पंजाब हरियाणा के किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं? ये समझने के लिए अपने खाने की थाली और MSP पर सरकारी खरीद का आंकड़ा देखिए

नए कृषि कानूनों से किसानों का फायदा है या नुकसान? पंजाब, हरियाणा के अधिकतर किसान क्यों कृषि कानूनों का कर रहे विरोध? ऐसे कई सवाल देश में तमाम लोग कर रहे हैं, गांव कनेक्शन के एसोसिएट एडिटर अरविंद शुक्ला ने इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की, सिर्फ पढ़िए नहीं समझिए भी...

Arvind ShuklaArvind Shukla   8 Dec 2020 6:47 AM GMT

पंजाब हरियाणा के किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं? ये समझने के लिए अपने खाने की थाली और MSP पर सरकारी खरीद का आंकड़ा देखिएकृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई पंजाब कर रहा है, लेकिन अनाज का कटोरा कहे जाने वाले राज्य के किसान दिल्ली में क्यों डेरा डाले हैं? समझिए। फोटो- अमरजीत सिंह

लखनऊ/नई दिल्ली/संगरुर/करनाल। बहुत सारे लोगों के मन में सवाल है कि किसान आंदोलन में पंजाब और हरियाणा के ही किसान ज्यादा क्यों हैं? क्या कृषि कानूनों से उन्हें ही सबसे ज्यादा परेशानी है? इसका जवाब तलाशने के लिए आपको अपने खाने की थाली और सरकार द्वारा हर साल खरीदे जाने वाले धान-गेहूं के आंकड़ों को देखना होगा।

हम और आप सबसे ज्यादा क्या खाते हैं? रोटी चावल और सब्जियां, पंजाब और हरियाणा में लोग चावल बहुत कम खाते हैं लेकिन वे धान बहुत उगाते हैं। यहां उगा धान देश के बाकी हिस्सों के लोग खाते हैं। अन्न का कटोरा कहे जाने वाले पंजाब और हरियाणा देश की खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज का प्रमुख स्रोत हैं।

"पंजाब और हरियाणा का किसान जो धान उगाता है वह बाकी देश के लोग खाते हैं। दोनों ही राज्यों में खेती लोगों की कमाई का प्रमुख जरिया है और यहां खेती का मतलब धान-गेहूं है। जो सरकारी रेट (MSP) पर बिकते हैं। नए कानूनों से दोनों राज्यों को बने बनाए सिस्टम पर संकट दिख रहा है इसलिए वे विरोध कर रहे हैं।" कई राज्यों में किसानों के बीच काम कर रहे चंडीगढ़ के कमलजीत सिंह कहते हैं।

थाली के बाद अब जेब में रकम (धान खरीद से कमाई) की बात करते हैं। पंजाब में होशियारपुर जिले के मानखेडी गांव के चेत सिंह (55 वर्ष) ने अपना 100 क्विंटल धान मंडी में आढ़ती के जरिए 1 लाख 88 हजार रुपए में बेचा है। गांव कनेक्शन से चेत सिंह की मुलाकात 26 नवंबर को पटियाला-दिल्ली हाईवे पर फतेहगढ़ साहिब में हुई थी जहां वे कृषि बिलों को वापस लेने की मांग के समर्थन में दिल्ली कूच कर रहे थे, क्योंकि उन्हें लगता है आने वाले दिनों में नए कानून से मंडियां ध्वस्त हो जाएंगी, एमएसपी पर खरीद बंद हो जाएगी। चेत सिंह के गांव से 1,400 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश लखीमपुर जिले के पलिया तहसील के किसान राजिंदर सिंह (35 वर्ष) ने अपना 100 क्विंटल धान 1300 रुपए में एक चावल मिल को बेचा था। (नवंबर के पहले हफ्ते में जब गांव कनेक्शन की टीम पश्चिमी यूपी में धान खरीद पर स्टोरी कर रही थी बाजार भाव 1200 के आसपास था)। राजिंदर के पास और भी धान है जो वो अपनी लगातार बेच रहे थे। गांव कनेक्शन ने ऐसे 50 से ज्यादा किसानों से बात की थी।

