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लॉकडाउन: किसान की फ़ैक्टरी चालू है, पर ख़रीदार नहीं, सब्जी किसान तबाह हो गए

देश की दो तिहाई जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। पर किसानों का मानना है कि उनकी कोई सुनने वाला नहीं। इसलिए अगर मीडिया और सरकारें उद्योग की ही भाषा समझते हैं तो हम उसी तरह इस आपातकाल को समझा रहे हैं -- भारत के करोड़ों किसानों की फ़ैक्टरी चालू है, पर ख़रीदार नहीं, व्यापार ठप्प है। गांव कनेक्शन की विशेष सीरीज 'किसान लॉकडाउन' के भाग एक में पढ़िए.. सब्जी किसानों का दर्द

Arvind ShuklaArvind Shukla   18 April 2020 6:31 AM GMT

लॉकडाउन: किसान की फ़ैक्टरी चालू है, पर ख़रीदार नहीं, सब्जी किसान तबाह हो गए

मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती करने वाले किसान संदीप सिंह जाट का टमाटर भोपाल से लेकर मुंबई तक जाता था। मार्च-अप्रैल में उनके खेतों से औसतन 250 कुंतल टमाटर रोज निकलता है, आखिरी बार उन्होंने 24 मार्च को 1,250,0 रुपए का टमाटर बेचा। लॉकडाउन के चलते बिक्री बंद हो गई, कुछ दिन उन्होंने लोगों को फ्री में बांटने की कोशिश की, और फिर खेतों को पशुओं से चरवा दिया है।

शहरों में सब्जियों की कीमत तीन से चार गुनी लेकिन गांव में माटी मोल...

दिल्ली, मुंबई जैसे शहर ही नहीं छोटे-छोटे कस्बों में टमाटर 40 से 50 रुपए किलो बिक रहा है। लेकिन संदीप सिंह का टमाटर जो थोक में 5 रुपए किलो बिक रहा था, उसके भी खरीददार नहीं मिल रहे थे। संदीप के नुकसान का गुणाभाग करें तो लॉकडाउन के 20 दिनों में ही उन्हें करीब 25 लाख रुपए का नुकसान हुआ।

संदीप सिंह फोन पर बताते हैं, "मेरे पास 25 एकड़ टमाटर था, जिससे रोजाना करीब 25 टन टमाटर (25000 किलो) निकलता था, ये सिलसिला करीब 20 मई तक चलता। लेकिन लॉकडाउन के चलते काम बंद हो गया। फिर मैंने फ्री में बंटवाना शुरु किया। मेरे साथ गनीमत ये रही कि मेरा अक्टूबर ये टमाटर निकल रहा था, तो काफी कुछ रिकवरी हो गई। इसमें मैं एक बात जोड़ना चाहता हूं कि जो किसान पहले से फसल बेच रहे उन्हें कम लेकिन जिनकी फसल मार्च-अप्रैल में नही निकलनी शुरु हुई थी, उन्हें ज्यादा नुकसान हुआ है।"

नोवल कोरोना वायरस से लड़ते भारत में लॉकडाउन के दौरान सब्जी और फल को जरूरी चीजों की लिस्ट में रखा गया है, लेकिन पुलिस प्रशासन की सख्ती और ुआशुरुआती दो हफ्तों तक विशेष गाइडलाइंस न होने के चलते किसानों का मंडी पहुंचना मुश्किल रहा तो बंद में कई जगह कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ने पर मंडियों को बंद करना पड़ा।

"भारत में सब्जी किसान पहले ही मौसम की मार से परेशान था, कई राज्यों में मार्च की बारिश से भारी नुकसान हुआ था, और जो बचा था वो लॉकडाउन में चला गया। हमारे साथ करीब 20 हजार किसान जुड़े हैं। सबके सामने दिक्कत ट्रांसपोटेशन की है। मजदूर भी नहीं मिल रहे।" श्रीराम गढवे, चेयरमैन, वेजिटेबल ग्रोवर एसोशिएन

