आजादी के 70 साल : बुलंदशहर का वो चौक जो बना था 1857 की क्रान्ति का गवाह

आजादी के 70 साल : बुलंदशहर का वो चौक जो बना था 1857 की क्रान्ति का गवाहबुलंद शहर स्थित कालाआम चौक (फोटो साभार : इंटरनेट)

बुलंदशहर में काला आम नाम का चौराहा जंग ए आजादी का मुख्य गवाह है जहां 1857 क्रांति के दौरान अंग्रेजों का विरोध करने वालों को पकड़-पकड़कर मौत के घाट उतार दिया गया था। जो लोग कम्पनी राज के खिलाफ आवाज उठाते थे, उन्हें चौराहे पर स्थित एक आम के पेड़ पर लटककर उन्हें फांसी दे दी जाती थी।

कई क्रांतिकारियों को यहां कत्ल कर दिया गया। समय के साथ यह जगह 'कत्ले आम चौक' और बाद में 'काला आम' के नाम से जानी गयी और आजादी के बाद लोगों ने सरेआम कत्ल के गवाह रहे इस पेड़ को कटवा दिया। काला आम पर बना शहीद स्मारक आज भी लोगों को शहीदों की याद दिलाता है।

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बताया जाता है कि स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर आजादी मिलने तक बुलंदशहर ने आजादी की लड़ाई में पूरे दम-खम से भाग लिया। 10 मई 1857 को देश की आजादी की प्रथम जंग शुरू हुई। बुलंदशहर जिले में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल वीर गूजरों ने फूंका। यहां अंग्रेजों और स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ कई बार युद्ध छिड़ा। कभी गूजरों को जेल भेजा गया तो बाकी लोगों में इसका जबर्दस्त विरोध हुआ। विद्रोह देखकर अंग्रेजी सेना भी दहशत में आ गई। 31 मई से 28 सितंबर तक बुलंदशहर अंग्रेजी दासता से मुक्त रहा लेकिन इस बीच कई जमींदार अंग्रेजों से जा मिले।

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इस वजह से अंग्रेजी सेना को दोबारा से बुलंदशहर में कूच करने का मौका मिल गया। 28 सितंबर को इस बुलंदशहर में आजादी के चाहने वाली सेना और अंग्रेजी सेना में घमासान युद्ध् हुआ। अंग्रेज विजयी हुए और बुलंदशहर पर फिर से अधिकार कर लिया। इसके बाद बुलंदशहर अंग्रेजों के आंख पर चढ़ गया और चुन-चुन कर क्रांतिकारियों का कत्ल किया जाने लगा। वर्ष 1857 से 1947 के दौरान काला आम कत्लगाह बना रहा। इस दौरान हजारों क्रांतिकारी को यहां फांसी दी गई।

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