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एक किन्नर की कहानी... मैं भी कुछ बनना चाहती हूँ ... कई लाख लोग देख चुके हैं ये कहानी

इए अब उस किन्नर समाज की उस अंधेरी ज़िन्दगी पर नज़र डालते हैं जो मायूसी की कलम से और घृणा के आंसू से धुंधली पड़ी हुई है, न इनका कोई भाई-बहन है न कोई मां-बाप, ना ही कोई रिश्तेदार।

Deepanshu MishraDeepanshu Mishra   30 May 2019 9:27 AM GMT

किन्नर समाज, जो हमारे समाज के लिए रोज़ खुशियों की दुआ करता है ताकि उनका पेट भर सके, पर अफ़सोस लोगों के लिए दुआ करने वाले इसी किन्नर समाज को लोग या ये कहिए कि हमारा समाज घृणा और तंजिया तौर पर देखता है।

आइए अब उस किन्नर समाज की उस अंधेरी ज़िन्दगी पर नज़र डालते हैं जो मायूसी की कलम से और घृणा के आंसू से धुंधली पड़ी हुई है, न इनका कोई भाई-बहन है न कोई मां-बाप, ना ही कोई रिश्तेदार। हकीक़त तो यह है कि कोई इनके बारे में बात तक करना नही चाहता। जबकि ये रोज़ गले में ढोलक डाले अपनी ज़िन्दगी को खोजने निकलते हैं कि शायद नई सुबह के साथ इनकी ज़िन्दगी का भी नया आगाज़ हो।

कानपुर में रहने वाली किन्नर पूनम बताती हैं, "हम बच्चों के लिए दुआ करते हैं, बधाई लेते हैं। इसी से हमारा पेट भरता है और यही हमारी रोजी है। हमारे साथ यहाँ पर छह चेले रहते हैं और मैं उनकी मालिक हूँ, जितने चेले मेरे साथ रहते हैं उन सभी को मैं बच्चों की तरह मानती हूँ। इन लोगों को हम छोटे पर ही ले आते हैं, उन्हें पालते हैं, फिर वो भी नाचते-गाते हैं।"

"समाज में हमें अलग तरीके से देखा जाता है, लेकिन मैं भी जीना चाहती हूं और मैं भी एक इंसान हूं। किन्नर कहकर जब कोई बुलाता है तो बहुत बुरा लगता है, लेकिन न मैं इधर की हूँ, न उधर की हूँ, लेकिन जीना तो है ही। हमें न कोई नौकरी मिलती है और न ही कोई रहने का ठिकाना। हमारे घर में हमारे माता-पिता बहनें सब हैं। इन सब के होने के बावजूद भी समाज हमें उनके साथ नहीं रहने देता है। सब बोलते हैं ये किन्नर है इसको हटाओ समाज के डर से हमें अपना घर छोड़ कर जाना पड़ता है।"पूनम ने बताया।


पूनम बताती हैं, "मेरे पैदा होने के कई साल बाद तक मैं अपने माता-पिता के साथ रहती रही और मैंने हाईस्कूल तक पढ़ाई भी की है। पिता जी मेरे किसान हैं और मेरा भाई आर्मी में है, मेरी बहन की शादी हो गयी है। हाईस्कूल तक पढ़ाई करने के बाद हम लोग समाज में बदनामी के भय से खुद भाग आये और अपने किन्नर समाज में रहने लगे। आज भी घरवाले से मिलने जाती हूं, रात भर रुक कर चली आती हूं। मेरे किन्नर समाज में आने से पहले हमें परेशान बहुत ज्यादा किया गया था। चिल्लाना, मारना, सब होता था हमारे साथ ये सब झेलने की हिम्मत नहीं थी हमारे अन्दर और हम भाग कर किन्नर समाज में आ गये।"

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पूनम के साथ रहने वाली पूजा किन्नर बताती हैं, "जब मैं पंद्रह साल की हुई थी तो मैंने सोचा कि मैं कोई नौकरी कर लूं लेकिन कोई नौकरी नहीं मिलती थी। मैं घर में वापस रहने लगी, लेकिन किसी तरह मेरे गुरु को पता चल गया कि घर में किन्नर रहता है तो मेरे गुरु ने मेरे माता-पिता से बात की और मुझे अपने साथ लेकर आ गयी। घर से आने के बाद मेरे गुरु ही मेरे मां-बाप सब यही हैं। हमारे एक जानने वाली किन्नर हैं, जिन्हें कुछ समय पहले के होटल में किन्नर होने की वजह से कमरा नहीं दिया गया था, लेकिन साल 2011 में वो जज बन गयी थीं।"

'किसी के घर में कोई हम जैसा न पैदा हो'

"समाज में रहने वाले हर व्यक्ति को जैसे सम्मान मिलता है ठीक वैसे ही हम भी सम्मान चाहते हैं। हम सिर्फ एक दिन सम्मान नहीं चाहते हैं हम महीने के 30 दिन सम्मान की अपेक्षा करते हैं। हमें कोई कुछ भी बोले लेकिन हम हमेशा सब को यही दुआ देते हैं कि किसी के घर में कोई हम जैसा न पैदा हो।"पूजा ने बताया।

'हम फेसबुक, व्हाट्स ऐप चलाते हैं'

"मैं जब घर से भागी थी तो सबसे पहले बनारस पहुंची और वहां पर एक जगह खड़े होकर रो रही थी। एक जगह बधाई लेने आये किन्नर समुदाय के लोगों ने मुझे देखा और अपने बिरादरी का पाकर अपने साथ लेकर चले गये। उनके साथ हम तीन-चार साल रहे, उसके बाद हम भी बधाई लेने के लिए इधर-उधर जाने लगे। हमारी दिनचर्या सुबह साथ बजे से शुरू हो जाती है और बधाई लेकर दोपहर तक घर आ जाते हैं। इसके बाद जैसे एक व्यक्ति की साधारण जिंदगी होती है हम लोग भी वैसे ही जीते हैं। जबसे फ़ोन आ गया है हम फ़ोन भी प्रयोग करते हैं फेसबुक, व्हाट्सऐप सब चलाते हैं।"पूनम बताती हैं।


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