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टिड्डी हमला: "80 साल की उम्र में मैंने ऐसी टिड्डियां नहीं देखीं, ऐसा ही रहा तो कुछ नहीं बचेगा"

आपने कभी टिड्डियों के झुंड के हमले देखे हैं? टिड्डियों के मामले में देश में बिल्कुल वैसा ही हो रहा, जैसा चीन के वुहान और इटली में कोरोना वायरस फैलने के बाद हुआ था। लोगों को लगता था भारत या फिर उन तक नहीं पहुंचेगा, लेकिन जानलेवा परिणाम सामने हैं।

Arvind ShuklaArvind Shukla   11 July 2020 9:54 PM GMT

रात के करीब ढाई बज रहे थे, लेकिन बुजुर्ग महादेव को नींद नहीं आ रही थी। वे अपने घर से कुछ दूर चकरोड (कच्ची सड़क) पर बैठे कभी टॉर्च जलाकर अपने धान की फसल को देखते तो कभी आसपास के पेड़ों को। उनके इलाके में किसानों के लिए मुसीबत बनीं टिड्डियों ने हमला किया था। महादेव को चिंता थी कि सुबह तक फसल बचेगी या नहीं, उनके घर में भी टिड्डियां भर गई थीं।

"80 साल की हमारी उमर हो गई है, कभी ऐसा हादसा नहीं हुआ। मैंने ऐसी टिड्डियां कभी नहीं देखीं। आज शाम (11 जुलाई) को शाम साढ़े चार बजे हमला हुआ। हम लोग बाहर थे, घर नहीं जा पाए, क्योंकि वहां भी टिड्डियां ही हैं। अगर ये यहीं रुक गईं तो कोई फसल नहीं बचेगी।" बुजुर्ग महादेव, अपना अनुभव बताते हैं।

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सीतापुर में टिड्डियों से अपनी मूंगफली की फसल बचाने के लिए खेत में थाली बजाती महिला किसान। फोटो- अभिषेक वर्मा

खरीफ के सीजन में जब भारत के ज्यादातर इलाकों में धान, गन्ना, मक्का, मूंग, मूंगफली, अरंडी, सब्जियों की फसलें तैयार हो रही हैं तो ऐसे में टिड्डियाँ किसानों का दुश्मन बनकर सामने आयी हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात समेत 10 राज्यों के 100 से ज्यादा जिले टिड्डियों की चपेट में हैं। टिड्डियों के इन दलों में कई-कई अरब टिड्डियां होंती हैं, जो देखते ही देखते सैकड़ों एकड़ फसल चट कर जाती हैं।

बुजुर्ग किसान महादेव का घर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 140 किलोमीटर दूर, सीतापुर जिले में हरदोई की सीमा पर है। 11 जुलाई को फरुखाबाद और हरदोई के रास्ते पहुंचे एक बड़े टिड्डी दल ने जलाल नगर ग्राप पंचायत के आसपास रात में विश्राम किया था। टिड्डियां दिन में हवा के रुख के साथ उड़ान भरती हैं और रात में पेड़, पौधों झाड़ियों पर आराम करती हैं, इस दौरान भी ये लगातार खाती रहती हैं। टिड्डियों पर विश्राम करते वक्त रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है।

रात करीब तीन बजे किसान महादेव के घर आगे दमकलकर्मियों की मदद से टिड्डियों को मारने की कोशिश में जुटे सीतापुर के जिला कृषि रक्षा अधिकारी एसएन राम कहते हैं, "टिड्डियां करीब 5 किलोमीटर के इलाके में हो सकती हैं। हम लोगों को अंदेशा था टिड्डियां इस रूट के आसपास कहीं विश्राम कर सकती हैं, इसलिए तैयारी पूरी थी। सीतापुर के साथ ही लखीमपुर और हरदोई के भी कई अधिकारी आए हैं,मिलकर छिड़काव किया जा रहा है। बारिश के चलते कुछ दिक्कतें भी आ रही हैं।"

टिड्डियों की संख्या नियंत्रित करने की ये सरकारी कोशिश यहां रात 7 बजे के आसपास से चल रही थी जो अगले दिन अलग-अलग इलाकों में दिन भर चली। गांव कनेक्शन की टीम सुबह करीब 9 बजे तक इस टीम और किसानों के साथ रही। इस दौरान किसान परंपारगत तरीकों (ढोल, थाली पीटना, आवाज निकालना, पटाखे फोड़ना आदि) से अपनी फसलें बचाने की कोशिश करते रहे, लेकिन दिन में टिड्डियों का दायरा जैसे बढ़ता जा रहा था।

