वीडियो : अपनी संतान के लिए माँ के त्याग की पहचान है सकट त्योहार ( भाग - एक )

वीडियो : अपनी संतान के लिए माँ के त्याग की पहचान है सकट त्योहार ( भाग - एक )मेरी मिट्टी, मेरे त्योहार : भाग -1

होली, दीपावली और ईद जैसे कई भारतीय त्योहार हैं, जिनकी दुनिया भर में अलग पहचान है। लेकिन क्या आप जानते हैं, हमारे घरों में वर्षों से मनाए जा रहें रिति-रिवाज़ और लोक पर्व ( क्षेत्रीय त्योहार) भी अपने भीतर अलग अलग कहानियां समेटे हुए हैं। इन कहानियों के पीछे कोई दंत कथा या फिर कोई इतिहास जुड़ा हुआ है। गाँव कनेक्शन आने वाले दिनों में आपको ऐसे ही लोकपर्वों की झलक दिखाएगा, जिन्हें आज की युवा पीढ़ी भूलती जा रही है। हमारी विशेष सीरीज़ मेरी मिट्टी, मेरे त्योहार के पहले भाग में जानिए लोकपर्व सकट के बारे में।

माताएं अपने पुत्रों की लंबी उम्र के लिए रखती हैं सकट का व्रत

सकट लोकपर्व मुख्यरूप से उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। इस पर्व को माघी चौथ, वक्रतुंडी चौध और तिलकूट चौथ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिला निर्जल व्रत रखती हैं। इस लोकपर्व में मताएं अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और देर शाम होते ही सकट की पूजा में तिल, गुड़, गन्ना और मूली का प्रसाद चढ़ाया जाता है। उत्तर प्रदेश के अलावा यह पर्व मध्यप्रदेश और बिहार में भी मनाया जाता है।

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सकट त्योहार से जुड़ी हैं कई कहानियां

पहली कहानी - धर्मराज युधिष्ठिर ने रखा था सकट का व्रत

ऐसा कहा जाता है कि जब महाभारत के समय पांडवों को कौरवों के हाथों पराजित होने का डर सता रहा था, तो भगवान श्रीकृष्ण ने पांडु पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर से सकट चौथ का व्रत रखने को बोला था। व्रत रखने के बाद पांडवों ने युद्ध कुशलता से जीता और तब से इस व्रत को महिलाएं अपनी संतान की कुशलता के लिए रखती हैं।

कौरवों के साथ हुए युद्ध में कुशलता से लड़ाई करने के लिए श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को सकट का व्रत रखने के लिए कहा था।

दूसरी कहानी - राजा हरिश्चंद्र ने देखा सकट व्रत का चमत्कार

सतयुग काल में राजा हरिश्चंद्र के नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार जब वो बर्तन बनाने के बाद उसे आग में पकाने लगा तो बर्तन पक नहीं रहे थें। बर्तन कच्चे रह जाने के कारण खराब होते जा रहे थें। जब कुम्हार इससे परेशान हो गया तो वो एक तांत्रिक के पास गया। तांत्रिक ने उसका काम होने के लिए एक बच्चे की बलि देने को बोला। यह सुनकर कुम्हार वहीं रह रहे एक ऋषि की मृत्यु हो जाने के बाद उसके पुत्र को पकड़कर सकट चौथ के दिन बर्तन पकाने वाली आग में डाल दिया। बालक की मां ने उसी दिन सकट चौथ का व्रत भी रखा हुआ था। सुबह होने पर जब कुम्हार आग के पास गया तो, उसने देखा कि उसके बर्तन पक गए थे और बच्चा भी सही सलामत था। यह देखकर उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने राजा के आगे अपनी गलती स्वीकार की।

राजा हरिश्चंद्र ने अपने नगर में सकट त्योहार मनाने की परंपरा शुरू की थी।

राजा ने यह बात जब बच्चे की माँ से पूछी तो उसने बताया की मैने सकट चौथ के दिन अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए गणेश जी का व्रत रखा था , इसकी शक्ति के कारण मेरा बेटा आग में जाने के बाद भी जीवित रहा। यह सुनकर राजा हरिश्चंद्र को सकट चौथ में व्रत रखने का महत्व समझ आ गया और उस दिन को उन्होंने ने सकट त्योहार के नाम से मनाए जाने का आदेश दिया।

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