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लॉकडाउन: चाय बागानों में काम करने वाले 12 लाख मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   10 April 2020 11:45 AM GMT

लॉकडाउन: चाय बागानों में काम करने वाले 12 लाख मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट

लॉकडाउन का जैसा असर देश के दूसरे कृषि उत्पादों पर पड़ रहा है, असम और पश्चिम बंगाल के चाय बागानों पर भी वैसा ही असर है। कई राज्यों में गेहूं किसान कटाई को लेकर परेशान हैं तो असम, पश्चिम बंगाल के चाय बागानों के मालिक पत्तों की तुड़ाई तो मजदूर अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। चाय के पूरे कारोबार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

चाय बागान मालिकों के सबसे बड़े संगठन द कंसल्टेटिव कमिटी ऑफ प्लांटेशन एसोसिएशंस (सीसीपीए) ने अपने अनुमान में बताया है कि लॉकडाउन के चलते देश के चाय उद्योग को कम से कम 1,400 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। संगठन ने केंद्र सरकार से राहत पैकेज की मांग की है और कहा है कि इस समय लगभग 12 लाख मजदूरों की रोजी-रोटी खतरे में है। चाय निर्यात पर जो असर पड़ रहा है कि उसका असर भी लंबे समय तक रहेगा।

केंद्र सरकार ने कहा है कि लॉकडाउन के दौरान चाय बागानों में 50 फीसदी कर्मचारियों के साथ काम किया जा सकता है, लेकिन मजदूरों की कमी और स्थानीय प्रशासन की वजह से यह नहीं हो पा रहा है।

असम के जिला सिवसागार के एक चाय बागान में मजदूरी करने वाले नबाज्योति सैकिया (52) गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "इस समय तो हम ओवर टाइम भी करते थे। वैसे तो रोजना 150-160 रुपए की कमाई होती थी लेकिन इस समय 250-300 रुपए का काम हो जाता था। जबसे लॉकडाउन शुरू हुआ है तब से काम बंद है। रोज पता करता हूं, कभी कहते हैं कि काम होगा, कभी कहते हैं कि नहीं होगा।"

इंडीयन टी बोर्ड के अनुसार असम देश का सबसे बड़ा चाय उत्पादक राज्य है। देश में कुल चाय उत्पादन में 50 फीसदी असम का और एक चौथाई हिस्सा पश्चिम बंगाल का है। इसके अलावा केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में भी चाय के बागान हैं। इन बागानों से लगभग 30 लाख लोग प्रत्यक्ष और पत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। इनमें एक बड़ी संख्या मजदूरों की है।

चाय उत्पादक राज्यों का ब्योरा। सोर्स- टी बोर्ड ऑफ इंडिया

सीसीपीए के अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल के चाय कारोबारी विवेक गोयनका कहते हैं, "बागान मालिक और मजदूर इस समय भयंकर संकट से गुजर रहे हैं। हमें सरकारी मदद की जरूरत है, तभी ये कारोबार बच पायेगा। हमने अपने सदस्यों से बात करने के बाद केंद सरकार को पत्र लिखा है जिसमें मांग की है कि अगले तीन महीने तक मजदूरों के खाते में हर सप्ताह एक हजार रुपए भेजे जायें। फौरी तौर पर इससे मजदूरों को काफी मदद मिलेगी।"

दुनिया की सबसे बेहतरीन चाय पर संकट के बादल

दार्जिलिंग के पहाड़ों पर होनी वाली दार्जिलिंग की चाय पर इस समय सबसे ज्यादा संकट में है। इसे सबसे बेहतरीन चाय कहा जाता है। पूरी दुनिया में इसकी मांग होती है। इस कारण इसका एक बड़ा हिस्सा निर्यात होता है। वर्ष 2011 में यूरोपिय संघ ने इसकी खासियत को देखते हुए इसे जियोग्राफिकल इंडिकेशंस टैग (विशिष्ट वस्तु को कानूनी अधिकार) का दर्जा दिया था।

