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Lockdown : 'हमारे गांवों में जिन मजदूरों को मनरेगा का सहारा था, वो चार दिन से आलू उबाल कर खा रहे हैं'

कोरोना लॉकडाउन के समय में देश के लाखों मजदूर जहाँ भुखमरी से बचने के लिए अपने गाँव की और लौट रहे हैं, वहीं गांवों में रहकर मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों के सामने भी भुखमरी जैसे हालात हैं।

Kushal MishraKushal Mishra   1 April 2020 2:53 PM GMT

Lockdown : लॉकडाउन के बाद काम न मिलने से मुश्किल में देश के मनरेगा मजदूर । फोटो : गाँव कनेक्शन

कोरोना लॉकडाउन के समय में देश के लाखों मजदूर जहाँ भुखमरी से बचने के लिए अपने गाँव की और लौट रहे हैं, वहीं गांवों में रहकर मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों के सामने भी भुखमरी जैसे हालात हैं। लॉकडाउन के आठ दिन बीत चुके हैं और इन मजदूरों को अभी तक फरवरी की मजदूरी का भी पैसा नहीं मिल सका है।

"हमारे गांव में जिन मजदूरों को मनरेगा का सहारा था, वो चार दिन से आलू उबाल कर खा रहे हैं, जब खुद सामने जाकर देखा तो बहुत दुःख हुआ, गांव के हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि उनको राशन-पानी मुहैय्या कराया जाए, मगर स्थिति बहुत ही भयावह है," बिहार के चितौरिया ग्राम पंचायत के प्रधान जितेंद्र पासवान बताते हैं।

बिहार के मनसाही ब्लॉक के जिस ग्राम पंचायत में जितेंद्र रहते हैं वहां सभी छोटे किसान हैं और ज्यादातर आलू ही उगाते हैं। लॉकडाउन के सातवें दिन जितेंद्र फ़ोन पर बताते हैं, "सब बंद है, खेतों में भी काम बंद है जो इन मजदूरों को कुछ पैसा मिल सके, काम करे भी तो पुलिस परेशान करती है, ये लोग भुखमरी के कगार पर हैं, इन मजदूरों के लिए अभी तो सरकारी दुकान से राशन भी नहीं मिल रहा।"

देश के प्रवासी मजदूरों की समस्याओं से इतर केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के समय में गांवों के मनरेगा मजदूरों के लिए दो फैसले लिए, मगर दोनों ही फैसलों पर सवालिए निशान उठ रहे हैं।

कई राज्यों में मनरेगा के श्रमिकों को बीते महीनों में किये काम का पैसा नहीं मिला । फोटो : गाँव कनेक्शन

सरकार ने मनरेगा में 4,431 करोड़ रुपए की धनराशि देने का ऐलान किया है, इस धनराशि से मजदूरों की बकाया मजदूरी के भुगतान के साथ-साथ बकाया सामग्री का भुगतान 10 अप्रैल तक (लॉकडाउन की समयसीमा 14 अप्रैल से चार दिन पहले तक) किया जाना है।

इससे पहले एक और फैसला केंद्र सरकार ने मनरेगा मजदूरों की राष्ट्रीय औसत मजदूरी दर में 20 रुपए बढ़ाने का लिया है जो एक अप्रैल से लागू होगा, मगर सवाल यह है कि जब मनरेगा में लॉकडाउन के समय काम ही बंद है तो मजदूरों को बढ़ी मजदूरी का क्या फायदा होगा।

कर्नाटक में रायपुर जिले के कोटकुन्दे पोस्ट के मामुरेट्टी गांव में करीब 700 लोग मनरेगा में काम करके रोजी-रोटी चलाते हैं। गांव के इन मजदूरों को जनवरी से मजदूरी का पैसा नहीं मिला है।

जनवरी से हम लोगों को मजदूरी नहीं मिली है, घर से बाहर निकलने नहीं दे रहे, घर में भी चावल-आटा ज्यादा नहीं बचा है, राशन की दुकान में भी कुछ नहीं मिल रहा, हम लोग बहुत परेशान हो चुके हैं।

नगप्पा सगमकुंता, मनरेगा मजदूर, मामुरेट्टी गांव, रायपुर जिला, कर्नाटक

इसी गांव के मनरेगा मजदूर नगप्पा सगमकुंता फ़ोन पर बताते हैं, "जनवरी से हम लोगों को मजदूरी नहीं मिली है, घर से बाहर निकलने नहीं दे रहे, घर में भी चावल-आटा ज्यादा नहीं बचा है, राशन की दुकान में भी कुछ नहीं मिल रहा, हम लोग बहुत परेशान हो चुके हैं।"