चेत सिंह और राजिंदर सिंह के 100 क्विंटल के बीच का फर्क देंखे तो चेत सिंह को 1 लाख 88 हजार रुपए मिले जबकि राजिंदर सिंह को 1 लाख 30 हजार। निजी व्यापारियों के द्वरा खरीद की बात करें तो ये अंतर 58 हजार से बढ़कर 80 हजार तक पहुंच सकता है। क्योंकि यूपी बिहार में ये धान 900 रुपए से लेकर 1300 रुपए क्विंटल तक बिक रहा है।

धान खरीद को लेकर ये 5 दिसंबर तक का सरकारी आंकड़ा है। जो बताता है किस राज्य में कितनी खरीद हुई। ग्राफिक्स साभार- पीआईबी

किसान आंदोलन के समर्थन में भारत बंद से ठीक एक दिन पहले देश के उपभोक्ता मामले और खाद्य और सार्वजनिक वितरण ( भारत सरकार) मंत्री पीयूष गोयल ने एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, सरकार ने 6 दिसंबर तक पूरे देश से 344.86 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद की है। जो पिछले साल के 282.66 लाख मीट्रिक टन से 22 फीसदी ज्यादा है। इस खरीद से 35 लाख किसानों को 65.111 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है। इसमें पंजाब का योगदान 59 फीसदी है।

पीयूष गोयल, किसानों के साथ सरकार की लगातार हो रही वार्ताओं में भी शामिल हैं। केंद्रीय मंत्री ने इस खरीद सीजन में बाकी राज्यों का प्रतिशत नहीं दिया है लेकिन पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) भारत सरकार की 6 दिसंबर की विज्ञप्ति के अऩुसार 5 दिसबंर 2020 तक पूरे देश में जो 336.67 लाख मीट्रिक टन की खरीद हुई है उसमें से 60.23 फीसदी पंजाब (202.77 लाख मीट्रिक टन), हरियाणा से 17 फीसदी, उत्तर प्रदेश से 8 फीसदी, तेलंगाना से 7 फीसदी, उत्तराखंड से 3 फीसदी, ओडिशा, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु से 1-1 फीसदी है जबकि अन्य राज्यों का प्रतिशत 2 फीसदी है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पंजाब और यूपी में तुलना करें अनुसार 5 दिसंबर तक पंजाब में 202.77 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद हुई थी, जबकि यूपी में धान खरीद के लिए नोडल एजेंसी खाद्य एवं रसद विभाग उत्तर प्रदेश की वेबसाइट के अनुसार 7 दिसंबर को शाम चार बजे तक 28.46 लाख मीट्रिक टन की धान खरीद हो चुकी थी। यूपी ने इस साल 55 लाख मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य रखा है, जबकि पंजाब सरकार ने 178 लाख मीट्रिक टन की खरीद की तैयार की थी। धान खरीद पर गांव कनेक्शन की वीडियो रिपोर्ट देखिए

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) यानि वह सरकारी रेट जो 23 फसलों के लिए हर साल रबी और खरीफ के सीजन के लिए केंद्र सरकार तय करती है। जैसे इस बार धान की एमएसपी एक ग्रेड धान (उच्च क्वालिटी धान) की 1888 और सामान्य धान के लिए 1868 रुपए प्रति क्विंटल (क्विंटल) थी। किसानों के आंदोलन, भारत में कृषि संकट के संदर्भ में ये एमएसपी बहुत बड़ा फैक्टर है।

पंजाब देश के दूसरे राज्यों के किसानों की खेती, खरीद सिस्टम, मंडी व्यवस्था आदि समझने के लिए एमएसपी पर खरीद को समझना आवश्यक है।