मध्य प्रदेश में सिवनी के संदीप सिंह का टमाटर का खेत.. जिसमें अब फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है।

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लॉकडाउन में निर्यात बंद है। कई राज्यों में मंडियां ठप पड़ी हैं। जो मंडियां खुल रही हैं वहां सिर्फ रात में काम हो रहा। साप्ताहिक बाजारों और सड़क किनारे लगने वाले बंद होने के चलते टमाटर, हरी मिर्च, गोभी, शिमला मिर्च, धनिया, कद्दू लौकी, खीरा जैसी सब्जियां और फलों की खेती करने वालों को भारी नुकसान हुआ है।

शहरों में सब्जियां कई गुना महंगी बिक रही हैं, लेकिन गांवों में किसानों की लागत भी डूब गई। ऐसे ही अंगूर, संतरा, किन्नू, तरबूज मौसंबी और दूसरे फल उत्पादकों की हालत है। कई सब्जी और फल उत्पादक किसानों ने खेत जुतवा दिए हैं, बाग कटवा दिए हैं। अब जबकि लॉकडाउन 3 मई तक बढ़ गया है, जिससे बची खुची फसल भी बर्बाद हो सकती है।

यूपी के बाराबंकी जिले में बेलहरा में मिर्च की खेती करने वाले किसान अर्जुन मौर्य करते हैं, "पिछले साल 50 रुपए किलो मिर्च का रेट था, इस बार 10 रुपए किलो में बिक्री नहीं हो पा रही है, क्योंकि खरीददार ही नहीं आ रहे।" बाराबंकी की मिर्च खाड़ी देशों जाती थी, लेकिन इस बार किसान परेशान हैं।

बाराबंकी के जिला उद्यान अधिकारी महेंद्र कुमार बताते हैं, "पिछली बार हरी मिर्च का रेट अच्छा होने के कारण किसानों ने इस बार मिर्च की खेती का रकबा बढ़ाया था। इस बार करीब 2000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में हुई है। प्रति हेक्टेयर लगभग 300 कुंतल तक का उत्पादन होता है। उम्मीद है कि जिले में इस साल 60,000 टन (600,000 कुंतल) हरी मिर्च का उत्पादन होगा।"

प्रतीक शर्मा मध्य प्रदेश के भोपाल में रहते हैं वो शहरी लोगों को जैविक अनाज और सब्जियों की आपूर्ति करने वाली कंपनी ग्रीन एंड ग्रेन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और किसान भी हैं। होसंगाबाद जिले में उनके खेत हैं, जिसमें एक्सपोर्ट क्वालिटी का चेरी टमाटर लगा था लेकिन अब उनका काम पूरी तरह बंद है, खेत में लगी फसल सूख गई है।


लॉकडाउन में सब्जी किसान और ग्राहक के बीच रेट का अंतर कितना है वो बताते हैं, "भोपाल में सब्जी की बिक्री पूरी तरह प्रशासन के हाथ में है। किसान सब्जी एक जगह लाते हैं जहां से बड़े कारोबारी खरीदते हैं और फिर वो फुटकर वेंडर वालों को बेचते हैं। लेकिन किसान से खाने वाले तक जो रेट पहुंचता है वो किसानों की असली त्रासदी है।"

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प्रतीक आगे बताते हैं, "मेरा भाई जो अपने खेत से टमाटर लाता है कारोबारी उससे भोपाल में 60-80 रुपए कैरेट (20 किलो, मतलब 3 से 4 रुपए किलो) खरीदते हैं। लेकिन ये जब फुटकर कारोबारियों को बोली लगाकर देते हैं तो ये कैरेट 600 रुपए यानि 30 रुपए किलो तक पहुंच जाती है, जो ग्राहकों को 40 से 60 रुपए तक में मिलता है। क्योंकि सप्लाई बहुत कम है और मांग ज्यादा।" प्रतीक शर्मा को एक किसान के रुप में करीब 60 हजार रुपए महीने और कंपनी का एक लाख रुपए का नुकसान हो रहा है। देश में कई इलाकों सरकारें खुद सब्जियां और जरुरी चीचें पहुंचा रही है जबकि ज्यादातर जगहों पर ठेले वालों को आंशिक छूट है।

