विदेशी सुपर नेट और सेंथेटिक यार्न से बनी साड़ियों ने घटाई राजपूताना चंदेरी की मांग

विदेशी सुपर नेट और सेंथेटिक यार्न से बनी साड़ियों ने घटाई राजपूताना चंदेरी  की मांगबुंदेली राजपूत और मालवा के सुल्तानों ने शुरू किया था चंदेरी साड़ी बनाने का काम।

जब भी कभी सिल्क साड़ियों की बात होती है, तो दिमाग में बनारसी साड़ियों का ख़याल आपने आप आ जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में राजपूतों के शासन काल से चल रहा चंदेरी सिल्क साड़ियां बनाने का काम, देश व विदेशों में पसंद किया जा रहा है। यहां की हाथों से बनाई गई चंदेरी सिल्क साड़ियां अपने बारीक काम के लिए मशहूर हैं, लेकिन साड़ियों की ब्रिक्री के लिए सप्लाई और ट्रांसपोर्ट सुविधाओं की कमी के कारण यह उद्योग धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

ललितपुर जिले में पिछले 25 वर्षों से इस कला से जुड़े हथकरघा कारीगर अशोक कुमार ( 31 वर्ष) का पूरा परिवार चंदेरी सिल्क साड़ियां बनाने का काम कर रहा है। चंदेरी साड़ियों के कारोबार के बारे में अशोक बताते हैं,'' आजकल सिल्क साड़ियों को बनाने के लिए बड़े-बड़े पावरलूम चलते हैं , लेकिन ललितपुर की चंदेरी सिल्क साड़ियां कई पीढ़ियों से घरों में बनाई जा रही हैं। यह पूरा काम हाथों से ही होता है, एक साड़ी बनाने में दो से तीन कारीगर लगते हैं और इसे बनाने में 15 से 20 दिन तक लग जाते हैं।''

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उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के ललितपुर ज़िले में चंदेरी साड़ियां बनाने का कारोबार 35 वर्ष पुराना है। पहले जहां, ललितपुर में इस काम से जुड़े करीब पांच हज़ार से ज़्यादा कारीगरों के लिए यह काम एक कमाई का अच्छा ज़रिया था, वहीं अब इन साड़ियों की डिमांड ज़्यादा होने के बावजूद सरकार की तरफ से इनकी सप्लाई और ब्रिक्री के लिए कोई सुविधा नहीं दी जा रही है। काम ज़्यादा न मिल पाने के कारण अब इस क्षेत्र में चंदेरी सिल्क साड़ियां बनाने वाले कारागरों की संख्या घटकर 400 ही रह गई है।

पिछले 10 वर्षों से चंदेरी साड़ियों का व्यापार कर रहे व्यवसायी राजन सिंह राजपूत ( 48 वर्ष) ने बताया,'' बाज़ारों में विदेशी सुपर नेट और सेंनथेटिक यार्न की मदद से बनाई जा रही नकली चंदेरी साड़ियों ने राजपूताना शैली में बनाई जाने वाली चंदेरी साड़ियों की मांग को गिराया है।''

एक साड़ी बनाने में बनाने में लगते हैं 15 से 20 दिन।

बुंदेलखंड की पुरानी चंदेरी हस्तकला को बचाने के लिए भारत सरकार ने चंदेरी फैब्रिक को भौगोलिक हस्तकला वस्तु मानकर संरक्षित किया है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार ने भी चंदेरी साड़ियों को एक जनपद -एक उत्पाद योजना में जोड़ा है। इससे यहां के पुश्तैनी कारीगरों को कारोबार चलाने के लिए मुद्रा लोन दिया जा रहा है।

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'' इन साड़ियों को बनाने का पूरा काम हाथ से ही होता है, इसलिए ये साड़ियां दूसरी साधारण सिल्क साड़ियों की तुलना में ज़्यादा महंगी बिकती है। प्योर चंदेरी सिल्क साड़ियों की कीमत चार हज़ार रुपए से लेकर चार लाख रुपए तक होती है, इसलिए इनके खारीददार भी कम हैं।'' राजन सिंह राजपूत ने आगे बताया।

चंदेरी साड़ियां बनाने का काम सबसे पहले बुन्देलखंड की सीमा पर बसे चंदेरी नगर में शुरू हुआ। बेतवा नदी के पास बसी चंदेरी पहाड़ी, झीलों और वनों से घिरे इस नगर को बुन्देल राजपूतों ने बसाया था। इस नगर में आज भी राजपूतों की बनवाई गई कई एतिहासिक इमारतें देखी जा सकती है। मौजूदा समय में इस क्षेत्र में बुन्देली शैली में बनी हस्तनिर्मित चंदेरी साड़ियां बनाई जाती हैं। राजपूतों के अलावा इस क्षेत्र में मालवा के सुल्तानों ने भी राज किया, जिन्होंने बाद में इस कला को अरब देशों तक पहुंचाया।

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'' चंदेरी साड़ियों की मांग अब देश में कम होती जा रही है, लेकिन इन पर किए जाने वाले बारीक काम और कारीगरी को विदेशों में बहुत पसंद किया जा रहा है। साउदी अरब , अफ्रीका और अमेरिका में इस साड़ियों को पसंद किया जा रहा है। लेकिन उन तक चंदेरी साड़ियां कैसे पहुंचाई जाए, इस पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है। इससे हमें बहुत नुकसान सहना पड़ रहा है।'' कारीगर अशोक कुमार आगे बताते हैं।

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