आंदोलन में पंजाब हरियाणा के लोग ही ज्यादा क्यों? देश के प्रख्यात खाद्य एवं निर्यात नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा मोहाली से गांव कनेक्शन को पर जवाब देते हैं, " सरकारी रिपोर्ट ही कहती हैं कि देश में 6 फीसदी को एमएसपी मिलता है 94 को नहीं मिलता है। वो जो 6 फीसदी है, उनमें ज्यादातर लोग पंजाब और हरियाणा के हैं। पंजाब में 97 फीसदी के आसपास धान की सरकारी खरीद होती है और 75-80 फीसदी गेहूं की खरीद होती है, बिहार में एक फीसदी और यूपी में 7 फीसदी से कम खरीद होती है। राजस्थान में 4 फीसदी के आसपास खरीद होती है। शरद पवार जब कृषि मंत्री थे उन्होंने सदन में कहा था कि 71 फीसदी लोगों को पता ही नहीं कि एमएसपी क्या है तो, जिन्हें एमएसपी पता ही नहीं, जिन्हें उसका फायदा ही नहीं मिला वो संघर्ष क्यों करेंगे। वो बेचारे खुले बाजार की दया पर आश्रित हैं। अगर सरकारों ने मार्केट का जाल फैलाया होता तो उन्हें भी एमएसपी का फायदा मिलता।"

पंजाब की मंडियों में धान-गेहूं आने के बाद आढ़तिए उसे छानते,पैक करते और ढुलाई कर खरीदते हैं, फिर से सरकारी एजेसियों और मिलों के माध्मय से FCI को भेजा जाता है। फोटो-अरेंजमेंट

सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में बीजेपी सांसद शांता कुमार की अगुवाई में एक हाईलेवट कमेटी का गठन किया था जिसनें भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और एमएसपी को लेकर 2015 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, ये रिपोर्ट कहती है कि साल 2012-13 में गेहं धान की बिक्री को लेकर जो औसतन आंकड़े जारी किए थे उसका मतलब था कि 90.2 मिलियन (9 करोड़ 2 लाख) मौजूदा किसान थे, उनमें से सिर्फ 5.8 फीसदी किसानों ने ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी उपज सरकारी एजेंसियों को बेची थी। साल 2016 में आई सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग की एमएसपी पर एक रिपोर्ट के अनुसार 81 फीसदी किसानों को यह मालूम था कि सरकार कई फसलों के पर एमएसपी देती है, लेकिन बुवाई सीजन से पहले सही कीमत से 10 फीसदी किसान ही वाकिफ थे।

75 जिलों वाले उत्तर प्रदेश के ज्यादातर जिलों में (बुंदेलखंड को छोड़कर) धान की खेती होती है, यहां पर सरकार ने 4339 धान खरीद केंद्र बनाए हैं। वहीं 22 जिलों वाले पंजाब में 4007 सेंटर बनाए थे कोविड के पहले इनकी संख्या 1850 थी।

पंजाब में खाद्य, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामलों की निदेशक अनिन्दिता मित्रा, गांव कनेक्शन को फोन पर बताती हैं, " हमारी कोशिश रहती है किसान का एक एक दाना एमएसपी पर खरीदा जाए। इसके लिए राज्य एजेंसियों को पहले से मंडियों का अलाटमेंट कर दिया जाता है। आढती के माध्यम से जो धान पंजाब सरकारी एजेंसियां खरीदती है वो 4700 धान मिल के जरिए कुटाई के बाद एफसीआई को पहुंचता है। इस बार राज्य ने 178 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद थी लेकिन खरीददारी उससे कहीं ज्यादा हो हो चुकी है।"

पंजाब सरकार के आंकड़ों के अनुसार पंजाब में 2014-15 में 28.95 लाख हेक्टेयर में धान की खेती हुई थी तो 2019-20 में ये आंकड़ा बढ़कर 29.20 लाख हेक्टेयर हो गया था, जबकि अनुमानित उत्पादन 175.84 लाख टन था।

