जांच और मजिस्ट्रेट बयान के लिए महिला कांस्टेबल के हॉस्टल में रखा गया क्योंकि कानपुर देहात में शेल्टर होम नहीं हैं, इसलिए इसे पुलिस कस्टडी नहीं कहा जा सकता। दूसरी बात जिस दिन पीड़ित परिवार थाने एफआईआर दर्ज कराने आया है वो उसी दिन दर्ज की गयी है।"

पीड़िता की मौत के बाद क्या आरोपियों को गिरफ्तार किया इस पर अनुराग वत्स ने बताया, "हां ये सच है कि पीड़िता की मौत के बाद आरोपियों को गिरफ्तार किया गया पर ऐसा नहीं है कि उससे पहले पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश न दी हो। अगर दबिश न दी जा रही होती तो आरोपी कोर्ट में 30 नवम्बर को सरेंडर होने का प्रार्थना पत्र न डालते।"

पीड़िता की साइकिल जिससे वो पढ़ने जाती थी

लगातार कई बार फोन के बाद मुश्किल से रूरा थानाध्यक्ष का फोन उठा। पीड़िता को थाने में रखा गया, इस आरोप पर उन्होंने कहा, "पूछताछ के लिए महिला थाने में रखा जा सकता है। कई बार मेडिकल होता है तो रात में पीड़िता घर कैसे जाएगी।" जब उनसे रिपोर्टर ने कहा कि थाने से पीड़िता के घर की दूरी लगभग दो किलोमीटर दूर है तो फिर इतने दिन क्यों थाने में रखा गया इस पर वह बोले, "मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है मैं दो तीन दिन पहले आया हूं आप इसकी जानकारी तात्कालिक थानाध्यक्ष से पूछिए।" इसके बाद उन्होंने फोन काट दिया।

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पीड़ित परिवार का आरोप है कि उनकी बेटी की मौत की ज़िम्मेदार सिर्फ पुलिस प्रशासन है। अगर पुलिस समय पर आरोपियों को पकड़ लेती तो शायद मेरी बेटी जिंदा होती। इसे पुलिस की तेजी ही कही जाएगी कि जिस दिन निकिता ने आत्महत्या की उसी दिन शाम को दो आरोपी गिरफ्तार हो गए।

रेप पीड़िता की मां ने बताया,"वो अपनी दीदी के घर से रोज फोन करके पूछती थी कोई पकड़ा गया कि नहीं। जब उसे जवाब न में मिलता तो वो चुपचाप फोन रख देती। उन लोगों (आरोपियों) ने जब उसे छोड़ा तो बहुत डराया था। वो उस दहशत से बाहर नहीं निकल पा रही थी। अगर पुलिस समय से आरोपियों को पकड़ लेती तो हमारी फूल जैसी बच्ची कभी ऐसा नहीं करती।"

आरोपी के घर का वो कमरा जिसमें पीड़िता को तीन दिन कैद रखा

जब मीडिया में इस मामले ने तूल पकड़ा तब जांच अधिकारी अरुण कुमार यादव का निलंबन कर दिया गया और रूरा के थाना प्रभारी सैयद मोहम्मद अब्बास का 11 दिसंबर को सुबह ट्रांसफर कर दिया गया।

"नामदज तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। सभी के डीएनए सैम्पल ले लिए गये हैं। आत्महत्या की धारा बढ़ा दी गयी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अवलोकन कर जल्द ही चार्जशीट लग जायेगी," रुरा थाना के सब इंस्पेक्टर अतुल गौतम ने फोन पर बताया।

जब उनसे ये पूछा गया कि एफआईआर लिखने में क्या जन्म प्रामाण पत्र लगने का कोई प्रावधान है? इस पर अतुल गौतम ने कहा, "नहीं ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जब वो लोग थाने में लिखित सूचना लेकर आये, वैसे ही एफआईआर लिख ली गयी थी। आरोपियों की गिरफ्तारी की दबिश उसी दिन से दी जा रही थी, छह दिसंबर को दो लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया गया था।"

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लड़की के मरने के बाद ही आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों की गई? इस पर उन्होंने कहा, "हमें ये जानकारी नहीं थी कि उसने आत्महत्या कर ली है, तब तक आरोपी गिरफ्तार कर लिए गये थे।"

जबकि अकबरपुर क्षेत्राधिकारी अर्पित कपूर ने इस बात को स्वीकार किया कि पीड़िता की मौत के बाद अरोपियों को गिरफ्तार किया गया।

पीड़िता के पिता अपनी बच्ची द्वारा लगाये पौधों को दिखाते हुए

नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली निकिता अपने पांच बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी थी। उसे पौधे लगाने और पूजा करने का बड़ा शौक था। उसकी तमाम यादें उसके छोटे से कच्चे मकान में आज भी कैद हैं। उसके लगाए गेंदे के पौधों में अब पीले फूल खिले हैं। तुलसी का वो पौधा भी लगा है, जिसकी वो रोज पूजा करती थी। उसकी साइकिल, उसके कपड़े देखकर उसकी मां का कलेजा फटता है।

पीड़िता के चाचा ने गुस्से में कहा,"बच्ची गरीब परिवार से है, पिता सफाईकर्मी हैं, मां बीमार रहती है, गिरा हुआ मकान है, शायद तभी उसकी मौत की खबर लखनऊ और दिल्ली में चर्चा का विषय नहीं बन पाई, नहीं तो अब तक इस बेटी को भी न्याय मिल जाता।"

