हरसाना कलां गाँव : टप्पर गाड़ी में चढ़कर जाते थे नानी के घर

हरसाना कलां गाँव : टप्पर गाड़ी में चढ़कर जाते थे नानी के घरमेरा गाँव कनेक्शन सीरीज़ - भाग चार ।

हमारा गाँव हमको अपने से दूर नहीं जाने देता है। गाँव की ताज़ी हवा और बारिश में गीली होकर महकती मिट्टी, ट्यूबवेल से झर-झर निकलता पानी और रात में जलते अलाव मानो हमें अपने पास बुलाते हैं। 'मेरा गाँव कनेक्शन' सीरीज़ आपकी यादों का वो कोना है, जहां आपने अपने गाँवों से जुड़ी यादों को संभाल कर रखा है।

गाँव बायोडाटा -

गाँव- हरसाना कलां

ज़िला - सोनीपत

राज्य - हरियाणा

नज़दीकी शहर - सोनीपत

गूगल अर्थ पर हरसाना कलां गाँव का नक्शा -

हरसाना कलां गाँव -

हरसाना कलां गाँव हरियाणा राज्य के सोनीपथ जिले में रोहतक रोड से सटा हुआ है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार इस गाँव में 5,133 लोगों की आबादी है, जिसमें 2,701 पुरुष हैं, जबकि 2,432 महिलाएं हैं। गाँव में रहने वाली 73 प्रतिशत महिलाएं शिक्षित हैं। इस क्षेत्र में एक खास किस्म का लोकनृत्य ‘घूमर’ मशहूर है। यह गीत मुख्यरूप से महिलाएं गाती हैं जब वो कुएं से पानी भरने जाती हैं।

गाँव की यादें -

सीरीज़ के चौथे हिस्से में आज चलते हैं हरियाणा के ‘हरसाना कलां’ गाँव में , जहां अपने बचपन से जुड़ी यादें बता रही हैं माला शर्मा

रात में खुले आसमान की नीचे सोते समय नानी कहानियां सुनाती थी

आज भी आंखें मूंदू , तो सब कुछ ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। नानी के घर में बिताए वो बचपन के दिन ज़िंदगी के सबसे सुहाने दिन थे। उसका सबसे बड़ा कारण है गाँव । उसकी यादें सिर्फ़ यादें नहीं , उस गाँव ने मुझे बनाया, उन खेतों की मिट्टी की खुशबू आज भी मेरी सांसों में बह रही हैं।

दिल्ली की बस, सड़क पर छोड़ देती थी और वहां से शुरू होता था गाँव का सफ़र। उस समय बैलगाड़ी ही एकमात्र साधन था गाँव तक जाने का। टप्पर गाड़ी में बैठकर घर तक पहुंचने में लगभग आधे गाँव के बच्चे गाड़ी के पीछे भाग रहे होते थे । बस यूंही.....शोर मचाते हुए और हम दिल्ली वाले शर्म से सिकुड़े जाते थे ।

नानी का घर।

खेत-खलिहानों को पार करते रास्ते में एक जोहड़ आता था, जिसमें बच्चे भैंसों के साथ स्वीमिंग कर रहे होते थे, कुछ बच्चे गाड़ी के पीछे भागना छोड़ उसमें कूद पड़ते। कोई भैंस की पूंछ पकड़कर तो कोई उसके ऊपर बैठकर मस्ती कर रहा होता था । जोहड़ के किनारे एक बड़ा विशाल बरसों पुराना पीपल का पेड़ था। उसके चारों ओर एक चबूतरा बना था । औरतें वहां पर पीपल की पूजा करती थीं या कोई भी थकने पर वहां चैन की सांस लेने बैठ जाता था।