अनुमानित उत्पादन से कहीं ज्यादा की खरीद पर अनिन्दिता मित्रा कहती हैं, "जो उत्पादन या बाजार या मार्केट सरप्लस उत्पादन की बात होती है वो अनुमान पर होती है। लेकिन असल में धान जब मंडी आता है तब पता चलता है कि उपज कितनी हुई। पंजाब कृषि विश्वविद्यालन ने भी इस बार क्रॉप कटिंग एक्सपेरमिंट (खड़ी फसल में फसल का निर्धारित हिस्सा काटकर उसका उत्पादन निकालना) में बताया था कि 10.50 फीसदी उत्पादन बढ़ सकता है। दूसरी बात हरियाणा के बॉर्डर के जो जिले हैं वहां आढ़ती कई बार एक होते हैं इससे पंजाब के काफी किसान हरियाणा में धान बेच आते थे। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया जिससे करीब 10 लाख मीट्रिक टन धान और पंजाब की मंडियों में आया।"

पंजाब में बंपर उत्पादन और हरियाणा में बिक्री न होने के साथ एक और फैक्टर है। यूपी बिहार से धान सैकड़ों ट्रक धान औने-पौने दाम में खरीदकर पंजाब में बेचा गया। गांव कनेक्शऩ ने इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट की थी।

बाहर से आने वाले धान को रोकने और हरियाणा के किसानों को लाभ देने के लिए हरियाणा सरकार ने मेरा फसल मेरा ब्योरा साफ्टवेयर लॉन्च किया था, जिसमें जमीन की डिटेल (खसरा खतौनी) देना अनिवार्य था। जिससे बाहर के लोग न के बराबर धान बेच सके। लेकिन पंजाब में ऐसा नहीं था इसलिए यूपी बिहार के सैकड़ों ट्रक पंजाब में पकड़े गए और लोगों पर रिपोर्ट दर्ज की गईं।

अनिन्दिता मित्रा बताती हैं, "पंजाब में मंडी बोर्ड की तरफ से अब तक 95 रिपोर्ट ट्रक और ट्रालियों पर दर्ज करवाई गई हैं जबकि खाद्य विभाग ने एक रिपोर्ट एक ट्रेडर (कारोबारी) पर दर्ज की है, जिसने धान का भंडारण कर रखा था।" ये धान यूपी और बिहार का बताया जा रहा था।

अक्टूबर में कराए गए गांव कनेक्शन के सर्वे में 39 फीसदी लोगों ने कहा कि नए कानून से आने वाले समय में मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी। ग्राफिक्स गांव कनेक्शन

अध्यादेश के माध्यम से लाए गए कृषि कानूनों के लेकर किसान संगठनों के विरोध और सरकार की दलीलों के बीच देश के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन 16 राज्यों में 5022 किसानों के बीच रैपिड सर्वे करवाया था। 3 से 9 अक्टूब के बीच हुए इस फेस टू फेस सर्वे में 67 फीसदी किसानों कृषि कानूनों को लेकर जागरुक थे। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के किसान सबसे ज्यादा जागरूक हैं और बिलों को लेकर विरोध भी यहां सबसे ज्यादा है। विस्तृत सर्वे रिपोर्ट यहां पढ़ें

दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे किसानों में सबसे ज्यादा किसान पंजाब हरियाणा के क्यों हैं? यही सवाल गांव कनेक्शन ने गाजियाबाद में रहने वाले देश के वरिष्ठ ग्रामीण पत्रकार और संसदीय मामलों के जानकार अरविंद कुमार सिंह से किया। उनके मुताबिक विरोध पूरे देश में है लेकिन पंजाब और हरियाणा दिल्ली से भागौलिक रूप से सबसे नजदीक हैं और एमएसपी पर सबसे ज्यादा खरीद भी इन्हीं राज्यों से होती है।

