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आमदनी दोगुनी करने के वादों के बीच किसानों की आत्महत्या का सिलसिला जारी है, आंकड़े गवाह हैं...

हाल ही में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने किसानों की आत्महत्याओं से जुड़े आंकड़े संसद में प्रस्तुत किए। ये आंकड़े इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि मौजूदा कृषि संकट की सबसे बड़ी वजह है कि किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है। 

पिछले दो वर्षों में हमने सड़कों पर टमाटर, आलू फेंकते परेशान किसानों की खबरें और वीडियो देखे हैं। हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें एक नाराज किसान बड़ी निर्ममता से अपने खेत में खड़ी फूलगोभी को अपने ही हाथों से नष्ट कर रहा है। इसी तरह से हमने ऐसे विडियो देखे हैं जिनमें किसान पके टमाटरों को तालाबों या हाईवे पर फेंक रहे हैं।

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि किसानों को अधिकतर मामलों में खेती और परिवहन की लागत भी नहीं मिल पा रही है। किसानों का गुस्सा, उनका अपनी उपज को इस तरह फेंका जाना आसानी से समझा जा सकता है। असल में किसानों को उनकी वाजिब कमाई नहीं मिल पा रही है।

हाल ही में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो {एनसीआरबी} ने किसानों की आत्महत्याओं से जुड़े आंकड़े संसद में प्रस्तुत किए। ये आंकड़े इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि मौजूदा कृषि संकट की सबसे बड़ी वजह है कि किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है।

इन आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में 12,602 किसानों ने आत्महत्या की थी वहीं 2016 में यह संख्या 11,370 रही। इसमें भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की खुदकुशी भी शामिल है। हालांकि, इन आंकड़ों को इस तरह से बनाया गया है कि इनमें लगातार कमी होती दिखाई दे इसके बावजूद इनसे एक तथ्य उभर कर सामने आता है कि उन राज्यों में भी किसान आत्महत्याओं की दर बढ़ी है जिनमें खेती योग्य भूमि का बड़ा हिस्सा सिंचाई के अंतर्गत है।

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मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार में सड़क पर फेंके गए टमाटर। 

पंजाब के 3 विश्वविद्यालयों ने माना 1000 किासनों की जान गई, सरकारी रिपोर्ट में आंकड़ा सिर्फ 271

पहले नजर डालते हैं कि आत्महत्याओं को कम दिखाने के लिए संभवतः किस तरह आंकड़ों के साथ खेला गया होगा। पंजाब में कुल 271 आत्महत्याएं दिखाई गई हैं। लेकिन यह आंकड़ा उसका एक तिहाई है जो तीन विश्वविद्यालयों ( पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला और गुरू नानक देव यूनिवर्सिटी )ने अमृतसर ने घर-घर जाकर जुटाया था। इसके मुताबिक, सन 2000 से 17 वर्षों के बीच 16,600 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने अपनी जान दी थी। दूसरे शब्दों में, इन विश्वविद्यालयों ने आधिकारिक तौर पर एक साल में औसतन 1000 आत्महत्याओं की बात कही थी। लेकिन एनसीआरबी के आंकड़ों ने इन्हें बहुत कम करके, महज 271 दिखाया है। मुझे भरोसा है कि दूसरे राज्यों के शोधकर्ता भी इसी तरह की विसंगतियों को उजागर करेंगे।

खैर, कोई बात नहीं, किसानों के बीच पनप रही आय से संबंधित असुरक्षा की भावना की ओर लौटते हैं। पंजाब, हरियाणा, गुजरात और कर्नाटक के किसानों के आत्महत्याओं के मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है। इससे वह आम धारणा भी खारिज होती है कि भारत में आत्महत्याओं की दर ज्यादा है क्योंकि लगभग 60 फीसदी खेतों तक सिंचाई की सुविधा नहीं है, इसलिए, खराब मॉनसून से उपज प्रभावित होती है और किसान आत्महत्या करने लगते हैं।

इस तरह पूरे कृषि संकट के लिए केंद्रीय और प्रायद्वीपीय भारत में सिंचाई के अभाव को जिम्मेदार बताया जाता है। मैं इस बात से सहमत हूं कि कृषि नीतियों का फोकस सिंचाई सुविधा सुनिश्चित करने पर होना चाहिए, लेकिन सिंचाई के अलावा भी कुछ और मुद्दे हैं जिनकी चर्चा नहीं हो रही है और कृषि संकट का पूरा दोष वर्षा आधारित खेती पर मढ़ दिया जा रहा है। यह समस्या का अतिसरलीकरण है।

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ऐसी तस्वीरें कृषि प्रधान देश के लिए कलंक जैसी है.. फोटो साभार सोशल मीडिया

लाभकारी मूल्य रोक सकता है किसानों की आत्महत्याएं !