हरसाना कलां गाँव के खेत-खलिहान।

आधा कच्चा, आधा पक्का बड़ा सा वो घर जिसके बीचोंं बीच नीम का पेड़ था, जिस पर न जाने कितने पक्षियों का बसेरा था । घर के पिछवाड़े था एक रहट वाला कुआं। कुआं क्या था, गाँव की जवान लड़कियों और नई नवेली बहुओं की रैंप वॉक का वो स्टेज था। वो हम सारे, ममेरे-मौसेरे बहन-भाईयों की फ़ेवरेट प्लेस थी। वैसे तो ये शायद पूरे गाँव के जवान लड़कों की तांका-झांकी की जगह भी थी। लेकिन मेरी नानी के होते ये मुमकिन नहीं था कि कोई वहां आ सके। उनकी पूरी पहरेदारी रहती थी कि लड़कियों और बहुओं को कोई आंख उठा कर भी देख न पाए। बस हम बच्चों को ही वहां बैठने की इजाज़त थी। शाम होते ही नई बहुएं दस गज के रंगबिरंगे घाघरे लहरातीं, पैरों में छैल-कड़ुले छमकातीं, सिर पर दोघड़ रखे, गीत गाती हुई, चार- चार, पांच-पांच के झुंड में आने लगतीं.......

रहट वाला कुअां।

मेरे सिर पे बंटा टोकणी ........

मेरे हाथ में नेजू डोर .......

मैं पतली सी कामिनी .........

उनके पैरों की छन-छन और टोकनी पर टिक टिक करते उन गीतों के सामने किसी भी बॉलीवुड के डिजीटली कम्पोज़्ड और ट्रेंड वॉईस में गाए गाने पानी भरते हैं । नई नवेली शर्माती बहुओं के घूंघट में उनके चेहरे देखने की लालसा ऐसी थी जो आज किसी सैलीब्रिटी के लिए भी नहीं होती।

हरसाना गाँव में रहने वाली महिलाओं की वेशभूषा।

रात को आंगन में लाईन से खाटें बिछा कर सोते तो नानी सारा खगोल पढ़ा देतीं....... सप्तऋषि मंडल, ध्रुव तारा और न जाने क्या-क्या। सुबह नानी की मथनी की आवाज़ से आंख खुलती, जिनके घर में गाय-भैंस नहीं थी, वो लाईन लगाकर छाछ ले जाते। उसका कोई मोल नहीं था, वो सबके लिए बराबर था।

एक बात जो कभी नहीं भूलती वो थी नानी की वैद्यगिरी ! घाव हो गया तो ग्वारपट्ठा (यानि एलोवेरा ) गरम कर के बांध दिया। फ़ोड़े-फुंसी हो गए तो नीम की छाल घिस कर लगा ली, सब ठीक हो जाता था। सुबह गाँव की औरतें नन्हें-नन्हें दूध पीते बिलखते बच्चों को लेकर आ जातीं , नानी सरसों का तेल गर्म कर रख लेतीं और बच्चे को गोद में लेकर बड़े प्यार से तेल मलतीं और उसके हाथ-पैर हिला कर कंधे से लगा लेतीं। बच्चा बिल्कुल चुप होकर माँ की गोद में हंसता रहता । उसमें हर जाति और धर्म के लोग होते थे। कितनी ही बार नानी को रात में कोई आवाज़ लगाता........ दादी जल्दी चलो बच्चा सांस नहीं ले रहा।

नानी उसके घर जाकर तब तक रहती, जब तक कि बच्चा ठीक न हो जाता। सवर्ण जाति की नानी ने कभी ये नहीं सोचा कि वे ऊंची जाति की हैं या वो नीची जाति के। आज जब मैं कोई ऐसा किस्सा सुनती हूं, जो किसी विशेष जाति पर कोई दूसरी जाति को नीचा दिखाती है क्योंकि उनकी जाति अथवा धर्म भिन्न है तो मुझे शर्म आती है कि क्या हम सच में उन्नति कर रहे हैं ? या पीछे जा रहे हैं ।

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माला शर्मा की तरह अगर आपके मन में भी हैं अपने गाँव से जुड़ी यादें, तो उन्हें हमारे साथ साझा करें, आख़िर यही तो है हम सबका गाँव कनेक्शन।

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