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उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य केंद्र बदहाल: टपकती छतें, गायब दरवाजें, हर जगह सन्नाटा और चंद कर्मचारी

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, ग्रामीण भारत के लिए बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने की पहली सीढ़ी है। गांवों में कोरोना महामारी की दूसरी लहर की वजह से इन केंद्रों का महत्व कई गुना बढ़ गया है। गांव कनेक्शन की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि इनमें से कई केंद्रों की स्थिति जर्जर हो चुकी है।

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। 43 वर्षीय कल्लू वर्मा उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के पासा खेड़ा गांव के रहने वाले हैं। वे अपने गांव में स्थित बंद पड़े प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) के जंग लगे हुए ग्रिल गेट के बाहर खड़े हैं। वे झल्ला कर कहते हैं कि इस केंद्र में पिछले तीन महीनों से एक भी डॉक्टर नहीं है।

वर्मा ने गांव कनेक्शन को बताया, "अगर हमें डॉक्टर की ज़रूरत हो, तो हम पुरवा ब्लॉक के सीएचसी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) जाते हैं, जो कि 12 किलोमीटर दूर है। अगर बेहतर चिकित्सा की जरूरत हो, तो हम उन्नाव जाना पड़ता है जो कि 35 किलोमीटर दूर है।"

उन्होंने आगे बताया, "इस स्वास्थ्य केंद्र को सप्ताह में या पंद्रह दिनों में एक बार केवल टीकाकरण (नियमित टीकाकरण) के लिए ही खोला जाता है, और फिर बंद कर दिया जाता है।"

उन्नाव के कल्लू वर्मा

कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान ग्रामीण भारत में लगातार बड़े पैमाने पर लोगों के संक्रमित होने की खबर आने लगी, जिसके बाद 28 मई को गांव कनेक्शन के कम्यूनिटी पत्रकारों ने उन्नाव, बाराबंकी, शाहजहांपुर और सीतापुर जिलों में स्थित 11 ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों का दौरा किया। इसमें चार पीएचसी और सात उप केंद्र शामिल हैं।

ये सभी स्वास्थ्य केंद्र ग्रामीण भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये ग्रामीण स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की मूलभूत इकाइयां हैं। भले ही कागज़ों में ही सही लेकिन इसके ज़रिए ही ग्रामीणों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हो पाती हैं।

हालांकि, गांव कनेक्शन ने पाया कि इनमें से कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के भवन जर्जर स्थिति में हैं और वहां सन्नाटा पसरा हुआ है। कुछ भवनों के दरवाजे, खिड़कियां और फर्नीचर टूट गए थे और वहां कोई कर्मचारी नजर नहीं आ रहा था।

इनमें से कुछ केंद्रों में गाय का गोबर और कचरों का ढेर जमा हो गया है, तो वहीं कुछ केंद्रों में परिसर के चारों ओर बकरियां चर रही हैं। साफ है कि स्वास्थ्य केंद्रों की यह दुर्गति लचर व्यवस्था और सरकार की लापरवाही का नतीजा है।

स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति है बदहाल

पासा खेड़ा के पीएचसी से लगभग 180 किलोमीटर दूर, शाहजहांपुर जिले के खैरपुर गांव में स्थिति और भी खराब है। यहां के उप स्वास्थ्य केंद्र का भवन जर्जर हो चुका है और यह ढहने के कगार पर आ गया है। स्वास्थ्य केंद्रों के अंदर के शौचालय बंद पड़े हुए हैं और यहां बहुत गंदगी फैली हुई है।

खैरपुर में एक आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) कार्यकर्ता निर्मला देवी ने गांव कनेक्शन को बताया, "यहाँ कुछ भी नहीं है। इस भवन का कोई गेट या दरवाजा नहीं है, बारिश होने पर कमरे की छत से पानी रिसने लगता है, हम आशा कार्यकर्ता इसके अंदर काम करते-करते भीग जाते हैं। भवन की हालत इतनी नाजुक है कि यह संभवतः किसी भी दिन ढह सकती है।" देवी गुस्से और लाचारी के भाव में कहती हैं, "किसी दिन मर जाएंगे दब के इसमे।" (एक दिन हम इसके नीचे दबेंगे और मरेंगे)।

ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं का स्ट्रक्चर

देवी आगे कहती हैं, "यहां काम करना बेहद मुश्किल है। मुझे समझ नहीं आता कि इस केंद्र के वॉशरूम बंद क्यों हैं। दरवाजे और गेट नहीं होने के कारण हम महिलाएं यहां काम करते हुए असुरक्षित महसूस करती हैं।"

खैरपुर गांव की एक बुजुर्ग महिला सुदामा देवी ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा, "मैं इस केंद्र को लगभग बीस वर्षों से देख रही हूँ। इसकी किसी को परवाह नहीं है। यह किसी के भी काम करने के लिए उपयुक्त नहीं है।"

इस बीच, खैरपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर बाराबंकी जिले के फतेहपुर ब्लॉक के बेलहरा गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से काफी अच्छी है। स्थानीय लोगों ने गांव कनेक्शन को बताया कि करीब छह माह पहले ही इस केंद्र की मरम्मत की गई थी।

एक स्वास्थ्य अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर गांव कनेक्शन को बताया, "कोरोना से पहले यहां रोजाना 50-60 मरीज आते थे। लेकिन अब उन्हें डर है कि अगर वे यहां आएंगे, तो उनका कोविड परीक्षण किया जाएगा। आज केवल तीन लोग ही टेस्ट के लिए केंद्र आए हैं।"

उन्नाव जिले के पासा खेड़ा गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में स्टाफ के लिए बना क्वार्टर। फोटो- सुमित

बेलहरा के पीएचसी से थोड़ी ही दूर पर चिकित्सा कर्मचारियों के आवासीय क्वार्टर भी में गंदगी पाई गई। यहां न तो सफाई थी और न ही डॉक्टरों के रहने की व्यवस्था थी।

सूरतगंज प्रखंड के बाराबंकी के छेदा गांव में पीएचसी केंद्र में पानी की आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है और यह चारों ओर कूड़े के ढेर के बीच स्थित है।

पीएचसी में नहीं हैं डॉक्टर

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी 2018-19 की रिपोर्ट के अनुसार, आधिकारिक मानदंडों के अनुसार देश में औसतन 35,567 ग्रामीण एक पीएचसी पर निर्भर हैं। इसी तरह एक उप स्वास्थ्य केंद्र औसतन 5,616 ग्रामीणों की आबादी को कवर करती है। हालांकि, 20 करोड़ से अधिक आबादी वाले राज्य उत्तरप्रदेश के लिए यह संख्या काफी कम लगती है।

22 नवंबर, 2019 को लोकसभा में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत एक जवाब के अनुसार, उत्तर प्रदेश (यूपी) के पीएचसी में मरीजों की संख्या के अनुपात में डॉक्टरों की संख्या सबसे कम है। यानी इस मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति सबसे ज्यादा बुरी है।

बहुत से स्वास्थ्य केंद्रों पर मवेशियों का अड्डा दिखा। ये तस्वीर सीतापुर के जलाल नगर में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र। फोटो- मोहित शुक्ला

सदन में दिए गए उत्तर से पता चलता है कि उत्तरप्रदेश में पीएचसी के लिए 4,509 डॉक्टरों की स्वीकृत संख्या है, लेकिन कुल 1,344 डॉक्टर ही हैं और 3,165 जगहें खाली हैं। यह सूची 2,277 डॉक्टरों की कमी को प्रदर्शित करता है।

इस साल 1 अप्रैल को महामारी की दूसरी लहर के दौरान, यूपी सरकार के अतिरिक्त स्वास्थ्य सचिव, अमित मोहन प्रसाद ने बताया था कि राज्य में कुल कोविड-19 मामलों में से आधे ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आ रहे हैं।

सीतापुर जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) मधु गरोला ने गांव कनेक्शन से कहा, "जब से राज्य में ग्रामीण क्षेत्रों में कोविड-19 महामारी ने आक्रमण किया है, तब से स्थिति और खराब हो गई है और इन स्वास्थ्य केंद्रों के प्रभारी स्वास्थ्यकर्मियों को इसकी वजह से दोगुना काम करना पड़ रहा है।"