अरविंद कुमार सिंह कहते हैं, "पंजाब हरियाणा आकार में बहुत छोटे हैं लेकिन देश की खाद्य सुरक्षा का बड़ा जिम्मा इनपर है। जो गरीबों को राशन पहुंचता है उसका बड़ा भाग इन राज्यों से खरीदा जाता है। यहां भी एमएसपी के नाम पर गेहूं और धान हैं। मक्का तो यहां भी 1800 वाली 1200 में बिक रही है। इन किसानों को डर है अगर ये खरीद बंद हो गई तो वो क्या करेंगे, पंजाब के लोग खेती में काफी पैसा लगाते हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि मंडी में फसल बिक जाएगी। नए कानूनों से उन्हें मंडी और एमएसपी दोनों पर खतरा लग रहा है।"

कोरोना की आपदा के दौरान केंद्र सरकार ने दीवाली तक 80 करोड़ लोगों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत जो राशनकार्ड की सहायता से हर महीने 2 रुपए किलो गेहूं और 3 रुपए किलो चावल (प्रति यूनिट) दिया है, उसका बड़ा हिस्सा पंजाब और हरियाणा में सरकार द्वारा गए गेहूं धान से था, क्योंकि यही राज्य सेंटर पूल में सबसे ज्यादा योगदान करते हैं जैसा कि ऊपर खाद्य मंत्रालय के आंकडे दिए गए हैं।


बिजनेस स्टैंडर्ड के कृषि संपादक संजीब मुखर्जी गांव कनेक्शन के टॉक शो गांव कैफे में खाद्य सुरक्षा और किसान आंदोलन को लेकर चर्चा में कहते हैं, "अगर सिर्फ और चावल और गेहूं को देखेंगे तो ये हमारे लिए डिमांड से इतना ज्यादा है कि हर साल सड़ता है। लेकिन ये खरीद फूड सिक्योरिटी के लिए बहुत जरुरी है। वो जरुरत है पिछले 50-60 वर्षों से पंजाब-हरियाणा के किसान पूरी करते आ रहे हैं।"

मंडियों के विस्तार और एमएसपी पर नए तरीके सोचने की वकालत करते हुए मुखर्जी कहते हैं, "पंजाब-हरियाणा के लिए खेती सिर्फ व्यवसाय नहीं, खेती से उनके पारिवरिक मूल्य जुड़े हैं। हम इतना बड़ा कोविड इसलिए झेल गए क्योंकि हमारे गोदाम अनाज से भरे हुए थे। वो गोदाम जो पंजाब,हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों ने भरे थे। जिनके पास ये भंडारण नहीं है, वहां कितनी मुश्किल हुई, अफ्रीकन देशों को देखिए वहां हाहाकार मचा है। पाकिस्तान में गेहूं के लिए रेट कहां पहुंच गए। लेकिन भारत ने 80 करोड़ लोगों को राशन दिया, ऐसे में हमें इस सिस्टम को नजर में रखना होगा।"

पंजाब और हरियाणा की सबसे बड़ी खूबी वहां का मंडी सिस्टम है। पंजाब में 5-6 किलोमीटर पर मंडियां हैं, उनमें भी अपनी तरह की अनाज मंडिया हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक पंजाब में करीब 1850 खरीद केंद्र, 152 बड़ी मंडियां (अनाज मंडी) और 28,000 के आसपास रजिस्टर्ड आढ़तियां हैं। इन मंडियों में 2-3 लाख मजदूर ढुलाई, छनाई, पैकिंग आदि का काम करते हैं। ये सब मिलकर करीब 20 लाख किसानों से खरीद फरोख्त करते हैं। हालांकि कोविड के चलते गेहूं खरीद के दौरान ही खरीद केंद्रों की संख्या 4000 से ज्यादा कर दी गई थी जो धान के दौरान भी जारी है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 2477 बड़ी एपीएमसी (कृषि उपज एंव बाजार समिति) हैं जबकि 4,843 उप एपीएमसी हैं। कृषि सुधारों के लिए यूपीए सरकार में बनाए गए स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक देश में 42000 मंडियों की जरुरत है।