घर के एक कोने में बैठी निकिता की मां बेटी की छींटदार काले सफेद रंग की टॉप लिए लगातार रोए जा रही थी। वे कहती हैं, "यही कपड़ा उसने उस दिन पहना था जिस दिन उसे तीन लोग उठाकर ले गये थे। जब तीन दिन बाद हमसे मिली तो उसके गर्दन और हाथों में नाखूनों के गहरे खरोंच थे। उसकी हालत मुझसे देखी नहीं जा रही थी, बहुत डरी हुई थी। मैं बहुत बीमार थी इसलिए उसे दिलासा भी न दे सकी।" इतना कहते हुए उन्होंने निकिता के कपड़ों को सीने से लगा लिया।

पीड़िता के मरने के बाद से उसके घर में खाना नहीं बना

सीढ़ियों पर बैठे निकिता के पिता कहते हैं, "जिन लोगों ने हमारी बेटी के साथ गलत काम किया, उसी में से एक लाला नाम के आदमी ने तीन साल पहले मेरी बीबी को दो तीन दिन तक बंधक बनाकर बलात्कार किया था। मामला थाने गया लेकिन काफी दिनों तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। आरोपी दबंग हैं, उनकी दबंगई की वजह से गांव में पंचायत बैठकर सुलह समझौता हो गया था। इस घटना के बाद मेरी पत्नी का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। अब उन्होंने हमारी बेटी को निशाना बनाया।"

वे अपनी बेटी की आदतें बताते हुए भावुक हो गये, "वह बहुत खुश मिजाज थी, जब मैं शाम को आता तो हंसकर बोलती, उसे देखकर दिनभर की थकान दूर हो जाती थी। रोज शाम चाय और सुबह नाश्ता बनाकर देती थी। स्कूटी खरीदने को बोल रही थी अब किसके लिए खरीदूंगा।"

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देशभर में अपराधों को दर्ज करने वाली संस्था एनसीआरबी की वर्ष 2017 की रिपोर्ट के अनुसार जितने भी रेप की घटनाएं दर्ज होती हैं उनमें से 93 प्रतिशत जानने वालों के द्वारा किए जाते हैं। अगर हाल की घटनाओं को देखें तो तकरीबन हर घटना में पुलिस की लापरवाही ही सामने आई। चाहे वो केस दर्ज करने में हो, या पीड़िता को संरक्षण देने में।

निकिता की ताई बताती हैं, "जिस बेटी को पाल पोसकर इतना बड़ा किया आज उसका ऐसे मरना बहुत अखरा। घटना के बाद से बिटिया एक भी दिन हमारे साथ नहीं रही। तीन दिन बाद जब वह जैसे ही घर आई वैसे ही थाने वालों ने मेडिकल और बयान के लिए महिला थाने ले गये, जहां उसे 13 दिन तक रखा गया। वहां से आई तो तुरंत अपनी चचेरी बहन की ससुराल चली गयी।"

वह आगे कहती हैं, "जब भी उससे थाने मिलने जाते थे वह हमारे कंधे को जोर से पकड़ लेती। उसने ये भी बताया एक महिला पुलिस बयान बदलने का दबाव बना रही थी। हम उसे झूठी तसल्ली देकर रोज वापस आ जाते थे कि जल्द ही उन्हें पकड़ लिया जाएगा और तुम्हे न्याय मिलेगा।"

पीड़िता की ताई इस घटना के लिए पुलिस को जिम्मेदार मानती हैं

इस केस के बारे में लखनऊ की वकील अंचल गुप्ता कहती हैं, "जब तक ऐसे गम्भीर मामलों में लापरवाही करने वाले अधिकारियों के खिलाफ पीड़ित परिवार शिकायत नहीं करेंगे, तब तक सुधार संभव नहीं है। अगर पीड़ित परिवार को कोई भी धमकी मिल रही है तो उसकी लिखित शिकायत दर्ज कराएं, मौखिक बातें मान्य नहीं होती।"

पीड़िता को पुलिस कस्टडी में रखने के बारे में अंचल कहती हैं, "ये अपराध है इसके खिलाफ भी शिकायत दर्ज होनी चाहिए। पुलिस पीड़िता के घर पर सुरक्षा उपलब्ध करा सकती है, उसे थाने में रखने का अधिकार नहीं है। ऐसे मामलों में जब तक जिम्मेदार लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, तबतक चीजें सुधरने वाली नहीं।"

निकिता के एक पड़ोसी बताते हैं, "ये केवल एक परिवार की बच्ची की मौत नहीं है बल्कि हमारे पूरे गांव की वो चहेती थी। दूसरी लड़कियां इस घटना के बाद से खौफ़ में हैं। सबसे ज्यादा दुःख इस बात का है कि बच्ची के मरते ही आरोपी गिरफ्तार हो गये। अगर ये पहले हो जाता तो वो मरती ही क्यों?"

वो आगे कहते हैं, "मुझे तो उन आरोपियों से ज्यादा पुलिस दोषी लगती है जिसने बच्ची के जिंदा रहते एक भी आरोपी गिरफ्तार नहीं किया।"


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