भारत में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना आंध्र प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, बिहार में बड़े पैमाने पर सब्जियों की खेती होती है। दिल्ली की आजादपुर मंडी में प्याज नाशिक से आता है तो हरी सब्जियां हरियाणा और पश्चिमी यूपी से पहुंचती हैं। लखनऊ की नवीन गल्ली मंडी में कटहल सिलीगुड़ी से आता था। यूपी का आलू असम से लेकर नेपाल तक जाता है। पुणे और नाशिक में होने वाली सब्जियां मुंबई समेत देश के कई हिस्से और विदेश तक जाती हैं।

सब्जी उत्पादक किसानों के एक संगठन वेजिटेबल ग्रोवर एसोशिएन के चेयरमैन श्रीराम गढ़वे कहते हैं, "भारत में सब्जी किसान पहले ही मौसम की मार से परेशान था, कई राज्यों में मार्च की बारिश से भारी नुकसान हुआ था, और जो बचा था वो लॉकडाउन में चला गया। हमारे साथ करीब 20 हजार किसान जुड़े हैं। सबके सामने दिक्कत ट्रांसपोटेशन की है। अब मजदूर भी नहीं मिल रहे।"

देश की सप्लाई चेन ट्रकों पर निर्भर है लेकिन लॉकडाउन में ज्यादातर आवागमन बंद है। कारोबारियों के मुताबिक जो ट्रक चल रहे वो ज्यादा किराया वसूल रहे क्योंकि उन्हें वापसी का भाड़ा नहीं मिलता और पुलिस से वापसी में अलग जूझना पड़ता है।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने सब्जियों और फलों के ट्रांसपोटेशन में आ रही दिक्कतों को दूर करने के लिए All india Agri Transport Call center बनाया, ताकि राज्यों के बीच आपसी समन्वय बना रहे। फल, सब्जी एग्री इनपुट खाद बीज, कीटनाशक की आपूर्ति जारी रहे। टोल फ्री कॉल सेंटर का नंबर है 18001804200 और 1488 जिसे किसी मोबाइल या लैंडलाइन से मिलाया जा सकता है

ऊपर की दोनों फोटो पश्चिम बंगाल के खीरा किसान की हैं। साभार अविक साहा

श्रीराम गढ़वे महाराष्ट्र के पुणे जिले के जुनार में रहते हैं। पुणे की आंबे गांव और पारनेर इलाके के 70 गांवों में करीब 15 हजार एकड़ में टमाटर की खेती होती है।

राम गढ़वे बताते हैं, " लॉकडाउन में सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। शुरुआत में पुलिस ने सख्ती की लेकिन बाद में सरकार ने काफी काम किया लेकिन दिक्कत बनी हुई है क्योंकि बाहर माल नहीं जा रहा है। हम लोगों की कई सब्जियां मुंबई से होकर खाड़ी देशों में जाती थीं, लेकिन बंदरगाह बंद होने से सब रुक गया है। अभी तो समुद्र में ही 100-200 कंटेनर फंसे हैं, जिसमें अंगूर और सब्जियां हैं।"

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दिल्ली की आजादपुर मंडी में इन दिनों रात 12 बजे से सुबह 10 बजे तक काम हो रहा है तो यूपी में लखनऊ की नवीन गल्ला मंडी में रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक खरीद फरोख्त चलती है।

