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जानिए क्यों पड़ी अज़ान देने के लिए लाउडस्पीकर की जरूरत और क्या हैं अज़ान के मायने ?

Anusha MishraAnusha Mishra   22 April 2017 5:08 PM GMT

जानिए क्यों पड़ी अज़ान देने के लिए लाउडस्पीकर की जरूरत और क्या हैं अज़ान के मायने ?प्रतीकात्मक तस्वीर

लखनऊ। जबसे सोनू निगम ने अज़ान में प्रयोग होने वाले लाउस्पीकर पर आपत्ति उठाई है तबसे अज़ान और इसकी जरूरत को लेकर तमाम तरह के सवाल किए जा रहे हैं। मसलन, पांच वक्त अज़ान क्यों देते हैं, अज़ान को इतनी तेज आवाज में क्यों दिया जाता है, अज़ान देने की क्या जरूरत है वगैरह-वगैरह। तो चलिए हम आपको बताते हैं कि आखिर अज़ान क्या और कैसे शुरू हुआ था अज़ान देने का सिलसिला।

अखिल भारतीय मुस्लिम महिला नि़जी कानून बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अम्बर बताती हैं कि दरअसल, नमाज के लिए लोगों को बुलाने के लिए इस्लाम में ऊंचे स्वरों का प्रयोग किया जाता है और इन्हीं को अज़ान कहा जाता है। जो व्यक्ति नमाज पढ़ाता है उसे मुअज्जिन कहा जाता है। मुअज्जिन हर दिन पांच वक्त अज़ान देता है। हर मस्जिद में पांच वक्त की अज़ान दी जाती है जिसके उद्देश्य होता है यह बताना कि हर मस्जिद, हर मुसलमान के लिए है और वह किसी भी मस्जिद में जाकर नमाज अदा कर सकता है। साथ ही अज़ान इस्लामी विश्वास के बारे में सहजता से कम शब्दों में लोगों को बताती है जिससे लोग ईमानदारी और सच्चाई के साथ अल्लाह के रास्ते में चलते रहें।

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अज़ान में कहा जाता है कि अल्लाह महान है। अल्लाह के अलावा दूसरा कोई सर्वोच्च नहीं है। पैगंबर मुहम्मद (सलअल्लाहु अलैहि वसल्लम) के दूत हैं। आस्था के बयान को कलीमा कहा जाता है और यह इस्लाम के पांच सिद्धातों में से पहला है।

मुअज्जिन

मुअज्जिन वह व्यक्ति होता है जो मस्जिद में अज़ान देता है। मुअज्जिन का चुनाव उसकी प्रतिभा के आधार पर किया जाता है जैसे, वह कितनी मधुरता से अच्छी और तेज आवाज में अज़ान दे सकता है। मुअज्जिन का काम मस्जिद में सबसे अहम होता है क्योंकि वह अपने समुदाय के लोगों को यह बताता है कि अब प्रार्थना यानि नमाज का समय हो गया है। सबको अल्लाह की प्रार्थना करने के लिए एकजुट होना चाहिए।

अज़ान की शुरुआत

शाइस्ता अम्बर ने बताया कि जब सबसे पहले मदीना में नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद बनाई गई तो इस बात की जरूरत महसूस की गई कि लोगों के नमाज का समय याद दिलाने और एक जगह इकट्ठा करने का कोई उपाय होना चाहिए। पैगंबर मोहम्मद (सल.) ने जब इस बारे में सहाबा इकराम यानि धर्म मित्रों से परामर्श किया तो इस बारे में चार प्रस्ताव सामने आए -

  1. प्रार्थना के समय कोई झंडा बुलंद किया।
  2. किसी उच्च स्थान पर आग जला दी जाए।
  3. यहूदियों की तरह बिगुल बजाया जाए।
  4. ईसाइयों की तरह घंटियाँ बजाई जाए।