दार्जिलिंग की सबसे बेहतरीन चाय पहली बार चुनी गई पत्तियों से बनती हैं। पत्तों की तुड़ाई को फ्लश कहा जाता है। यानी पहले फ्लश के दौरान जो पत्तियां निकलती हैं, उसी से बनती है दार्जिलिंग की प्रसिद्ध चाय, लेकिन इस बार लॉकडाउन की वजह से पत्तों की तुड़ाई नहीं हो पाई।

दार्जिलिंग चाय के बागान। पत्तियां तोड़ी नहीं जा सकीं जिस कारण उनका साइज बढ़ता जा रहा है। अब दूसरे फ्लश से पहले इन्हें छांटना पड़ेगा।

दार्जिलिंग के चाय बागान के मालिकों के लिए पहला फ्लश कितना जरूरी था, इसे ऐसे समझिये कि इस दौरान चुनी गई पत्तियों से जो चाय बनती है उससे सालभर होने वाली कमाई का 40 फीसदी पैसा इसी से आता है। कुल उत्पादन का लगभग 20 फीसदी हिस्सा पहले फ्लश से ही आता है। दार्जिलिंग प्लांटर्स एसोसिएशन के अनुसार दार्जिंलिंग पर्वतीय क्षेत्र में लगभग 300 चाय बागान हैं जिनसे सालाना लगभग 80 लाख किलो चाय का उत्पादन होता है।

वैसे तो हर साल पहले फ्लश का काम मार्च के दूसरे सप्ताह से शुरू हो जाता था, लेकिन इस साल बारिश देर होने के कारण मार्च के तीसरे सप्ताह में शुरू हुआ। पत्तों की तुड़ाई शुरू ही हुई थी कि लॉकडाउन का ऐलान हो गया। अगर लॉकडाउन नहीं होता तो मजदूर हर सप्ताह पत्तियां चुनने बागानों में जाते।


इस बारे में चाय बागानों के संगठन दार्जिलिंग प्लांटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बिनोद मेहता बताते हैं, "पत्तियां चुनी नहीं जा सकी जिस कारण वे बढ़ती जा रही हैं। उनसे अब चाय भी नहीं बन सकती। टी बोर्ड ऑफ इंडिया ने बागान मालिकों से पत्तियों को छांटने के लिए कहा तो है लेकिन इससे नुकसान कम नहीं होने वाला है। जब तक लॉकडाउन खत्म होगा तब तक बहुत नुकसान हो चुका रहेगा। दार्जिलिंग के चाय बागानों को कम से कम 200 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। 15 अप्रैल को लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी हालात बहुत ज्यादा नहीं बदलने वाले। नुकसान और बढ़ेगा ही।"

मार्च के बाद दूसरा फ्लश मई में होता है। अब अगर 15 अप्रैल को लॉकडाउन खत्म भी होगा तो पहले पुरानी खराब हो चुकी पत्तियों को छंटनी करनी होगी और नई पत्तियां आने में कम से कम 15 दिन का वक्त लगता है। मतलब दूसरे फ्लश के समय भी बागान मालिकों को कोई फायदा नहीं होगा।

सबसे ज्यादा संकट छोटे चाय उत्पादकों पर है जिनकी संख्या देश में दो लाख से ज्यादा है।

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देश में चाय के कुल रकबे की बात करें तो लगभग छह लाख हेक्टेयर क्षेत्र में चाय बागान हैं जिनमें लगभग दो लाख 15 हजार हेक्टेयर के बागान छोटे चाय उत्पादकों के हैं।

ऐसे ही एक बागान संचालक हैं दत्ता प्लांटेशन प्राइवेट लिमिटेड के मालिक संजोय दत्ता। दार्जिलिंग के छावाफली टी स्टेट में इन्होंने लगभग 600 एकड़ में फैले बागान को लीज पर लिया है। वे कहते हैं, "मेरे बागान में लगभग 700 मजदूर काम करते थे। इस समय तुड़ाई तेज हो जाती थी। प्रतिदिन लगभग 15 से 20 हजार किलो चाय पत्ती निकलती, लेकिन अभी सब बंद है। पहला फ्लश पूरा बर्बाद हो चुका है। दूसरे की उम्मीद भी कम है। हमारे लिए दिक्कत ज्यादा है। हमें तो बागान के पैसे भरने ही पड़ेंगे, काम हो या ना। लॉकडाउन खत्म होते-होते तो हमारा बहुत नुकसान हो चुका रहेगा।"