पीएचसी में स्टाफ की भी कमी

वर्ष 2018-19 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार के दिशा निर्देशों के अनुसार, स्टाफिंग पैटर्न के न्यूनतम मानदंड के लिए एक उप-केंद्र में कम से कम तीन स्वास्थ्यकर्मियों का होना आवश्यक है, जिसमें एक महिला स्वास्थ्यकर्मी / सहायक नर्स-दाई (एएनएम), अनुबंध के आधार पर एक अतिरिक्त एएनएम और एक स्वैच्छिक कार्यकर्ता शामिल हैं।

आशा कार्यकर्ता निर्मला देवी शाहजहांपुर के खैरपुर गांव स्थिति उप स्वास्थ्य केंद्र की बारे बताते हुईं। फोटो- राम जी मिश्रा

इस दिशा निर्देश में यह भी कहा गया है कि एक पीएचसी में चार चिकित्सा अधिकारियों, सात नर्स दाई, वार्ड बॉय, फार्मासिस्ट / कंपाउंडर, प्रयोगशाला तकनीशियन आदि सहित कम से कम 15 कर्मचारी होने चाहिए।

हालांकि, जमीनी हकीकत इन आधिकारिक दिशा-निर्देशों में बताई गई बातों से कोसों दूर है।

सीतापुर जिले के जलालनगर प्रखंड के पिसावां गांव में उपकेंद्र के एक प्रभारी फार्मासिस्ट ने गांव कनेक्शन को बताया कि उनके केंद्र में केवल दो पुरुष स्वास्थ्यकर्मी हैं, जिनमें एक वार्डबॉय और दूसरे वे खुद शामिल हैं।


प्रभारी फार्मासिस्ट अरुण कुमार रस्तोगी ने गांव कनेक्शन को बताया, "पिछले डेढ़ साल से, जब से कोरोना महामारी की शुरुआत हुई है, मुझे RRT (रैपिड रिस्पांस टीम) का काम सौंपा गया है, इसलिए मैं रोजाना उप-केंद्र की देखभाल करने में समर्थ नहीं हूं।"

उन्होंने आगे बताया, "जब मैं यहां होता हूं तो मरीजों की देखभाल करता हूं, लेकिन जब मैं यहां नहीं होता हूं, तो वार्डबॉय ऐसे मरीजों को नियमित दवाएं प्रदान करते हैं जो पहले से केंद्र में आते रहे हैं। जब मैं यहां नहीं होता हूं तो किसी भी नए मरीज को नहीं देखा जाता है।"

जब हमने पिसावां के पीएचसी की स्थिति के बारे में सीतापुर के सीएमओ मधु गरोला से पूछा तो उन्होंने गांव कनेक्शन से कहा कि वे इस मामले की जांच करेंगी। उन्होंने कहा, "उक्त स्वास्थ्य केंद्र में किसी और को नियुक्त किया जाएगा या फार्मासिस्ट को वापस उपकेंद्र भेज दिया जाएगा।"

बाराबंकी के ब्लॉक सूरतगंज के गांव छेडा स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पानी तक की व्यवस्था नहीं है। फोटो- वीरेंद्र सिंह

उन्होंने आगे कहा, "यह एक कठिन स्थिति है क्योंकि स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारियों की कमी है और कोरोना महामारी की वजह से डॉक्टरों पर काम का बोझ बढ़ गया है। मैं इस मामले को देखूंगी और जांच करूंगी कि यह फार्मासिस्ट कितने समय से कोविड ड्यूटी कर रहा है।"

गांव कनेक्शन ने जवाब के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त स्वास्थ्य सचिव अमित मोहन प्रसाद से संपर्क किया। लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई। उनकी प्रतिक्रिया मिलने के बाद स्टोरी को अपडेट किया जाएगा।

इनपुट- उन्नाव से सुमित यादव, सीतापुर से मोहित शुक्ला, बाराबंकी से वीरेंद्र सिंह और शाहजहांपुर से राम जी मिश्रा से मिले इनपुट के आधार पर खबर लिखा है प्रत्यक्ष श्रीवास्तव ने।

अनुवाद- शुभम ठाकुर

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