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Lockdown : पीएम मोदी से मनरेगा मजदूरों को तत्काल मदद पहुंचाने का सोनिया गांधी का किया गया आग्रह आखिर क्यों जरूरी है?

देश में 21 दिनों के लॉकडाउन के समय में कांग्रेस अध्यक्ष और विपक्षी नेता सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर मनरेगा मजदूरों की तत्काल मदद करने के लिए गुहार लगाई है।

Kushal MishraKushal Mishra   3 April 2020 2:31 PM GMT

देश में 21 दिनों के लॉकडाउन के समय में कांग्रेस अध्यक्ष और विपक्षी नेता सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर मनरेगा मजदूरों की मदद करने के लिए गुहार लगाई है।

उन्होंने पत्र में लिखा कि ग्रामीण भारत के लोगों को ऐसे समय में राहत देने के लिए मनरेगा मजदूरों को 21 दिन का तत्काल अग्रिम भुगतान किया जाना चाहिए। सोनिया गांधी ने पत्र में यह भी लिखा कि इस अग्रिम राशि को बाद में काम शुरू होने पर श्रमिकों की मजदूरी से समायोजित भी किया जा सकता है।

ऐसे में कोरोना लॉकडाउन के बीच देश के मनरेगा मजदूरों के लिए सोनिया गांधी की पीएम मोदी से की गई गुजारिश आखिर क्यों जरूरी है, आइए इस पर एक नजर डालते हैं।

ग्रामीण भारत के लोगों को 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देने वाली मनरेगा योजना में देश के 13.62 करोड़ जॉब कार्ड धारक हैं, इनमें से 8.17 करोड़ जॉब कार्ड धारक सक्रिय हैं। ऐसे में इन आठ करोड़ से ज्यादा सक्रिय जॉब कार्ड धारकों को 21 दिनों की अग्रिम मजदूरी भेजने की अपील सोनिया गांधी ने पीएम मोदी से की है।

देश की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना फिलहाल पर्याप्त बजट न मिलने के अभाव में बुरे दौर से गुजर रही है। मनरेगा मजदूरों के लिए काम कर रही नरेगा संघर्ष मोर्चा के अनुसार 28 मार्च 2020 तक मनरेगा में 15,700 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया था।

इस धनराशि में सिर्फ मनरेगा मजदूरों का ही 6,000 करोड़ रुपये मजदूरी का बकाया है। शेष 9,700 करोड़ रुपये की धनराशि सामग्री भुगतान की बकाया है। ऐसे में 15 दिनों में मजदूरी के भुगतान की गारंटी देने वाली इस योजना में पहले से ही मजदूरों का भुगतान कई महीनों से रुका हुआ है।

अगर मनरेगा में राज्यवार मजदूरों के लंबित भुगतान की बात करें तो नरेगा संघर्ष मोर्चा के अनुसार केंद्र सरकार के फरवरी में आने वाले बजट से पहले 05 जनवरी तक विभिन्न राज्यों में इन तिथियों से 100 प्रतिशत मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया था।

इनमें सबसे ख़राब हालत केरल के मजदूरों के थे जिन्हें 29 जुलाई से मजदूरी नहीं मिली थी, इसके बाद पुड्डुचेरी में 19 सितंबर से, कर्नाटक, पंजाब और राजस्थान में क्रमश: 09, 29 और 10 अक्टूबर से भुगतान नहीं किया गया। इसके अलावा ओडिशा, आंध्र प्रदेश, हरियाणा और मेघालय में क्रमश: 06, 21, 26 और 28 नवम्बर से भुगतान नहीं किया गया था।

दिसम्बर में भी कई राज्यों के मजदूरों का भुगतान बकाया था, इनमें सिक्किम में 04 दिसम्बर से, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड में 12 से, हिमाचल प्रदेश में 17 से और छत्तीसगढ़ में 18 दिसम्बर से श्रमिकों को मजदूरी नहीं मिली थी।

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समय पर मजदूरी न मिलने से लॉकडाउन के समय बढीं मनरेगा मजदूरों की मुश्किलें । फोटो : गाँव कनेक्शन

ऐसे में लॉकडाउन से पहले देश के मनरेगा मजदूरों के हाथ पहले से ही खाली थे। इन मजदूरों के हाथ में पैसा नहीं था। वहीं लॉकडाउन के बाद खेतों में मजदूरी कर किसी तरह गुजारा चलाने का विकल्प भी इनसे छिन गया और फसलों की कटाई के इस मौसम में भी ऐसे मजदूरों का वैकल्पिक रोजगार उनके काम नहीं आ सका।