यहां के प्रगतिशील किसान सुरेंद्र सिंह कहते हैं, "केवल हमारे गांव जलालपुर पंचायत की बात की जाए तो करीब ढाई हजार एकड़ में फैली हैं, लेकिन आसपास की तीनों ग्राम पंचायतों ढकिया, भकुरहा को मिला लें तो 4000-5000 एकड़ की फसल बर्बाद कर चुकी है या कल तक कर देंगी। ये जो पेड़ (यूके लिप्टस) टूटे देख रहे हैं, वो इन टिड्डियों के बोझ से टूट गए हैं। फिलहाल जो बचाव कार्य किए जा रहे हैं वे पर्याप्त नहीं हैं। सरकार को चाहिए कि हेलीकॉप्टर या ड्रोन से छिड़काव कराए।" सुरेंद्र सिंह का परिवार 30 साल पहले हरियाणा के सिरसा से आकर यहां बसा था, वह रातभर बचाव टीम और गांव कनेक्शन के साथ रहे।

रासायनिक दवाओं के छिड़काव के बाद सीतापुर में मरी पड़ीं टिड्डियां। फोटो अभिषेक वर्मा

उत्तर प्रदेश के किसान सुरेंद्र सिंह के घर करीब 1100 किलोमीटर दूर राजस्थान के बाड़मेर जिले में भिड़ाय गांव (तहसील शिव) युवा किसान रमेश गोदारा के खेतों में फिर टिड्डियों का हमला हुआ था।

रमेश गोदारा फोन पर गांव कनेक्शन को बताते हैं, "हमारे घर में करीब 100 बीघा जमीन है। पिछले साल नवंबर-दिसंबर से हम लोग लगातार टिड्डियों के हमले झेल रहे हैं। अकेले हमारा ही करीब 10 लाख रुपए का नुकसान हो चुका है और सरकार से एक पैसे की मदद नहीं मिली है। ऐसे तो किसान बर्बाद हो जाएंगे, इसीलिए हम लोग चाहते हैं कि टिड्डी हमलों को प्राकृतिक आपदा घोषित किया जाए।"

10 जुलाई को राजस्थान में बीजेपी के सहयोगी दल आरएलपी ने टिड्डियों को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की थी। राजस्थान राज्य सरकार में कृषि मंत्री लालचंद कटारिया ने केंद्र सरकार से टिड्डियों को प्राकृतिक आपदा घोषित करने की मांग की है। जून के आखिरी हफ्ते में देश में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने भी टिड्डी हमलों को प्राकृतिक आपदा घोषित करने और किसानों को रहे नुकसान को फसल बीमा योजना से मदद की मांग कर चुकी है।

रमेश गोदारा का गांव भारत-पाकिस्तान सीमा से करीब 70 किलोमीटर दूर है। ये उन इलाकों में शामिल है जहां टिड्डियों का प्रकोप सबसे ज्यादा है। इसके साथ ही पाकिस्तान सीमा पर टिड्डियों के कई दल प्रजनन भी कर रहे हैं। जो आगे चलकर हमला करेंगे। टिड्डियों का पूरा जीवन चक्र 40 से 150 दिनों के आसपास का होता है। टिड्डियां ज्यादातर रेगिस्तान में ही अंडे देती हैं। पिछले महीनों में लगातार हुई बारिश, चक्रवातों के चलते हुए मौसमी बदलावों से मौसम में नमी रहने से टिड्डियों ने ज्यादा प्रजनन किया और अब विश्व के कई देशों की खाद्य सुरक्षा के लिए ही खतरा बनी हुई है।

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इसके जवाब में हरियाणा के फरीदाबाद में स्थित टिड्डी नियंत्रण केंद्र के उपनिदेशक के एल गुर्जर फोन पर गांव कनेक्शन को बताते हैं, "पश्चिमी राजस्थान से तेज हवाओं के साथ टिड्डियां देश के दूसरें राज्यों तक पहुंच रही हैं। एक बार में कम से कम 100-150 किलोमीटर की दूरी तय करती हैं। ये बहुत चंचल होती हैं, थोड़ी सी रोशनी आवाज होने पर सक्रिय हो जाती हैं इसलिए कंट्रोल करने में थोड़ी दिक्कत भी आ रही है। अभी जो टिड्डियां हैं उनको कुछ दिन में खत्म कर लिया जाएगा, समस्या नए नई पनपती टिड्डियों से है।" टिड्डियां फस्ट जनरेशन में 18 गुना और दूसरी में 400 गुना तक हो जाती हैं।