आजादपुर मंडी के कारोबारी और दीप वेजिटेब्लस कंपनी के सीईओ राजेश कुमार करते हैं, "सब्जी और फल दोनों की ज्यादातर सप्लाई ठेले वालों के जरिए होती है, जो इन दिनों लगभग ठप है। डिमांड कम है तो आमद भी कम हो रहा है। अप्रैल 2019 की तुलना में इस साल आधे से भी कम माल आ रहा है।"

शहर तक कम माल आने का मतलब ही सब्जी किसानों का नुकसान है।

सब्जियां प्रदेश स्तर तो दूर जिला स्तर पर ही बिक रही हैं। किसान ज्यादा दिन खेत में रोक नहीं सकता तो आसपास के गांवों-कस्बों में औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं।

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के टिकैतगंज कस्बे में रामधर वर्मा आजकल दिनभर सड़क किनारे खीरा और लौकी बेचते हैं। वो कहते हैं, "सब्जियों की खेती तो मैं कई वर्षों से कर रहा हूं लेकिन सड़क पर बेचने का काम कभी नहीं किया। इस बार एक एकड़ जमीन बटाई (लीज) पर लेकर खीरा और लौकी बोई थी। पिछली बार लौकी 40 रुपए किलो गई थी, इस गांव में कोई 20 रुपए में ले नहीं रहा। कई हजार की लागत लगी है। खेत वाले को भी पैसे देने हैं, इसलिए सड़क किनारे बेच रहा हूं।"

"सब्जियों की खेती तो मैं कई वर्षों से कर रहा हूं लेकिन सड़क पर बेचने का काम कभी नहीं किया। इस बार एक एकड़ जमीन बटाई (लीज) पर लेकर खीरा और लौकी बोई थी। खेत वाले को भी पैसे देने हैं, इसलिए सड़क किनारे बेच रहा हूं।" रामधर वर्मा, सब्जी किसान

देश में लघु और सीमांत किसान ही ज्यादातर सब्जियों की खेती करते हैं। सब्जियों की खेती में अगर लागत और मेहनत ज्यादा आती है तो मुनाफा भी उसी अनुरूप होता है लेकिन इस बार मुनाफा तो दूर किसानों की लागत नहीं निकल पा रही है।

राजस्थान में जयपुर से 400 किलोमीटर दूर झालावाड़ जिले में बाडोन गांव के किसान बाल मुंकुंद डांगी ने लॉकडाउन के पहले हफ्ते में अपना करीब 40 कुंटल खीरा (न्यूनतम कीमत 60 हजार रुपए थोक) में गायों को खिला दिया क्योंकि पुलिस के डर से कोई ट्रक चालक खीरा लेकर जयपुर आने को तैयार नहीं था। और खीरा हर रोज तोड़ना पड़ता है।

भारत में फल और सब्जियों की खेती में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। भारतीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2004-05 में भारत में 101.2 मिलियन टन सब्जी की पैदावार हुई थी जो वर्ष 2017-18 में बढ़कर 184.40 मिलियन टन तक पहुंच गई।

इसका दूसरा पहलू ये है कि विश्व में फल और सब्जी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश अपनी खराब सप्लाई चेन, ट्रांसपोटेशन और कोल्ट स्टोरेज की पर्याप्त व्वयस्था न होने से हर साल करीब 13,300 करोड़ रुपए के उत्पादन बर्बाद कर देता है। ये रिपोर्ट कुछ साल पहले इमर्सन क्लाइमेट टेक्नोलाजीज इंडिया जो अमेरिका की विनिर्माण व प्रौद्योगिकी कंपनी इमर्सन की शाखा है, ने जारी की थी।

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2 साल पहले कृषि मंत्रालय ने संसद की एक स्टैंडिंग कमेटी के सामने कृषि मंत्रालय ने माना था देश हर साल एक लाख करोड़ रुपए का पोस्ट हार्वेटिंग नुकसान होता है। यानि फसल कटने के रखरखाव न होने से, जिसमें सबसे बड़ी मात्रा फल और सब्जियों की होती है।