पश्चिम बंगाल में लगभग 148,121 हेक्टयेर में चाय के बागान हैं। इसमें 37,000 से ज्यादा छोटे चाय उत्पादक हैं जबकि बड़े ग्रोवर्स की संख्या 450 से ज्यादा है। लगभग 344 मिलियन किलो ग्राम चाय उत्पादन के साथ पश्चिम बंगाल दूसरे और 701 मिलियन किलो ग्राम चाय उत्पादन के साथ असम देश में पहले नंबर है।


भारतीय लघु चाय उत्पादक संघ के अध्यक्ष बिजोय गोपाल चक्रबोर्ती कहते हैं, "बड़े चाय उत्पादकों के पास तो अपनी कंपनियां भी होती हैं। वे लोग किसी तरह से यह सब झेल भी लेंगे, लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत छोटे चाय बागान मालिकों को है, क्योंकि ये लोग पत्तियां बड़े बागानों को ही देते हैं। ऐसे में अभी पूरा सिस्टम ही बिगड़ा हुआ है। पहला फ्लश तो पूरा बर्बाद हो गया। अभी पश्चिम बंगाल के छोटे बागान मालिकों को कम से कम 500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। पूरे देश की बात करें तो यह नुकसान लगभग 1,300-1,400 करोड़ रुपए का है। केंद्र सरकार ने कहा कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए 50 फीसदी कर्मचारी काम कर सकते हैं लेकिन अब जाकर प्रदेश सरकार ने 15 फीसदी कर्मचारियों को काम करने की इजाजत दी है लेकिन पूरी जानकारी नहीं मिली है।"

"तीन महीने बाद तो हमारा काम शुरू हुआ, पत्तियां तैयार होने में इतना समय लगता है। और जब काम का समय शुरू हुआ तो लॉकडाउन आ गया। हम केंद्र सरकार को पत्र लिख रहे हैं, जिसमें हमारी मांग है कि छोटे चाय उत्पादकों को प्रति हेक्टेयर कम से कम 59,990 रुपए की सब्सिडी दी जाये।" बिजोय गोपाल आगे बताते हैं।

असम की स्थिति भी गड़बड़

चाय उत्पादन के मामले में असम देश का सबसे बड़ा राज्य है। यहां एक लाख से ज्यादा छोटे और 750 से ज्यादा बड़े ग्रोवर्स लगभग 33 लाख हेक्टयेर में फैले चाय बागानों को संभालते हैं। यही नहीं, असम चीन के बाद सबसे बड़ा चाय उत्पादक क्षेत्र है। असम की लगभग 17 फीसदी आबादी चाय के कारोबार से जुड़ी हुई है, लेकिन लॉकडाउन ने सब कुछ रोक सा दिया है।

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असम के चाय बागान 22 मार्च से बंद हैं। पहले फ्लश का चक्र यहां भी बर्बाद हो गया। बागानों में झाड़ियां बढ़ने लगी हैं।

नार्थ ईस्ट टी एसोसिएशन असम के सलाहकार विद्यानंद बरकाकती बताते हैं, "जाड़ा और पाला से हम पहले से ही परेशान थे और अब कोरोना का कहर। आने वाले 15 दिन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। हालात नहीं बदले तो ये साल भी हमारे लिए नुकसान वाला ही साबित होगा। अच्छी गुणवत्ता के लिए पत्तों की पहली चुनाई नहीं हो पाई, इससे हमें करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है। केंद्र सरकार के फैसले के बाद भी यहां काम शुरू नहीं हो पाया, लेकिन इसे बहुत दिनों तक बंद नहीं किया जा सकता।"

"प्रदेश सरकार के आदेश के बाद जिलाधिकारी बागान मालिकों से बात कर रहे हैं और बीच का रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे हैं। अकेले असम में छोटे बागानों में तीन लाख और बड़े बागानों में लगभग सात लाख मजदूर काम करते हैं जबकि इससे कारोबार से लगभग 10 लाख लोग और जुड़े हुए हैं। प्रदेश की आर्थिक स्थिति चाय बागानों पर निर्भर है। ऐसे में अगर जल्द ही इस पर कुछ फैसला नहीं लिया जाता तो भारी नुकसान होगा।" वे आगे बताते हैं।