किसान एक बार अपनी उपज (खासकर गेहूं धान) लेकर मंडी पहुंच गया तो उनका एमएसपी पर बिकना तय है। लेकिन बाकी राज्यों में ना तो ऐसे मंडिया हैं और ना ही खरीद की वो व्यवस्था। आदर्श पशुपालक सोयायटी (यूपी) के चेयरमैन महक सिंह तरार जो शामली जिले के किसान और पशुपालक हैं पंजाब की मंडियों को खेती और किसानों के लिए क्रांतिकारी कदम बताते हैं। वे कहते हैं, "पंजाब हरियाणा में मंडी सिस्टम सर छोटू राम ने 1939 में लागू करवा दिया था। मंडी दो तरह की होती हैं। एक सब्जी मंडी और एक अनाज मंडी। अविभाजित पंजाब (पंजाब, हरियाणा और हिमाचल, पाकिस्तान के हिस्से वाला पंजाब) में जैसा मंडियों विकास हुआ वैसा कहीं नहीं हुआ। पंजाब में आज भी 173 एपीएमसी मंडिया हैं। देश के बाकी हिस्सों में या तो मंडिया नहीं है या फिर सब्जी मंडियां हैं। अब नए कानून (कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून 2020) से जिस इलाके में सबसे ज्यादा मंडियां हैं, वहां अगर पैरलर (समांतर) मंडियां खड़ी होंगी तो नुकसान यहीं होगा इसलिए किसान संघर्ष कर रहा है।'

दूसरे राज्यों और पंजाब हरियाणा के विरोध पर बात करते हुए वो आगे कहते हैं, जहां ज्यादा मंडियां होगी वहां ज्यादा आमदनी होगी आप पंजाब और बिहार की आय देख लीजिए। रही बात किसान की लड़ाई लड़ने की तो कोई भी किसान जो खाली पेट है वह लड़ाई नहीं लड़ सकता है। क्योंकि उसे शाम के चूल्हा जलने की टेंशन होती है। हरियाणा पंजाब के किसान का आधा पेट भरा है आधा खाली है। यहां के किसानों में लड़ने की हिम्मत है। इसीलिए लड़ पा रहा है। कई राज्यों में बाकी किसानों को सरकार की नीतियों ने मजदूर बना दिया है वो बेचारा क्या संघर्ष करेगा।"

पंजाब हरियाणा के खेती और दूसरे राज्यों की खेती में काफी अंतर है। हरित क्रांति पंजाब हरियाणा में हुई और यहां गेहूं धान की सघन खेती शुरु हुई जबकि महाराष्ट्र की बात करें तो वहां पश्चिमी महाराष्ट्र गन्ना ज्यादा होता है। तो नाशिक और पुणे के इलाकों में प्याज, अंगूर और सब्जियों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। मराठवाड़ा में ज्वार बाजरा, सोयाबीन है। विदर्भ साइड में कपास और संतरे की खेती बड़े पैमाने पर होती है। केरल में कैश क्रॉप के रुप में सुपारी, नारियल कालीमिर्च और दूसरे सब्जी मसाले हैं, ऐसे ही कई राज्यों में वहां की स्थानीय कैश क्रॉप हैं जो एमएसपी और मंडी पर ज्यादा निर्भर नहीं है लेकिन पंजाब और हरियाणा में गेहूं धान है जो मंडी पर निर्भर है।


तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने और एमएसपी पर कानून बनाने की मांग को लेकर दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन में हरियाणा पंजाब के किसानों की तीन तीन पीढ़ियां (जवान, बूढ़े और बच्चे) शामिल हैं वो घर से राशन लेकर आए हैं तो पीछे से खाने और जरुरी चीजों की सप्लाई लगातार जा रही है।

आंदोलन क्यों की वजह तसालते हुए पंजाब और हरियाणा के शंभू बॉर्डर पर मिले राम सिंह (50 वर्ष) की बातें याद आती हैं, "लानी थी स्वामीनाथन की रिपोर्ट आप ले आए तीन बिल, कैसे स्वीकार करें। ये कानून हमारी मंडियों को खत्म करने की साजिश है, बिहार में मंडी कानून खत्म होने के बाद जो हुआ, वह हम पंजाब में नहीं होने देंगे।"




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