चांद पर पहुंचने में लगेंगे 48 दिन, जानें चंद्रयान-2 से जुड़ी खास बातें

चांद पर पहुंचने में लगेंगे 48 दिन, जानें चंद्रयान-2 से जुड़ी खास बातें

लखनऊ। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) ने चंद्रयान-2 को सोमवार दोपहर 2.43 बजे लॉन्च कर दिया। इससे पहले 15 जुलाई को रात 2.51 बजे चंद्रयान-2 को लॉन्च किया जाना था, लेकिन कुछ तकनीकी खामी के कारण रॉकेट को लॉन्च से 56.24 मिनट पहले रोक दिया गया था। अब चांद पर जाने के लिए लॉन्चिंग के बाद चंद्रयान-2 को चांद पर पहुंचने में 48 दिन ही लगेंगे। यहां हम आपको चंद्रयान 2 से जुड़ी खास बताने जा रहे हैं।

चंद्रयान-2 भारत के लिए दूसरा सबसे महत्वाकांक्षी चंद्र मिशन है। इसे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से भारी-भरकम रॉकेट जियोसिन्क्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल-मार्क 3 (GSLV Mk-III) से लॉन्च किया गया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 640 टन का जियोसिन्क्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल-मार्क 3 (GSLV Mk-III) रॉकेट 44 मीटर लंबा है। इस रॉकेट में 3.8 टन का चंद्रयान है। रॉकेट को 'बाहुबली' उपनाम दिया गया है। इसमें 3.8 टन का चंद्रयान रखा गया है।

चंद्रयान-2 का बजट 978 करोड़ रुपये है और इसका मकसद भारत को चंद्रमा की सतह पर उतरने और उस पर चलने वाले देशों में शामिल करना है। 'चंद्रयान-2' के लॉन्च के साथ ही भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बन जाएगा, जिन्होंने चंद्रमा पर खोजी यान उतारा।

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चंद्रयान 2 जुलाई 15 को लॉन्च होना था जिससे चांद पर उतरने की संभावित तारीख 6 सितंबर बताई जा रही थी। पहले ये मिशन 54 दिन में पूरा होना था हालांकि तकनीकी खराबी के कारण मिशन को 7 दिन बाद लॉन्च किया जा रहा है। चंद्रयान 2 लॉन्चिंग में हुए समय के परिवर्तन के कारण चांद पर पहुचने की तारीख में कोई खास बदलाव नहीं किया गया है।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार 'चंद्रयान-2' में मौजूद 1.4 टन का लैंडर 'विक्रम' अपने साथ जा रहे 27-किलोग्राम के रोवर 'प्रज्ञान' को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर दो क्रेटरों के बीच ऊंची सतह पर उतारेगा। लैंडिंग के बाद, 'प्रज्ञान' चांद की मिट्टी का रासायनिक विश्लेषण करेगा। वहीं 'विक्रम' चंद्रमा की झीलों को मापेगा और अन्य चीजों के अलावा लूनर क्रस्ट में खुदाई भी करेगा।

वर्ष 2009 में चंद्रयान-1 के ज़रिये चंद्रमा की सतह पर पानी के अणुओं की मौजूदगी का पता लगाने के बाद से भारत ने वहां पानी की खोज जारी रखी है, क्योंकि चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी से ही भविष्य में यहां मनुष्य के रहने की संभावना बन सकती है। अब तक इसरो ने 3 जीएसएलवी-एमके 3 रॉकेट भेजे हैं। पहला रॉकेट 18 दिसंबर 2014 को, दूसरा 5 फरवरी 2017 को और तीसरा 14 नवंबर 2018 को भेजा गया है।

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