सामान्य दिनों में चाय की पत्तियों को चुनते मजदूर।

"फूड प्रोसेसिंग मिनिस्ट्री के तहत चाय जरूरी फूड प्रोडक्ट की लिस्ट में है। ऐसे में जरूरी है कि बागानों का धीरे-धीरे शुरू किया जाये।" विद्यानंद बरकाकती बताते हैं।

एक सवाल यह भी है कि जब केंद्र सरकार ने 50 फीसदी कर्मचारियों के साथ काम करने की इजाजत दी है तो बागानों में काम ठप क्यों है ? इस बारे में हमनें टी बोर्ड ऑफ इंडिया से भी बात की।

इंडियन टी बोर्ड के उप निदेशक डॉ ऋषिकेश राय गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "केंद्र सरकार ने छूट तो दी है लेकिन उसे लागू करना प्रदेश सरकार के हाथ में है। प्रदेश सरकार को इस ओर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। असम में पहले काम शुरू होने वाला था लेकिन मजदूर संघों के दबाव के बाद बंद करना पड़ा, मजदूरों के स्वास्थ्य को लेकर उनकी चिंता जायज है। छोटे बागानों में काम हो भी सकता है लेकिन बड़े बागानों में मुश्किल है। कुल मिलाकर इस साल पैदावार प्रभावित होगी।"

मजूदरों की चिंता बढ़ी

असम और पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों की हालत पहले से ही खराब है। लंबे समय से इनकी सुविधाओं और मजदूरी दरों में बढ़ोतरी की मांग भी चल रही है। बागानों में काम कर रहे मजदूर और मजदूर संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि उन्हें भी न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के तहत मजदूरी मिले।

पश्चिम बंगाल के बागानों में लगभग साढ़े चार लाख और असम में आठ लाख मजदूर काम करते हैं। केरल में न्यूनतम मजदूरी 310 रुपए है। कर्नाटक और तमिलनाडु में यह क्रमशः 263 और 241 रुपए रोजाना, लेकिन असम के मजदूरों को एक दिन में काम के बदले 167 और पश्चिम बंगाल में यही दर 176 रुपए है। इस तरह देखेंगे तो देश के दूसरे चाय उत्पादक राज्यों की अपेक्षा इन दोनों राज्यों में चाय बागान में मजदूरी दर बहुत कम है।

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चाय बागान प्लाटेंशन लेबर एक्ट, 1951 के तहत आते हैं। इस एक्ट के तहत बागान मालिक श्रमिकों के रहने, खाने-पीने और शिक्षा संबंधी जरूरतें पूरी करते हैं। इसीलिए यहां काम करने वाले मजदूरों को अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा नकद भुगतान कम किया जाता है।

भारतीय ट्रेड यूनियन केन्द्र दार्जिलिंग के जिला सचिव और 29 चाय व्यापार संघ की टीम ज्वाइंट फोरम का नेतृत्व कर रहे सुमन पाठक गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "अभी तो एक सप्ताह तक मजदूरों को पैसे और राशन दोनों मिले, लेकिन समस्या अब शुरू होने वाली है। बागाना मालिकों को कहना है कि जब काम ही नहीं चलेगा तो हम पैसे कैसे देंगे। मजदूरी दर तो हमारे यहां पहले से ही कम है, और दिक्कत और बढ़ सकती है।"

सुमन पाठक चाय बागानों के भुखमरी के इतिहास का भी जिक्र करते हैं। वे कहते हैं, "बागानों में भुखमरी कोई नयी बात नहीं है। हालात वैसे ही इस बार भी बन सकते हैं। बागान मालिक कहां से कहां से पहुंच गये लेकिन मजदूर वहीं के वहीं हैं। अब अगर काम शुरू नहीं हुआ तो स्थिति बहुत बिगड़ सकती है।"


यूनाइटेड टी वर्कर्स फ्रंट की वर्ष 2017 में आई रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2002 से 2014 के बीच अकेले पश्चिम बंगाल के बागानों में कुपोषण और भूख से 1000 से ज्यादा बागान मजदूरों की मौत हो गई थी। इस दौरान जहां 23 बागान बंद हो गये तो वहीं एक लाख से ज्यादा मजदूर बेरोजगार भी हुए थे।