ये आंकड़ा संसद में मिनिस्टर ऑफ फूड एंड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज रामेश्वर तेली ने उपलब्ध कराया था। लोकसभा में प्रस्तुत इस रिपोर्ट को केंद्रीय कटाई उपरांत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (CIPHET) ने तैयार किया था।

साल 2018 में सरकार ने ये बर्बादी रोकने के लिए ऑपरेशन ग्रीन भी शुरु किया था। साल 2020-21 के बजट में भी स्पेशल ट्रेन समेत कई प्रावधान किए गए थे।

"लॉकडाउन के दौरान कई चीजें ऐसे हुई हैं जिससे मुझे लगता है आने वाले समय में नई व्यवस्था शुरु होगी। जैसे ट्रांसपोटेशन और कोल्ड चेन। अगर हमारी कोल्ड चेन सही होती तो किसानों को इस तरह की दिक्कतें नहीं आती।" देश के कई राज्यों में किसान संगठनों के साथ कार्यरत भूमिजा संगठन से जुड़ी गौरी सरीन कहती हैं। गौरी सरीन ग्रुरग्राम में रहती हैं और लॉकडाउन के दौरान किसान और शहर के उपभोक्ताओं के बीच एक ब्रिज बनाने का काम कर रही हैं।

कई राज्यों ने लॉकडाउन में किसानों खासकर फसल कटाई और सब्जी उप्पादकों के लिए विशेष छूट का इंतजाम किया है। किसान संगठन भी सब्जी उत्पादकों के लिए विशेष राहत की मांग कर रहे हैं। किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र चौधरी लिखते हैं, "अगले एक साल के लिए कृषि उत्पाद विपणन अधिनियम और आवश्यक वस्तु अधिनियम को शिथिल करते हुए किसानों और थोक व्यापारियों को मंडी व्यवस्था के बाहर कहीं भी सीधे खरीद-बिक्री करने की आज्ञा दे देनी चाहिए। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी खाद्य श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है अतः इन्हें और इनसे जुड़े उद्योगों को भी निर्बाध चलने की अनुमति देनी होगी।"

देश के कई राज्यों में किसानों से बात करने पर पता चलता है ज्यादातर किसान चाहते हैं कोरोना से निपटने के लिए लॉकडाउन सही है लेकिन किसान की फसलें क्योंकि इंतजार नहीं कर सकती इसलिए मार्केट उपलब्ध रहे वर्ना सप्लाई चेन टूट सकती है।

संदीप सिंह कहते हैं, "सब्जियों की तैयारी आज नहीं 100 दिन पहले से होती है। जो मार्च-अप्रैल में फसलें काट रहे हैं बहुत नुकसान में हैं लेकिन जो किसान कई महीने पहले से बेच रहे थे उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं है। जैसे मेरा ही मिर्च और टमाटर 60-70 फीसदी निकल चुका था, मुनाफा भी हुआ लेकिन छोटे किसान परेशान हैं, सरकार को उनके लिए कुछ करना चाहिए।"

दिल्ली की आजादपुर और गाजीपुर मंडी के कारोबारी मनोज दुबे कहते हैं, "लॉकडाउन का असर सब पर है सब्जी को खेत में ज्यादा दिन रोक नहीं सकते और कहीं रखने का इंतजाम नहीं इसलिए कुछ ज्यादा है। हमारा मुकाबला ऐसे दुश्मन है जो दिखाई नहीं देता इसलिए लोग खुद भी कम निकल रहे, तो खपत कम है।"

आखिर में वो जोड़ते हैं, " दूसरी बात फल और सब्जियों का पूरा कारोबार आखिर में लोकल वेंडर (ठेले वालों और बाजारों) पर निर्भर है, सरकार ने बहुत छूट दी है लेकिन इनके निकलने तक बाजार, किसान और उपभोक्ता सबको ऐसे ही नुकसान होगा।"

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