निश्चित तौर पर बहुत सारे कारण हैं जिनका समय-समय पर उल्लेख हुआ है लेकिन आखिर में हर चीज जाकर बाजार की विफलता पर खत्म होती है। हमारे बाजार किसानों को लाभकारी मूल्य मुहैया कराने में नाकाम साबित हुए हैं। खेती पर पूरी तरह आधारित दो राज्यों पंजाब और हरियाणा का उदाहरण लेते हैं जिन्हें खाद्यान्न का कटोरा कहा जाता है। पंजाब में 98 पर्सेंट सिंचाई सुविधा है, यहां एनसीआरबी ने 2016 में कृषि से जुड़ी 271 आत्महत्याओं का उल्लेख किया है। 2015 की 124 आत्महत्याओं के हिसाब से इनमें 112 पर्सेंट की बढ़ोतरी हुई है।

पड़ोसी हरियाणा में 82 फीसदी कृषि योग्य भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। लेकिन यहां 2015 कीे तुलना में 2016 में 162 आत्महत्याओं से बढ़कर 250 आत्महत्याओं के मामले आए, मतलब 54 फीसदी की वृद्धि देखी गई। अब यह बात मेरी समझ मंे नहीं आती है कि अगर सिंचाई सुविधाओं का अभाव किसानों की समस्याओं के लिए जिम्मेदार है तो पंजाब और हरियाणा किसान आत्महत्याओं के केंद्र क्यों बनते जा रहे हैं?

मैं अक्सर जानकारों के मुंह से सुनता हूं कि महाराष्ट्र में सिंचाई की कमी वहां के कृषि संकट के लिए जिम्मेदार है। हाल के समय में विदर्भ और मराठवाडा किसानों की आत्महत्या की राजधानी बन गए हैं। पर चूंकि, महाराष्ट्र की कृषि योग्य भूमि के महज 18 पर्सेंट पर सिंचाई की सुविधा है इसलिए विशेषज्ञ और अर्थशास़्त्री आसानी से बढ़ती आत्महत्याओं के पीछे सिंचाई की कमी को जिम्मेदार ठहराने में कामयाब होते हैं। मैं हमेशा इस कुतर्क को पंजाब पर लागू करके देखता हूं। पंजाब में हर खेत सिंचित है इसके बावजूद साल दर साल आत्महत्या के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं।

सिंचाई की कमी के अलावा कृषि मंत्रालय, नीति आयोग और यहां तक कि कृषि विश्वविद्यालय किसानों की मौतों के पीछे फसलों की कम उत्पादकता को एक और वजह के रूप में गिनाते हैं। उनका मानना है कि फसलों की उत्पादकता बढ़ेगी तो कुल कृषि आय भी बढ़ेगी। मैं एक बार फिर उनसे सहमत नहीं हूं।

गेहूं, चावल, मक्का जैसी खाद्यान्न फसलों की उत्पादकता पंजाब में दुनिया में सबसे ज्यादा है। इसके बावजूद शायद ही कोई दिन ऐसा हो जिस दिन दो,तीन, चार किसानों की आत्महत्या की खबर ना आती हो। फसलों की उत्पादकता के मामले में पंजाब के बाद दूसरे नंबर पर हरियाणा है और वहां भी किसानों की आत्महत्या बढ़ती जा रही है।

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लाभकारी मूल्य के इंतजार में करोड़ों किसान। फोटो गांव कनेक्शन

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इससे एक बात स्पष्ट है कि समस्या कहीं और है और हम समाधान कहीं और खोज रहे हैं। मैं निश्चित रूप से इस बात से सहमत हूं कि सिंचाई के अंतर्गत क्षेत्र में बढ़ोतरी होनी चाहिए और फसलों की उत्पादकता में भी वृद्धि होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ किसान की कुल आय भी बढ़नी चाहिए। मुझे पता है कि नीतियों का फोकस इस बात पर है कि अनाज के उत्पादन में लगातार वृद्धि होती रहे पर किसानों को लाभकारी मूल्य देे पाने की नाकामी ने ही कृषि संकट को गंभीर बना दिया है।

सरकार हर साल 23 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी का ऐलान करती है। एमएसपी हमेशा उपभोक्ता कीमतों को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं। अक्सर एमएसपी फसल की लागत से भी कम होता है। जब भी कोई किसान खेती करता है तो उसे यह अंदाजा नहीं होता कि वह घाटे की खेती करने जा रहा है।

आजादी के 70 बरसों के बाद भी देश के 17 राज्यों यानि की लगभग आधे देश में एक कृषक परिवार की औसत सालाना आय महज 20,000 रुपये है (आर्थिक सर्वेक्षण 2016 के मुताबिक) ।

किसानों की आय बढ़ाना हमारे इकॉनमिक एजेंडा की वरीयता कभी रही ही नहीं। अगर एमएसपी की बात करें तो असलियत यह है कि महज 6 पर्सेंट किसान ही एमएसपी पर अपनी उपज बेच पाते हैं। बाकी के 94 फीसदी किसान तो शोषण करने वाले बाजार पर निर्भर हैं। आजादी के 70 बरसों के बाद भी देश के 17 राज्यों यानि की लगभग आधे देश में एक कृषक परिवार की औसत सालाना आय महज 20,000 रुपये है (आर्थिक सर्वेक्षण 2016 के मुताबिक) । महज यह एक तथ्य काफी यह है बताने के लिए कि देश में व्याप्त भयानक कृषि संकट का मूल कारण क्या है। 2016 के एनसीआरबी में दर्ज किसानों की आत्महत्या के आंकड़े इसे और स्पष्ट करते हैं।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके निजी विचार हैं। उनका ट्विटर हैंडल है @Devinder_Sharma उनके सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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