"घर में सिर्फ हज़ार-पंद्रह सौ रुपए बचा हुआ पड़ा है, यह भी खत्म हो गया तो क्या खाएंगे। राशन की दुकान पर बोलते हैं कल से मिलेगा, कल-कल करते-करते आज (1 अप्रैल) भी राशन नहीं मिला है, हम लोगों की मदद कीजिये," नगप्पा आगे कहते हैं।

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कर्नाटक से करीब 1400 किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ में भी मनरेगा मजदूर मुश्किल में हैं। उनके हाथ में भी पैसा नहीं है और लॉकडाउन की वजह से मनरेगा में काम बंद हो चुका है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के लखनपुर ब्लॉक के लोसंगा ग्राम पंचायत के प्रधान हरिलाल लाकरा बताते हैं, "मार्च में मनरेगा का काम गांव में चल रहा था मगर अब पूरी तरह बंद कर दिया गया है। मजदूरों को अब तक फ़रवरी का पैसा भी नहीं मिला है। कम से कम लॉकडाउन से पहले सरकार को उनका पैसा दे देना चाहिए था।"

राशन की सुविधा मिलने के सवाल पर प्रधान हरिलाल कहते हैं, "प्रशासन की ओर से हमें कल (लॉकडाउन के सातवें दिन) गांवों के निराश्रित गरीबों की मदद के लिए 5000 रुपए और एक कुंतल चावल मिला है। अब हमारे गांवों में करीब ऐसे 2000 लोग बेहद गरीब हैं और ज्यादातर मनरेगा और खेतों में मजदूरी पर आश्रित हैं, हम अब इन गरीबों तक मदद पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, चौदह अप्रैल तक (लॉकडाउन की समयसीमा) देखिए इन लोगों को न जाने कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।"

असल में ग्रामीण भारत के लोगों को रोजगार की गारंटी देने वाली योजना मनरेगा पहले से ही उधारी पर चल रही है। देश के कई राज्यों में मजदूरों को कई महीनों से मजदूरी का भुगतान नहीं मिला है, ऐसे में 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा से ये मजदूर और भी बड़ी मुसीबत में फँस चुके हैं।

असल में ग्रामीण भारत के लोगों को रोजगार की गारंटी देने वाली योजना मनरेगा पहले से ही उधारी पर चल रही है। देश के कई राज्यों में मजदूरों को कई महीनों से मजदूरी का भुगतान नहीं मिला है, ऐसे में 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा से ये मजदूर और भी बड़ी मुसीबत में फँस चुके हैं।

देश में मनरेगा मजदूरों के लिए काम कर रही नरेगा संघर्ष मोर्चा के अनुसार 28 मार्च, 2020 तक मनरेगा में बकाया भुगतान 15,700 करोड़ रुपए है। इसमें 6000 करोड़ रुपए सिर्फ मनरेगा मजदूरों की ही बकाया मजदूरी है जबकि 9,700 करोड़ रुपए सामग्री भुगतान का बकाया है। ऐसे में लॉकडाउन के समय में केंद्र सरकार की ओर से मजदूरी और सामग्री के लिए जारी 4,431 करोड़ रुपए कहीं से भी पर्याप्त नहीं हैं।

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लॉकडाउन के समय में मनरेगा मजदूर भी खाली हाथ । फोटो : गाँव कनेक्शन

नरेगा संघर्ष मोर्चा से झारखण्ड से जुड़े देबमाल्या नंदी 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "केंद्र सरकार ने लॉकडाउन में जो मनरेगा मजदूरों के लिए राहत के नाम पर धनराशि जारी की है, इससे मजदूरों को ज्यादा फायदा नहीं मिलने वाला है, क्योंकि 4,431 करोड़ रुपए में से सामग्री के भुगतान का पैसा हटाकर श्रमिकों को उनकी मजदूरी का कितना भुगतान किया जायेगा, यह तय नहीं है। जबकि सिर्फ मजदूरी का ही 6,000 करोड़ रुपए बकाया है। दूसरी बात पैसा 10 अप्रैल तक दिया जाना है ऐसे में लॉकडाउन के चार दिन ही शेष रह जायेंगे।"

देबमाल्या बताते हैं, "दूसरी ओर इस वित्तीय वर्ष में सिर्फ 6.4 प्रतिशत परिवारों को ही 100 दिन का रोजगार मिल सका है, अगर पिछले साल से तुलना करें तो इसमें भी 32 प्रतिशत की कमी आई है, जिन्हें 100 दिन का रोजगार मिला है। ऐसे में कई मजदूर ऐसे हैं जिनको काम नहीं मिल सका है और वो इस राहत धनराशि में भी नहीं आते। ऐसे में यह शर्मनाक है कि इस तरह के संकट के समय में सरकार ने जानबूझकर यह आंकड़े दिखाए कि उन्होंने मनरेगा मजदूरों को राहत प्रदान की है।"