केंद्रीय श्रम संगठन सीटू के संयोजक जियाउल आलम चाय बागानों में कार कर रहे मजदूरों की आवाज लंबे समय से उठाते रहे हैं। उन्होंने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया, "भुगतान के मामले में चाय बागानों का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है। दूसरे राज्यों की अपेक्षा मजदूरी दर हमारे पहले से ही बहुत कम है। अभी तो बागान मालिक सरकार के दबाव में भुगतान कर रहे हैं, आगे भी करेंगे, यह कह नहीं सकता।"

निर्यात पर असर, आगे और बिगड़ेंगे हालात

ईरान, चीन और जर्मनी भारतीय चाय के बड़े खरीदार देश हैं। इनमें से चीन और ईरान ने अपने देश में चाय आयात को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया है। दूसरे कई छोटे देशों ने भी आयात को रोक दिया है। इसका असर यह पड़ा है कि जिस चाय की कीमत पिछले साल इस समय 200 रुपए प्रति किलो थी वह अभी ही 100-110 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है, जबकि कोरोना का असर कब तक रहेगा, इसका भी कुछ नहीं पता।

वर्ष 2019 में चाय उद्योग ने 3,740 करोड़ रुपए का विदेश व्यापार किया था।

एशियन टी एक्सपोर्टस के मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रमुख निर्यातकों में से एक मोहित अग्रवाल कहते हैं, "चायपत्ती की कीमतें घटकर 120-130 रुपए प्रति किलो पर आ गई हैं, जो पिछले साल इसी समय 200 रुपए प्रति किलो थीं। चीन और ईरान को निर्यात तो बंद ही हैं। अगर सब कुछ जल्द ठीक नहीं हुआ तो इस साल निर्यात को तगड़ी चोट पहुंचने वाली है।"


इंडियन टी बोर्ड के अनुसार चीन ने 2019 में भारत से 1.345 करोड़ किलो काली चायपत्ती आयात की थी। इसके साथ ही वह श्रीलंका को पीछे छोड़ते हुए भारतीय ब्लैक टी का सबसे बड़ा खरीदार बन गया था। चीन में ग्रीन टी की खेती होती है।

"चीन में भारतीय ब्लैक टी की मांग पिछले पांच सालों में चार गुना तक बढ़ी है। वर्ष 2014 में चीन ने भारत से 36 लाख किलो ब्लैक टी आयात किया था। 25 जनवरी के बाद चाय की कोई खेप चीन नहीं गई है। अगली खेप कब जायेगी, यह भी किसी को नहीं पता।" मोहित बताते हैं।

देश की सबसे बड़ी चाय उत्पादक कंपनियों में से एक जय श्री टी इंडस्ट्रीज के मैनेजर (विदेश बिक्री) विशाल शाह कहते हैं, "यह वह समय है जब विदेशों से व्यापारी असम और दार्जिलंग के चाय बागानों में आते हैं और चाय टेस्ट करने के बाद ऑर्डर देते हैं। अब जब सब बंद हो तो आ नहीं पाये। हो सकता है कि अगले 15-20 दिनों में सब कुछ ठीक हो जाये, लेकिन निर्यात पर इस साल बहुत असर पड़ने वाला है। कीमतों में गिरावट भी देखने को मिलेगी।"

दुनिया के शीर्ष तीन बड़े चाय उत्पादक देशों में शुमार भारत के चाय निर्यात में पहले से गिरावट देखी जा रही है। वर्ष 2019 के पहले 11 महीनों में चाय के निर्यात में वर्ष 2018 की अपेक्षा कमी आई थी। चाय बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार जनवरी से नवंबर 2019 की अवधि में चाय का निर्यात 22 करोड़ 77.1 लाख किलो का हुआ जबकि वर्ष 2018 की समान अवधि के दौरान 23 करोड़ 13.6 लाख किलोग्राम का चाय निर्यात हुआ था। इस दौरान ईरान सबसे बड़ा खरीदार देश था। ईरान ने भारत से 4 करोड़ किलो से ज्यादा का चाय आयात किया था।

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