लेकिन इनमें से किसी पर भी एकमत नहीं बन पाया क्योंकि ये सारे तरीके गैर-मुस्लिमों के तरीकों से मिलते जुलते थे। इस समस्या से पैगंबर मोहम्मद (सल.) और धर्म मित्र चिंतित थे। उसी रात अब्दुल्लाह बिन ज़ैद ने स्वप्न में देखा कि किसी ने उन्हें अज़ान और इक़ामत के शब्द सिखाए हैं। उन्होंने सुबह पैगंबर मोहम्मद (सल.) को अपना सपना बताया तो पैगंबर मोहम्मद (सल.) ने इसे पसंद किया और उस सपने को अल्लाह की ओर से सच्चा सपना बताया।

पैगंबर मोहम्मद (सल.) ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ैद से कहा कि तुम हज़रत बिलाल को अज़ान इन शब्‍दों में पढने की हिदायत कर दो, उनकी आवाज़ बुलंद है इसलिए वह हर नमाज़ के लिए इसी तरह अज़ान दिया करेंगे। हज़रत बिलाल को अज़ान के लिए चुनने का एक कारण यह भी था कि हजरत बिलाल एक हब्शी यानि अफ्रीकन दास थे। पैगंबर मोहम्मद (सल.) दास प्रथा को खत्म करना चाहते थे। वह चाहते थे कि लोग दासों का भी सम्मान करें इसलिए उन्होंने हजरत बिलाल को अज़ान देने के लिए चुना। उसी दिन से अज़ान की प्रणाली स्थापित हुई और इस तरह हज़रत बिलाल इस्लाम के पहले अज़ान देने वाले के रूप में प्रसिद्ध हुए।

क्यों हुई लाउडस्पीकर की शुरुआत

शाइस्ता अम्बर कहती हैं कि जब अज़ान देना शुरू हुआ था तब ऊंची दीवार पर चढ़कर तेज आवाज़ में अज़ान दी जाती थी। उस वक्त मुसलमान बहुत कम थे और ज्यादतर मुसलमानों के घर मदीने की मस्जिद के आस-पास ही हुआ करते थे। उन तक हज़रत बिलाल की आवाज आसानी से पहुंच जाती थी। बाद में जब लोगों ने इस्लाम धर्म को अपनाना शुरू किया और मुसलमानों की आबादी बढ़ी तब मस्जिद में मीनारों का बनना शुरू हुआ। इन मीनारों को इस तरह से बनाया जाता था जिनसे आवाज गूंजती हुई दूर तक जाती थी लेकिन आजकल लाउडस्पीकर पर अज़ान देने का चलन इसलिए शुरू हो गया क्योंकि अब शोर बहुत ज्यादा होता है। अगर बिना लाउडस्पीकर के अज़ान दी जाएगी तो लोगों तक मुअज्जिन की आवाज नहीं पहुंच पाएगी।

अज़ान के मायने

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर

अर्थ - अल्लाह सब से बड़ा है

अश-हदू अल्ला-इलाहा इल्लल्लाह

अश-हदू अल्ला-इलाहा इल्लल्लाह

अर्थ - मैं वचन देता हूं कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा उपासना के योग्य नहीं

अश-हदू अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह

अश-हदू अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह

अर्थ- मैं वचन देता हूं कि मुहम्मद सल्ल. अल्लाह के अन्तिम संदेष्टा हैं

ह्या 'अलास्सलाह, ह्या 'अलास्सलाह

अर्थ- आओ नमाज़ की ओर

हया 'अलल फलाह, हया 'अलल फलाह

अर्थ- आओ सफलता की ओर

अस्‍सलातु खैरूं मिनन नउम

अस्‍सलातु खैरूं मिनन नउम

अर्थ - नमाज़ सोने से उत्तम है (यह सिर्फ फज्र यानि सुबह की अज़ान में बोला जाता है)

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर

अर्थ - अल्लाह सब से महान है

ला-इलाहा इल्लल्लाह

अर्थ - अल्लाह के अतिरिक्त कोई उपासना के योग्य नहीं।

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