कर्नाटक में रायपुर जिले के कोटकुन्दे पोस्ट के मामुरेट्टी गांव में 700 से ज्यादा ग्रामीण मनरेगा पर आश्रित हैं। गाँव के मनरेगा मजदूर नगप्पा सगमकुंता 'गाँव कनेक्शन' से फ़ोन पर बताते हैं, "आखिरी बार हम लोगों को जनवरी में मजदूरी मिली थी, अब लॉकडाउन के बाद हम घर से बाहर भी नहीं निकल सकते, घर में सिर्फ हजार-पंद्रह सौ रुपए बचे पड़े हैं, अगर यह भी खत्म हो गया तो क्या खायेंगे, अभी तो हम लोगों को राशन भी नहीं मिल रहा है।"

वहीं कर्नाटक से 1800 किलोमीटर दूर राजस्थान के पाली जिले में रायपुर तहसील के कलालिया गाँव की रहने वाली मनरेगा मजदूर आशा देवी बताती हैं, "लॉकडाउन की वजह से गाँव के मजदूरों का बहुत बुरा हाल है। अभी तो मजदूर खेतों में भी काम नहीं कर सकते। हमारे यहाँ के कई मजदूर मजदूरी न मिलने पर उधार लेकर काम चलाते हैं, मगर वो भी इस समय बहुत परेशान हैं, सारा काम रुकने की वजह से उनके सामने रोजी-रोटी की बहुत दिक्कतें हैं।"

हालांकि केंद्र सरकार की और से 21 दिनों के लॉकडाउन के चलते मनरेगा मजदूरों के लिए राहत पैकेज का ऐलान किया गया है। इसमें मनरेगा मजदूरों के लिए सरकार ने दो फैसले लिए हैं, मगर इन दोनों ही फैसलों पर सवालिया निशान उठ रहे हैं।

लॉकडाउन के समय मनरेगा मजदूरों के पास खेतों में मजदूरी करने का वैकल्पिक रोजगार भी छिना। फोटो : गाँव कनेक्शन

पहला फैसला, सरकार ने लॉकडाउन के दूसरे दिन मनरेगा में 4,431 करोड़ की धनराशि 10 अप्रैल तक (लॉकडाउन खत्म होने के चार दिन पहले तक) देने का ऐलान किया, इसमें बकाया मजदूरी के भुगतान के साथ सामग्री के भुगतान का भी पैसा शामिल है। जबकि विभिन्न राज्यों के मजदूरों का ही सिर्फ 6,000 करोड़ रुपये मजदूरी का बकाया है, ऐसे में इस फैसले से मनरेगा मजदूरों को राहत मिलने की संभावना कम है।

दूसरा फैसला सरकार ने पहली अप्रैल से मनरेगा की राष्ट्रीय औसत मजदूरी 182 से 202 रुपये कर दी है, इससे भी मजदूरों को लॉकडाउन के समय फायदा नहीं मिलेगा क्योंकि लॉकडाउन के समय मनरेगा में काम ही बंद है।

नरेगा संघर्ष मोर्चा में झारखंड राज्य से जुड़े देबमाल्या नंदी बताते हैं, "सरकार की ओर जे मनरेगा मजदूरों के लिए राहत राशि जारी गई है, मगर यह शर्मनाक है कि इस तरह के संकट के समय में सरकार ने जानबूझकर यह आंकड़े दिखाए कि उन्होंने मनरेगा मजदूरों को राहत प्रदान की है। सरकार को देश के मनरेगा मजदूरों की तत्काल आर्थिक मदद करनी चाहिए।"

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि लॉकडाउन की वजह से और राज्यों में काम कर रहे प्रवासी मजदूरों की तरह मनरेगा मजदूरों के सामने भी बड़ी मुश्किलें हैं और उनके पास गुजर-बसर करने के लिए भी पैसा नहीं है। अब तक लॉकडाउन 09 दिन बीत चुके हैं और अभी भी 11 दिन शेष हैं। अब इस संकट के समय में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की देश के मनरेगा मजदूरों को 21 दिन की तत्काल अग्रिम मजदूरी भुगतान करने की अपील पर सरकार कितना ध्यान देती है, यह एक बड़ा सवाल है।

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