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने अपने तीन जुलाई के अपडेट में भारत को जुलाई में अलर्ट रहने को कहा है। दुनिया के कई देश टिड्डियों से जूझ रहे हैँ। अफ्रीकी देश कीनिया में 70 साल में सबसे भीषण अटैक हुआ है, वहां फसलें और वनस्पतियां खराब होने से भुखमरी जैसे हालात हो रहे हैं। सोमालिया में राष्ट्रीय आपात घोषित किया जा चुका है तो पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी टिड्डियों को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया गया है।

भारत की समस्या सिर्फ अपने रेगिस्तान में पनपने और प्रजनन करने वाली टिड्डियों से नहीं है। पाकिस्तान और ईरान से आने वाली टिड्डियां सबसे बड़ी मुसीबत हैं। भारत के हालात आगे चलकर कैसे होंगे ये काफी कुछ पाकिस्तान और ईरान में टिड्डी नियंत्रण कार्यक्रमों पर भी निर्भर करेगा। भारत ने ईरान टिड्डी नियंत्रण के लिए अपनी तरफ से 25 मीट्रिक टन मैलाथियान (95 फीसदी यूएलवी) भेजा है। भारत की तरफ से पाकिस्तान को भी टिड्डी नियंत्रण में मदद की पेशकश पिछले साल की गई थी, लेकिन पाकिस्तान की उस पर क्या प्रतिक्रिया रही गांव कनेक्शन के पास उसकी जानकारी नहीं है। (गांव कनेक्शन संबंधित अधिकारियों से बात करने की कोशिश कर रहा है जानकारी होते ही खबर को अपडेट किया जाएगा)।

खाद्य सुरक्षा के सवाल पर के एल गुर्जर कहते हैं, "क्योंकि टिड्डियों का प्रजनन चालू है। यानि इस सीजन में अभी और हमले हो सकते हैं। टिड्डियाँ उड़ेंगी तो फसल को नुकसान भी होगा। खाद्य सुरक्षा की समस्या तो है ही, इसीलिए इसे डिजास्टर मैंनेजमेंट की तरह लेना चाहिए, हालांकि हमारे यहां सोमालिया या कीनिया जैसे हालात नहीं हो सकते क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर बड़े पैमाने पर टिड्डी नियंत्रण कार्यक्रम चला रही हैं।" देश में इस वक्त 60 टीमें कार्यरत हैं। एक हेलीकॉप्टर और 5 ड्रोन की 12 टीमें राजस्थान में सक्रिय हैं। विदेशों से की मशीनें मंगाई गई हैं।

टिड्डियां इस बार सबको चौंका रही हैँ। सराकारी अधिकारियों के अनुमान से ज्यादा कहीं टिड्डी सक्रिय और उनकी संख्या ज्यादा नजर आती है। 11 जुलाई को हरियाणा के रोहतक में छठी बार टिट्डियों का अटैक हुआ, यहां करीब 2 किलोमीटर का झुंड था, वहीं मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान के बूंदी जिले में 6 किलोमीटर के दायरे वाले टिट्डी दल ने हमला किया था।

सीतापुर के जिला कृषि उपनिदेशक अरविंद मिश्रा कहते हैं, "जिले में कई विभाग मिलकर टिड्डियों की संख्या नियंत्रण करने में जुटे हैं, किसानों को हर संभव मदद और जानकारी दी जा रही है लेकिन टिडडियां हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा संख्या में आईं हैं।" सीतापुर में गन्ने को छोड़कर दूसरी फसलों में नुकसान ज्यादा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि बाकी फसलें अभी छोटी हैं, यहां धान की ज्यादातर रोपाई जुलाई में ही हुई है।

जमाम नगर के बुजुर्ग जिनके घर खेत जगह टिड्डियों ने कब्जा कर रहा था,कहते हैं, पहले धुआं जैसा मालूम हुआ। जैसे आंधी आती हैं। उसके बाद काली घटा छा गई, अंधेरा जैसा हो गया, जहां तक हमारी नजर जा रही थी सिर्फ टिड्डियां नजर आ रही ही थीं।"

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