महाराष्ट्र में भी कोरोना वायरस से लॉकडाउन की स्थिति में मनरेगा मजदूरों के हालात अच्छे नहीं हैं और वहां भी मजदूर राशन-पानी की व्यवस्था करने के लिए परेशान हो रहे हैं।

सरकार ने राशन देने की घोषणा की थी, मगर अभी तक हम लोगों को राशन नहीं मिला है, जो यहाँ के किसान हैं वो भी मजबूरी में गाँव में ही लोगों को अपनी उपज बेच रहे हैं, उन्हीं के भरोसे खाना-पीना हो रहा है। मजदूर, किसान सब बहुत मुश्किल में हैं।

शेख मलंग, ग्राम रोजगार सहायक, तरायबाड़ी ग्राम पंचायत, महाराष्ट्र

राज्य के नांदेड़ जिले के तरायबाड़ी ग्राम पंचायत में मनरेगा में ग्राम रोजगार सहायक शेख मलंग बताते हैं, "यहाँ तो मनरेगा मजदूरों को जनवरी से मजदूरी का पैसा नहीं मिला है, उनके सामने भी भूखों मरने जैसी स्थिति थी, मगर गाँव वालों से अनुरोध किया जा रहा है तो अब उनके लिए गाँव वाले राशन की व्यवस्था कर रहे हैं। मगर बहुत बुरी स्थिति है। हम जैसे कई रोजगार सहायकों को भी जनवरी से पैसा नहीं मिला है।"

सरकारी दुकान से राशन आपूर्ति के सवाल पर मलंग कहते हैं, "सरकार ने राशन देने की घोषणा की थी, मगर अभी तक हम लोगों को राशन नहीं मिला है, जो यहाँ के किसान हैं वो भी मजबूरी में गाँव में ही लोगों को अपनी उपज बेच रहे हैं, उन्हीं के भरोसे खाना-पीना हो रहा है। मजदूर, किसान सब बहुत मुश्किल में हैं।"

देश में मनरेगा मजदूरों की बात करें तो मनरेगा के तहत 13.62 करोड़ जॉब कार्ड धारक हैं, इनमें 8.17 करोड़ जॉब कार्ड धारक सक्रिय हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि लॉकडाउन के समय में इन मजदूरों के सामने भी रोजी-रोटी का उतना ही संकट है, जितना दूसरे राज्यों में काम कर रहे मजदूरों के सामने है।

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फोटो साभार : इंडिया टुडे

हालांकि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश के मनरेगा मजदूरों के लिए लॉकडाउन के समय में खास पहल की और लॉकडाउन के छठवें दिन 30 मार्च को 27.5 लाख मजदूरों के खातों में 611 करोड़ रुपये बकाया मजदूरी का पैसा भेजा ताकि उनका जीवन कोरोना वायरस के खतरे से प्रभावित न हो। इसके अलावा प्रदेश के 1.65 करोड़ परिवारों को मुफ्त में अनाज उपलब्ध कराने का भी ऐलान किया है।

इस बारे में उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के पिसावां ब्लॉक के अल्लीपुर गांव की रहने वाली मनरेगा मजदूर रामबेती बताती हैं, "सरकार ने फरवरी तक जो मजदूर काम किया है उसकी मजदूरी का पैसा भेजा है, हमारी तीन-चार पंचायतों में मजदूरों का पैसा आया भी है।" हालाँकि जिन मजदूरों को मनरेगा में काम नहीं मिला, रामबेती उस पर सवाल उठाते हुए कहती हैं, "ऐसे कई मजदूर हैं जिनको मनरेगा में काम नहीं मिला था, वो अभी भी खाली हाथ हैं, उनको कोई पैसा नहीं मिला है। सरकार को ऐसे संकट के समय में उनकी भी मदद करनी चाहिए।"

उत्तर प्रदेश के अलावा पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार ने भी मजदूर और गरीब वर्ग के राशन-पानी की व्यवस्था के लिए बड़ा फैसला लिया है। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने राज्य में छह महीने तक मुफ्त गेहूं और चावल बाटें जाने का ऐलान किया है। इससे राज्य के 7.5 करोड़ लोगों को फायदा मिलेगा।

इस बारे में पश्चिम बंगाल के पं. मेदिनीपुर जिले के दांता ब्लॉक के धनहालिया गांव के मनरेगा मजदूर संदीप सिंघा बताते हैं, "यहां की राज्य सरकार ने कम से कम हम लोगों के बारे में सोचा है और हम जैसे गरीब और मजदूर लोगों के लिए छह महीने तक फ्री राशन देने की घोषणा की है। अभी हम लोगों के पास कोई काम नहीं है, मगर सरकार हम लोगों के खाने-पीने की व्यवस्था कर रही है।"

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